रुपये क्या आक पर उगते हैं? बाड़मेर की महिलाओं ने सच कर दिखाई कहावत, बंजर पौधे से हो रही लाखों की कमाई

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“रुपये क्या आक पर उगते हैं?” बाड़मेर ने कर दिखाया सच, रेगिस्तान का ‘आक’ बना कम
Last Updated:May 17, 2026, 09:27 IST
Barmer Thar Desert Aak Plant Fiber Income: बाड़मेर और थार के रेगिस्तान में “रुपये क्या आक पर उगते हैं” वाली कहावत अब सच हो रही है. रुमा देवी फाउंडेशन और निट्रा की ‘आक से आमदनी’ पहल के तहत बेकार समझे जाने वाले आक के पौधे के पोड्स से प्राकृतिक रेशा निकाला जा रहा है. इस हल्के और अत्यधिक गर्म रेशे से जैकेट, शॉल और बैग बनाए जा रहे हैं, जिसकी मांग विदेशों तक है. यह प्रोजेक्ट बिना पानी के उगने वाले आक के जरिए बाड़मेर, जैसलमेर समेत कई जिलों की महिलाओं को घर बैठे बड़ा रोजगार दे रहा है.
“रुपये क्या आक पर उगते हैं?”… यह पारंपरिक कहावत अब राजस्थान के बाड़मेर और थार के रेगिस्तानी इलाकों में सच साबित हो रही है. जिस आक (मदार) के पौधे को कभी लोग बेकार और अनुपयोगी खरपतवार समझकर उखाड़ फेंकते थे, वही अब स्थानीय किसानों और ग्रामीण महिलाओं की आमदनी का एक मजबूत जरिया बन चुका है. रुमा देवी फाउंडेशन और निट्रा (उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ) की इस अनूठी पहल ‘आक से आमदनी’ ने थार के हजारों किसान परिवारों और महिलाओं के लिए स्थाई रोजगार का एक नया और आत्मनिर्भर मॉडल तैयार कर दिया है.
आक के रेशों से तैयार उत्पादों की बाजार में मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि इन्हें प्राकृतिक ऊन के एक बेहतरीन और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्रों, उत्तर भारत और यहाँ तक कि विदेशी बाजारों में भी इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता काफी बढ़ गई है. इस सफलता को देखते हुए फाउंडेशन ने अब तक 500 टन से अधिक रेशा एकत्रित करने की बड़ी क्षमता विकसित कर ली है. थार के इस अनूठे मॉडल को और अधिक मजबूत बनाने के लिए अब इसे बड़े पैमाने (कमर्शियल लेवल) पर विस्तार देने की तैयारी जोर-शोर से की जा रही है.
आक के पोड्स (डोडों) से निकाला जाने वाला यह प्राकृतिक रेशा अब कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल इंडस्ट्री) में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है. इस अनूठे रेशे का उपयोग करके आकर्षक बैग, जैकेट, शॉल, स्वेटर और अन्य गर्म कपड़े तैयार किए जा रहे हैं. इस रेशे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह वजन में बेहद हल्का होने के साथ-साथ अत्यधिक गर्माहट प्रदान करता है. विशेषज्ञों के अनुसार, इससे बने कपड़े -20°C से -40°C तक के हाड़ कंपाने वाले भीषण ठंडे तापमान में भी मानव शरीर को पूरी तरह गर्म रखने में सक्षम हैं.
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बाड़मेर के साथ-साथ जैसलमेर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, अजमेर, झुंझुनूं और श्रीगंगानगर जैसे कई जिलों में ग्रामीण महिलाएं अब बड़े पैमाने पर आक के पोड्स (डोडे) तोड़ने और उनसे रेशा निकालने के काम में जुट गई हैं. रुमा देवी फाउंडेशन इस मुहिम के तहत गांव-गांव जाकर महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को विशेष प्रशिक्षण दे रहा है. इस बेहतरीन पहल की वजह से ग्रामीण महिलाओं को अपने घर के पास ही रोजगार मिल रहा है, जिससे वे आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से मजबूत बन रही हैं.
आज के दौर में पर्यावरण-अनुकूल और प्राकृतिक रेशों से बने उत्पादों की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है, क्योंकि ये वजन में काफी हल्के, टिकाऊ और पूरी तरह से केमिकल-फ्री (रासायनिक मुक्त) होते हैं. इस अनूठी मुहिम पर डॉ. रूमा देवी का कहना है कि: “जो आक कभी बेकार माना जाता था, वही आज गांवों में रोजगार, उम्मीद और कमाई की नई पहचान बन रहा है. हमारा लक्ष्य है कि रेगिस्तान के हर कोने तक यह मॉडल पहुंचे ताकि वहां की महिलाएं और किसान पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकें.”
राजस्थान के थार क्षेत्र की सूखी और अनुपजाऊ जमीन पर जहाँ पारंपरिक खेती करना बेहद मुश्किल माना जाता है, वहाँ आक का पौधा बिना सिंचाई और विशेष देखभाल के भी आसानी से पनप जाता है. अब इसी पौधे के पके हुए पोड्स (जिन्हें स्थानीय भाषा में आकपाड़िए कहा जाता है) से निकाले जा रहे प्राकृतिक रेशों से बेहतरीन ऊनी कपड़े तैयार किए जा रहे हैं. इसकी खेती की एक बड़ी विशेषता यह है कि आक का पौधा लगाने के पहले साल से ही पोड्स देना शुरू कर देता है और अगले 10 से 12 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए डॉ. रूमा देवी फाउंडेशन सीधे ग्रामीण महिलाओं से इन आकपाड़ियों को खरीद रही है, जिससे उन्हें घर बैठे कमाई का एक टिकाऊ जरिया मिल गया है.



