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ये तो कमाल हो गया… तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में तख्तापलट एक बार फिर ‘मोदी भरोसे’ को पुख्ता कर गया

अद्भुत, अविश्वसनीय लेकिन अकल्पनीय नहीं. बंगाल और तमिलनाडु में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और डीएमके का पिछड़ना एक बात को साबित कर गया कि जनता अब परिवारवाद, भ्रष्टाचार की राजनीति से ऊब चुकी है. यही कारण है कि इस जीत को बीजेपी अद्भुत और अविश्वसनिय भले ही पा रही हो, लेकिन जंग में कूदने से पहले ये अकल्कपनीय नहीं था. बीजेपी आलाकमान जानता था कि जनता को विकास चाहिए , युवा को रोजगार चाहिए, महिला शक्ति को ताकत चाहिए. ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन जैसे नेता केन्द्र के साथ दो-दो हाथ करने के फेर में पड़े रहे और जनता की नब्ज पकड़ नहीं पाए. बीजेपी की जीत के मायने क्या होने वाले हैं, इसका अंदाजा विपक्ष को शायद नहीं होगा. लेकिन ये बात तो साबित हो गयी है कि इन नतीजों के बाद ये स्थापित हो जाएगा कि पीएम मोदी के कद के बराबर कोई नहीं हैं. ये मोदी भरोसा ही है कि लोकसभा के तीन चुनाव लगातार बीजेपी ने पीएम मोदी के नेतृत्व में जीते और ये लगने लगा है कि बीजेपी के शब्दकोष में से एंंटी इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) शब्द गायब होता जा रहा है.

ये जीत ऐतिहासिक है. ये एक ऐसे जन नेता पर जनता के भरोसा की जीत है जो 24*7 हर वर्ग और हर तबके के विकास के लिए तत्पर है. 2014 मे देश भर में जनता का जो भरोसा पीएम मोदी पर दिखा था. कुछ उसी तर्ज पर बंगाल की जीत मानी जा सकती है. ममता बनर्जी ने 2011 में लेफ्ट को उखाड़ फेंका था, लेकिन उसी हिंसा तंत्र का सहारा लेकर वो शासन करती रहीं और भूल गईं कि जिस जनता ने उन पर भरोसा किया उसे हिंसा से नहीं सिस्टम में बदलाव से मतलब था. यही चूक उन पर भारी पड़ी. जेन जी के शब्दों में समझें तो पीएम मोदी भरोसे पर रिफ्रेश बटन दब गया है. ये आने वाले वर्षों में उनकी नीतियों को और मजबूती से लागू कर 2047 तक विकसित भारत बनाने के सपने को पूरा करेगा.

तभी तो नतीजे ये बता रहे हैं कि आसान नहीं होता वोटरों के भरोसे पर हर वक्त खरा उतरना. बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी का हिंसा तंत्र, बांग्लादेशी घुसपैठियों का साथ, उधर तमिलनाडु में स्टालिन भी ममता के सुर मे सुर मिलाते हुए केन्द्र के हर फैसले का विरोध करते रहे. कभी हिन्दी के नाम पर तो कभी केन्द्र की एजेंसियों के खिलाफ… वो भी लगातार मोर्चे खोले रहे. शायद वो भूल गए थे कि एंटी इनकंबेंसी को दूर रखने के लिए जनता का भरोसा जीतने के लिए भी लड़ाई लड़नी पड़ती है. तभी तो बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस के बाहर बीजेपी का विकल्प मिला तो जनता ने उन पर भरोसा जताया तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में विकल्प एआईएडीएमके नहीं बल्कि तमिल सुपरस्टार विजय की पार्टी टीवीके बनी. जनता का न्याय ही निराला होता है. दशकों से दो पाटों के बीच बंटे तमिलनाडु के वोटरों ने अपने सुपरस्टार विजय की टीवीके को सबसे बड़ी पार्टी पार्टी और एआईएडीएमके को दूसरे नंबर की पार्टी बना कर इतना तो तय कर दिया कि सत्ता अब डीएमके के पास नहीं जाएगी. वाकई जो काम रजनीकांत और कमल हसन जैसे सुपरस्टार नहीं कर पाए वो विजय ने कर दिखाया. शायद टीवीके के साथ गठबंधन की कोशिशों के बाद उन्हें अलग लड़वाना भी बीजेपी की रणनीति का हिस्सा ही था.

