विभाजन के बाद पाकिस्तान गए 10,500 से अधिक लोग क्यों लौटे? 1948 के दस्तावेजों में दर्ज है पूरी कहानी

बीकानेर. भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद विस्थापन की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसमें पाकिस्तान जाने के कुछ महीनों बाद ही हजारों लोग वापस भारत लौट आए. विभाजन के समय लोगों के सामने नए बने देश में रहने का विकल्प था. कई लोग पाकिस्तान चले गए, लेकिन वहां कुछ समय रहने के बाद परिस्थितियां उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं रहीं. ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि चार से छह महीने पाकिस्तान में रहने के बाद लोग वापस भारत लौटने लगे.
ये लोग थारपारकर, सिंध के रास्ते जोधपुर और कच्छ में आ रहे थे. 1948 के सरकारी दस्तावेज में थारपारकर, सिंध से आने वाले शरणार्थियों के बारे में जानकारी दर्ज है. चीफ सेक्रेटरी ने जोधपुर के स्टेट को पत्र लिखा था. 17 अक्टूबर 1948 के टेलीग्राम में बताया गया कि बड़ी संख्या में शरणार्थी अपने मवेशियों के साथ पैदल आगे बढ़ रहे हैं और उनके कच्छ तथा जोधपुर स्टेट पहुंचने की संभावना है. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की सूचना के बाद सरकार ने तत्काल रिसेप्शन कैंप स्थापित करने की जरूरत बताई. योजना थी कि पहले शरणार्थियों को कैंपों में रखा जाए और फिर उन्हें ऐसे क्षेत्रों में भेजा जाए, जहां उनका व्यवस्थित पुनर्वास किया जा सके.
चार से छह महीने में ही लौट आए थे वापस
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल ने बताया कि थारपारकर और सिंध क्षेत्र में रहने वाले 10,500 से ज्यादा लोग पाकिस्तान बनने के बाद वहां गए, लेकिन करीब चार से छह महीने बाद परिस्थितियां बदलने पर वापस भारत की ओर लौट आए. बड़ी संख्या में लोग अपने मवेशियों और बैलगाड़ियों के साथ पैदल ही भारत पहुंचे. डॉ. गोयल बताते हैं कि यह वापसी भी आसान नहीं थी. परिवारों ने अपने साथ जरूरी सामान के अलावा मवेशियों और बैलगाड़ियों को लिया और पैदल ही भारत की ओर निकल पड़े.
सरकार के लिए चुनौती बन गई थी लोगों का पुनर्वास
डॉ. गोयल ने बताया कि थारपारकर और सिंध क्षेत्र से आने वाले 10,500 से ज्यादा लोगों के पुनर्वास की चुनौती उस समय सरकार के सामने थी. जोधपुर और कच्छ अकेले इतनी बड़ी संख्या में लोगों को स्थायी रूप से नहीं बसा सकते थे. इसलिए दूसरे क्षेत्रों में भी उन्हें भेजने और बसाने की जरूरत महसूस की गई. राहत मंत्रालय के स्तर पर भी इस समस्या को लेकर चर्चा की गई थी. सरकार के सामने शरणार्थियों के लिए रहने, खाने, स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार और स्थायी पुनर्वास की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती थी.
दस्तावेजों में बरसात के मौसम को लेकर जताई गई थी चिंता
दस्तावेजों में बरसात के मौसम को लेकर भी चिंता जताई गई थी. बड़ी संख्या में विस्थापित लोग खुले में या अस्थायी ठिकानों पर रहते तो बीमारी और महामारी फैलने का खतरा था. इसलिए उन्हें बरसात से पहले सुरक्षित स्थानों और कैंपों में रखने की व्यवस्था करने पर जोर दिया गया. डॉ. गोयल ने बताया कि उस समय विस्थापितों की निगरानी और सुरक्षा भी सरकार की प्राथमिकता थी. पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने पर उनके सामने गंभीर संकट खड़ा होने और जबरन धर्म परिवर्तन का खतरा होने की आशंका भी सरकारी स्तर पर जताई गई थी.
विस्थापितों के सामने नई जिंदगी शुरू करने की थी चुनौती
भारत लौटने वाले इन विस्थापितों के दर्द कम नहीं हो रहे थे. इनके सामने नई जिंदगी शुरू करने की सबसे बड़ी चुनौती थी. सरकार की ओर से उनके पुनर्वास, नागरिकता और रोजगार की व्यवस्था की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई. अस्थायी कैंपों में रखने के बाद उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में बसाने की योजना बनाई गई. यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रही.



