तेलांगाना का वो ऐतिहासिक घर, जहां से हुई थी पहली तेलुगु ग्रामीण पत्रिका की शुरुआत!

Last Updated:May 04, 2026, 14:30 IST
Telangana Kissa: तेलंगाना के महबूबाबाद के इनुगुर्ती गांव में ओद्दिराजू भाइयों का सौ साल पुराना घर, जहां से 1922 में तेलुगु पत्रिका तेनुगु निकली, अब संरक्षण और संग्रहालय दर्जे की मांग में है. स्थानीय लोगों के मुताबिक इस कहानी के नायक ओद्दिराजू सीताराम चंद्र राव और ओद्दिराजू राघवरंगा राव हैं. इन दोनों भाइयों की विद्वत्ता का लोहा उस समय के बुद्धिजीवी भी मानते थे.
तेलंगाना. तेलंगाना के महबूबाबाद जिले का छोटा सा गांव इनुगुर्ती आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है. यह गांव भारतीय पत्रकारिता, खासकर तेलुगु पत्रकारिता के उस स्वर्णिम इतिहास का गवाह है, जिसे ओद्दिराजू भाइयों ने अपने खून-पसीने से सींचा था. यहां स्थित करीब 100 साल पुराना घर आज भी उस दौर की याद दिलाता है, जब निजाम शासन के कड़े पहरे के बीच जन-जागरूकता की मशाल जलाई गई थी.
स्थानीय लोगों के मुताबिक इस कहानी के नायक ओद्दिराजू सीताराम चंद्र राव और ओद्दिराजू राघवरंगा राव हैं. इन दोनों भाइयों की विद्वत्ता का लोहा उस समय के बुद्धिजीवी भी मानते थे. ये साधारण ग्रामीण नहीं थे, बल्कि संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी सहित कुल 16 भाषाओं के ज्ञाता थे. जब निजाम काल में तेलुगु भाषा पर संकट गहराने लगा, तब इन भाइयों ने कलम को अपना हथियार बनाने का फैसला किया.
पत्रकारिता की शुरुआत इसी घर सेसाल 1922 में इसी घर की चारदीवारी के भीतर से तेनुगु पत्रिका का संपादन शुरू हुआ. यह केवल एक पत्रिका नहीं थी, बल्कि ग्रामीण अंचल से निकलने वाली पहली तेलुगु पत्रिका थी, जिसने सीधे जनता से संवाद स्थापित किया. उस समय जब प्रेस मशीनें आसानी से उपलब्ध नहीं थीं, तब इन भाइयों ने अपने घर में ही छापाखाना लगाया और संपादन से लेकर छपाई और वितरण तक की जिम्मेदारी खुद संभाली.
संरक्षण की जरूरत महसूस कराता यह ऐतिहासिक घरआज भी यह घर मजबूती के साथ खड़ा है, लेकिन इसकी दीवारें अब संरक्षण की मांग कर रही हैं. घर के भीतर जाते ही उस दौर की झलक महसूस होती है, जहां बैठकर इन विद्वानों ने समाज सुधार की दिशा तय की थी. यह घर सिर्फ पत्रकारिता का जन्मस्थान नहीं रहा, बल्कि साहित्य और दर्शन का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है.
स्थानीय निवासी और इतिहासकार मानते हैं कि इस स्थान को एक आधिकारिक पत्रकारिता संग्रहालय का दर्जा दिया जाना चाहिए. यह आने वाली पीढ़ियों को बताएगा कि सीमित संसाधनों में भी सच्चाई और भाषा के लिए किस तरह एक छोटे से गांव से बदलाव की शुरुआत की जा सकती है. इनुगुर्ती का यह घर आज सिर्फ ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और पत्रकारिता विरासत का एक जीवंत दस्तावेज बना हुआ है.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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