उधर, असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनी. हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी ने साबित कर दिया कि जनता के बीच रहे और जनता के लिए काम करते रहें तो एटी इंकंबेंसी को किनारे लगाया जा सकता है. कांग्रेस बिखरी हुई थी. बदरुद्दीन अजमल की विश्वसनीयता भी कम होती जा रही थी. कांग्रेस के बिखराव का आलम ये था कि चुनाव के पहले ही उनके शीर्ष नेता बीजेपी में शामिल होते जा रहे थे. घुसपैठियों पर पार्टी के रुख से जनता भी सहमत नजर आ रही थी. इन सबसे ऊपर मोदी भरोसा और गृहमंत्री अमित शाह की व्यूह रचना का असर ऐसा रहा कि असम का किला एक बार फिर फतह हो गया.

अब बात बीजेपी की बंगाल में मिली जीत की करते हैं. 2021 में बीजेपी ने जो समां बांधा था उस जंग के बाद उन्हें 77 सीटें मिलीं थी. कोरोना जैसी महामारी का असर था कि आखिरी तीन चरणों के चुनावो में न तो प्रचार हो पाया और न ही पार्टी के कार्यकर्ता जमीन पर रह पाए थे. 2024 में लोकसभा चुनावों में सीट तो सिर्फ 8 आई, लेकिन आलाकमान को राहत इस बात की मिली कि उनके मिले वोटों का प्रतिशत खासा बढ़ गया और 90 विधानसभा क्षेत्रों में उन्हें टीएमसी पर बढ़त भी मिली. तभी तो जब चुनाव की रणनीति बननी शुरू हुई तो सबसे पहला काम था हर बूथ पर हिंसा रोकना और डरे हुए वोटरों को बाहर निकालना. संसद में एक शीर्ष नेता ने मुझे एक वाक्य में पूरा चुनाव समझा दिया था. उन्होने कहा था “निकल आए तो निकल जाएंगे”.

अर्धसैनिक बलों की तैनाती, तमाम हमलों के बाद भी चुनाव आयोग की सक्रियता ने तृणमूल के गुंडा तंत्र को समाप्त ही कर दिया. चुनावों में सिर्फ स्थानीय नेताओं को आगे रखने की रणनीति पर बंगाली अस्मिता को खत्म करने के आरोपों को खारिज कर गई. पीएम मोदी का आम आदमी के बीच झालमूरी खाना, हुगली में नाव पर सैर करना और दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के दर्शन को जाना, फिर सिक्किम में बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने की तस्वीरें – सीधा हर उम्र और हर तबके के वोटरों के दिल में उतर गईं.

बंगाल की लड़ाई भी आसान नहीं थी. चुनावों के चंद महीने पहले बीजेपी ने बिहार के युवा मंत्री और संगठन में राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभाते रहे. नितिन नवीन को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना था. पार्टी आलाकमान ने यही संदेश दिया था कि चुनावों में ये शांत, सौम्य और युवा चेहरा रंग लाएगा. खास कर बंगाल में जहां कायस्थ वोटरों की संख्या खासी है. नितिन नवीन ने बंगाल में लगातार यात्राएं कीं. अब पहली परीक्षा ही बंगाल, तमिलनाडू और केरल हो तो भला, ये नए अध्यक्ष के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं थी.

लेकिन इतिहास पीएम मोदी के जादू और अमित शाह की रणनीति के साथ साथ ये भी याद रखेगा कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद ही बंगाल और दक्षिण के द्वार भी खुल गए. तमिलनाडु में स्थापित पार्टियों की हार के बाद सहयोगी एआईएडीएमके सत्ता में हिस्सेदार तो होगी ही. इसलिए अब बीजेपी की नजरे पूरी तरह से कर्नाटक और केरल पर रहेंगी और पीएम मोदी और अमित शाह के साथ साथ नितिन नवीन की बड़ी जिम्मेदारी होगी इन राज्यों के साथ साथ पूरे देश में संगठन को चुस्त और दुरुस्त रखने की.

संसद में पीएम नरेन्द्र मोदी महिला आरक्षण बिल पास नहीं करवा पाए थे क्योंकि कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने एकजुट होकर विरोध किया था. अब जनता का ये फैसला उनके लिए साफ संदेश है कि साइलेंट वोटरों के हक को नजरअंदाज किया तो ऐसे ही लेने के देने पड़ेंगे. पीएम मोदी पर जनता का भरोसा कायम है और उम्मीद भी कि वो इस भरोसे पर खरा उतरते रहेंगे.

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