आधुनिक चकाचौंध के बीच आज भी कायम है मिट्टी के दीयों का असली महत्व

Last Updated:November 02, 2026, 12:08 IST
Pratapgarh: दीपावली के अवसर पर आधुनिक लाइटों और मोमबत्तियों के बीच मिट्टी के दीयों का पारंपरिक महत्व आज भी बरकरार है. त्योहार नजदीक आते ही कुम्हारों के चाक तेजी से चलने लगे हैं और पारंपरिक दीयों के साथ-साथ कई आधुनिक डिजाइन वाले आकर्षक दीये भी बाजार में उतारे गए हैं. यह पर्व कुम्हारों की सालभर की मेहनत को सहेजने और स्थानीय शिल्प व पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देने का एक बेहतरीन अवसर साबित हो रहा है.
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Diwali Mitti Ke Diye: दीपावली पर कुम्हारों के चाक से जगमगाते मिट्टी के दीये, स्थानीय हुनर को मिल रहा सम्मान
Pratapgarh: रोशनी के महापर्व दीपावली के नजदीक आते ही देश के बाजारों में रौनक बढ़ गई है. हालांकि चारों तरफ रंग-बिरंगी बिजली की झालरें और फैंसी लाइटें अपनी चमक बिखेर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय संस्कृति और परंपरा की असली पहचान माने जाने वाले मिट्टी के दीयों की महत्ता आज भी कम नहीं हुई है. त्योहार पास आते ही देश के गांवों से लेकर शहरों तक पारंपरिक कुम्हारों के चाक तेजी से घूमने लगे हैं. मिट्टी को गूंथकर दीये तैयार करने, उन्हें धूप में सुखाने और फिर बाजार तक पहुंचाने का सिलसिला शुरू हो चुका है, जिससे पारंपरिक कारीगरों के चेहरों पर उम्मीद की एक नई चमक लौट आई है.
कुम्हार समुदाय के लिए दीपावली केवल एक त्योहार भर नहीं है, बल्कि यह उनकी सालभर की मेहनत को असली पहचान मिलने का समय होता है. सुबह से लेकर देर शाम तक मिट्टी तैयार करना, चाक पर एक-एक दीये को खूबसूरत आकार देना और फिर उन्हें पक्का करने की तैयारी करना इन परिवारों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है. इस काम में घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ-साथ छोटे बच्चे भी अपने माता-पिता का हाथ बंटाते नजर आते हैं. चाक पर गढ़ा जाने वाला हर एक दीया इन कारीगरों के कड़े परिश्रम, उनके हुनर और भविष्य की उम्मीदों को अपने भीतर समेटे रहता है.
आधुनिकता के दौर में भी नहीं घटी पारंपरिक दीयों की मांगवक्त के साथ भले ही घरों को सजाने के तरीकों में बदलाव आया हो और लोग मोमबत्तियों या चाइनीज लाइटों का इस्तेमाल करने लगे हों, लेकिन पूजा-पाठ और सांस्कृतिक परंपराओं के मामले में मिट्टी के दीयों का विकल्प आज भी कोई नहीं ले पाया है. ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए अब बाजारों में साधारण दीयों के अलावा कई आकर्षक और आधुनिक डिजाइन भी देखने को मिलने लगे हैं. आजकल कमल के फूल के आकार वाले दीये, और भगवान गणेश व माता लक्ष्मी की आकृतियों से सजे कलात्मक दीपक ग्राहकों को अपनी ओर खूब आकर्षित कर रहे हैं. इसके अलावा, कई जगहों पर महिला स्वयं सहायता समूह भी इन उत्पादों को नया रूप देने में जुटे हैं.
पर्यावरण के अनुकूल और स्थानीय रोजगार का बेहतरीन जरियामिट्टी के दीये सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये पर्यावरण के भी बेहद अनुकूल होते हैं. पूरी तरह प्राकृतिक मिट्टी से तैयार होने के कारण इस्तेमाल के बाद ये वापस मिट्टी में मिल जाते हैं और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते. इस दीपावली जब हम अपने घरों की चौखट और आंगनों को मिट्टी के दीयों से सजाते हैं, तो यह केवल एक रस्म नहीं होती, बल्कि यह स्थानीय कारीगरों के रोजगार और हमारी प्राचीन कला को जीवित रखने का एक सार्थक प्रयास भी होता है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Pratapgarh,Pratapgarh,Rajasthan
First Published :
November 02, 2026, 12:08 IST



