मां ने दही-बाटी लाने का किया था वादा, बालक 12 साल तक बैठा रहा उसी धोरे पर, जानें बालकनाथ मंदिर से जुड़ी अनोखी और भावुक कहानी

Last Updated:November 02, 2026, 11:06 IST
Balaknath Temple Bikaner Story: बीकानेर से 15 किमी दूर 180 फीट ऊंचे रेतीले धोरे पर स्थित 500 साल पुराना बालकनाथ मंदिर आस्था का केंद्र है. मान्यता है कि सूखे के समय एक मां अपने बालक को दही-बाटी लाने का कहकर धोरे पर छोड़ गई थी. बालक 12 साल तक मां का इंतजार करता रहा और अंत में प्राण त्याग दिए. इस स्थान को बालकियां धोरा कहा जाता है. मंदिर में श्रद्धालु दही-बाटी का भोग लगाते हैं और संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर आते हैं. मंदिर सेवा में संत संतोष दास महाराज समर्पित हैं.
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Bikaner: राजस्थान के थार रेगिस्तान के ऊंचे रेतीले धोरे न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाने जाते हैं, बल्कि इनसे कई प्राचीन और अनसुनी धार्मिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं. बीकानेर शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर घने रेतीले धोरों के बीच स्थित ‘बालकियां धोरा’ पर बना बालकनाथ जी का मंदिर आस्था का एक ऐसा ही अनूठा केंद्र है. लगभग 500 साल पुराने इस मंदिर का इतिहास एक बालक की अपनी मां के प्रति अगाध प्रतीक्षा और भक्ति से जुड़ा हुआ है, जिसे सुनकर हर श्रद्धालु का मन भावुक हो उठता है.
लोकमान्यताओं और पुरानी कथाओं के अनुसार, सैकड़ों साल पहले जब इस इलाके में भयंकर अकाल और सूखा पड़ा था, तब एक मां अपने छोटे से मासूम बच्चे को जंगल के इस रेतीले धोरे पर बिठाकर चली गई थी. जाते समय मां ने बालक से वादा किया था कि वह उसके खाने के लिए दही-बाटी लेकर जल्द वापस लौटेगी. मासूम बच्चा मां की बात मानकर उसी स्थान पर बैठकर उसके लौटने की राह देखता रहा. लेकिन मां किसी कारणवश वापस नहीं आ सकी. बालक बिना विचलित हुए लगातार 12 वर्षों तक उसी स्थान पर बैठकर अपनी मां का इंतजार करता रहा.
मां के न लौटने पर बालक ने त्यागे प्राण, बन गई तपोभूमिकरीब 12 साल बीत जाने के बाद जब मां वापस आई, तो उसने देखा कि उसका बेटा आज भी उसी धोरे पर बैठकर उसका इंतजार कर रहा है. बालक ने मां को देखते ही सबसे पहले अपनी पसंदीदा दही-बाटी के बारे में पूछा. मां जब दोबारा दही-बाटी लेने गई और लौटकर नहीं आई, तो बालक ने उसी स्थान पर अपने प्राण त्याग दिए. इस महान प्रतीक्षा और तपस्या के कारण यह पावन स्थल बालकनाथ जी की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध हो गया और इस स्थान का नाम ‘बालकियां धोरा’ पड़ गया.
180 फीट ऊंचे धोरे पर लगता है दही-बाटी का विशेष भोगअम्बासर गांव से पहले और कोटड़ी गांव के पास जंगल में जमीन से करीब 180 फीट ऊंचे रेत के धोरे पर स्थित इस मंदिर का वातावरण बेहद शांत और विहंगम है. मंदिर के सेवक संत संतोष दास महाराज, जो पिछले सात सालों से यहां सेवा कर रहे हैं, बताते हैं कि इस मंदिर की सबसे मुख्य परंपरा बालकनाथ जी को दही-बाटी का भोग लगाना है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से अर्जी लगाने और दही-बाटी अर्पित करने से श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है. विशेष रूप से संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर दूर-दूर से दंपती यहां शीश निभाने पहुंचते हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bikaner,Bikaner,Rajasthan
First Published :
November 02, 2026, 11:06 IST



