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आपके पेट के अंदर बसी है एक पूरी दुनिया! जानिए क्यों Gut Bacteria आपकी सेहत के छिपे हुए हीरो हैं

बाहर से घर में आते ही हम अक्‍सर अपने हाथ धोते हैं, क्‍योंकि तरह-तरह की सतहों पर कई तरह के बैक्‍टीरिया होते हैं. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि हमारे शरीर के भीतर एक-दो नहीं बल्‍कि खरबों बैक्‍टीरिया, वायरस और छोटे-छोटे जीवों की पूरी दुनिया बसी होती है. वैज्ञानिक इसे “गट माइक्रोबायोम” कहते हैं. कुछ साल पहले तक लोग मानते थे कि बैक्टीरिया का मतलब सिर्फ बीमारी है. लेकिन अब शोध बता रहे हैं कि हमारे शरीर में रहने वाले कई बैक्टीरिया हमारी मदद करते हैं. वे खाना पचाने, विटामिन बनाने, इम्युनिटी को मजबूत रखने और यहां तक कि दिमाग तक संदेश पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं.

यही गट माइक्रोबायोम हमारे पेट को शरीर का कंट्रोल रूम बनाते हैं. यानी पेट का काम स‍िर्फ आपका खाना पचाना नहीं है. अक्‍सर जब कोई खुशी की खबर या रोमांट‍िक माहौल होता है, तो पेट में त‍ितल‍ियां सी उड़ने लगती हैं? वहीं कुछ लोगों को टेंशन होते ही पेट फूलने, गैस और कब्ज जैसी समस्या होने लगती. इन दोनों ही स्‍थ‍िति में आपका पेट और द‍िमाग आपस में बात कर रहे होते हैं. दरअसल आंत यानी गट और दिमाग के बीच लगातार संवाद चलता रहता है. इसे “गट-ब्रेन कनेक्शन” कहा जाता है. यही वजह है कि तनाव होने पर पेट खराब हो सकता है और पेट की समस्याएं होने पर मूड भी बिगड़ सकता है.

आंत यानी गट और दिमाग के बीच लगातार संवाद चलता रहता है. इसे “गट-ब्रेन कनेक्शन” कहा जाता है.

क्‍या खाते हैं ये पेट के बैक्टीरिया?

आप अकेले खाना नहीं खाते. आपके साथ आपके गट बैक्टीरिया भी खाते हैं. जब आप दाल, फल, सब्जियां, ओट्स, चना, राजमा, बाजरा या ज्वार जैसी फाइबर से भरपूर चीजें खाते हैं, तो उनका एक हिस्सा बड़ी आंत तक पहुंचता है. वहां मौजूद बैक्टीरिया उसे तोड़ते हैं और ऐसे पदार्थ बनाते हैं जो शरीर में इनफ्लेमेशन कम करने, इम्युनिटी को बेहतर बनाने और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करने में मदद कर सकते हैं. यानी दादी-नानी जो सालों से कहती थीं कि “हरी सब्जी खाओ, पेट ठीक रहेगा”, उसके पीछे अब विज्ञान भी खड़ा नजर आ रहा है.

जंक फूड तो पेट के बैक्‍टीरिया को भी नहीं पसंद

शहरी कल्‍चर में बाहर का खाना, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय, कम शारीरिक गतिविधि और एंटीबायोटिक दवाओं का बढ़ता इस्तेमाल हमारे गट माइक्रोबायोम को बदल रहा है. दक्षिण एशिया में किए गए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि शहरों में रहने वाले लोगों के गट माइक्रोबायोम में ग्रामीण आबादी की तुलना में कम विविधता देखी गई. शोधकर्ताओं का मानना है कि पारंपर‍िक और फाइबर से भरपूर भोजन इस विविधता को बनाए रखने में मदद कर सकता है. यानी अगर आपके दिन की शुरुआत बिस्कुट और चाय से होती है, दोपहर में फास्ट फूड और रात में प्रोसेस्ड स्नैक्स खाते हैं, तो आपके पेट के “अच्छे बैक्टीरिया” को पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा हो सकता.

क्या मोटापा और डायबिटीज का भी गट से संबंध है?

प्रस‍िद्ध गेस्‍ट्रोएंट्रोलॉज‍िस्‍ट, डॉ. पाल मनिक्‍कम बताते है, वैज्ञानिकों को ऐसे संकेत मिले हैं कि गट माइक्रोबायोम और मोटापा, डायबिटीज तथा मेटाबॉलिक बीमारियों के बीच संबंध हो सकता है. एक प्रसिद्ध प्रयोग में मोटे चूहों के गट माइक्रोब्स दूसरे चूहों में ट्रांसफर किए गए, जिसके बाद उनमें शरीर की चर्बी बढ़ी. हालांकि इंसानों में स्थिति कहीं अधिक जटिल है और सिर्फ बैक्टीरिया को दोष नहीं दिया जा सकता. फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि गट स्वास्थ्य को बेहतर बनाना समग्र स्वास्थ्य सुधार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है.

आपके पेट के अंदर बसी है एक पूरी दुनिया.

हर प्रोबायोटिक जरूरी नहीं, फाइबर ज्यादा जरूरी है

पिछले कुछ सालों में प्रोबायोटिक सप्लीमेंट्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर लोगों के लिए सबसे अच्छा रास्ता महंगे सप्लीमेंट नहीं, बल्कि फाइबर से भरपूर भोजन है. दालें, छोले, राजमा, मौसमी फल, सब्जियां, ओट्स, बाजरा, ज्वार और फरमेंट‍िड फूड जैसे दही, इडली, डोसा, ढोकला, ये सभी आपके गट बैक्टीरिया के लिए बेहतर ईंधन हो सकते हैं.

5 आसान भारतीय आदतें जो आपके गट को खुश रख सकती हैं

हर दिन कम से कम एक कटोरी दही खाएं.
हफ्ते में कई तरह की सब्जियां और फल शामिल करें.
दाल, चना, राजमा और अन्य फलियों को नियमित भोजन का हिस्सा बनाएं.
बिना जरूरत एंटीबायोटिक दवाएं न लें.
पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखें.

यानी चाहे वजन कम करना हो, खुद को हेल्‍दी रखना हो या अपनी सेहत को बेहतर बनाना हो, आपकी गट-हेल्‍थ के ल‍िए सबसे ज्‍यादा जरूरी है फाइबर. जंक-फूड या पैकेज्‍ड फूड आसान लग सकता है, लेकिन ये आपके पेट के ल‍िए काफी महंगा पड़ता है.

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