कभी चने से पहचाना जाता था भरतपुर, बदली खेती ने मिटा दी दलहन की पुरानी पहचान; दाल मिलों पर भी गहराया संकट

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कभी चने से पहचाना जाता था भरतपुर, अब सरसों के वर्चस्व ने मिटाई दलहन की पहचान
Last Updated:August 30, 2026, 15:09 IST
Bharatpur News: भरतपुर में समय के साथ बदली खेती ने चने की पुरानी पहचान मिटा दी है. 40 साल पहले जहां 85 हजार हेक्टेयर में चने की खेती होती थी, वहीं अब यह सिमटकर 4 से 5 हजार हेक्टेयर रह गई है. इसका सीधा असर स्थानीय दाल उद्योग पर पड़ा है और 30 में से अब केवल 2 से 3 दाल मिलें ही संचालित हो पा रही हैं. लागत में बढ़ोतरी, खारे पानी की समस्या और सरसों की खेती में अधिक मुनाफे के कारण किसानों ने चने की जगह सरसों की फसल को अपना लिया है.
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Bharatpur: राजस्थान के भरतपुर जिले की पहचान कभी चने की बंपर खेती और दलहन उत्पादन के लिए हुआ करती थी. यहां के खेतों में सर्दियों के मौसम में बड़ी मात्रा में चने की फसल लहलहाती थी और जिले की कृषि अर्थव्यवस्था में इसका अहम योगदान रहता था. लेकिन समय के साथ किसानों ने खेती का रुख बदल दिया और चने का रकबा लगातार घटता चला गया. हालात यह हैं कि करीब 40 साल पहले जिस भरतपुर में लगभग 85 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में चने की खेती होती थी, आज वहां इसका रकबा घटकर महज 4 से 5 हजार हेक्टेयर के आसपास रह गया है.
कृषि क्षेत्र में आए इस बड़े बदलाव का असर अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय दाल उद्योग भी इसकी भारी मार झेल रहा है. पूर्व में भरतपुर में चने और अन्य दलहनों की प्रोसेसिंग करने वाली करीब 30 दाल मिलें संचालित होती थीं. इन मिलों में स्थानीय किसानों से आने वाले चने की सफाई, प्रोसेसिंग और दाल तैयार की जाती थी. लेकिन चने की खेती में आई भारी गिरावट के चलते मिलों को पर्याप्त कच्चा माल मिलना बेहद मुश्किल हो गया है. यही वजह है कि अब जिले में महज 2 से 3 दाल मिलें ही किसी तरह बंद होने के कगार पर संचालित हो रही हैं.
क्यों घटा चने का रकबा?कृषि विशेषज्ञों के अनुसार चने के रकबे में आई इस भारी कमी के पीछे कई मुख्य कारण हैं. इनमें सबसे प्रमुख कारण खेती में बढ़ती लागत, पानी की बदलती गुणवत्ता और किसानों को फसल से मिलने वाला मुनाफा माना जा रहा है. भरतपुर के कई इलाकों में खारे पानी की समस्या भी कृषि के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. इसके अलावा किसानों ने ऐसी फसलों की ओर रुख किया जिनमें कम समय, कम जोखिम और अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी मिल सके.
चने की जगह सरसों का पीला सोनाविशेषज्ञों का कहना है कि सरसों की खेती किसानों के लिए चने की तुलना में अधिक लाभदायक साबित हुई है. भरतपुर और आसपास के इलाकों में सरसों की मांग और बाजार भाव बेहतर मिलने के कारण किसानों ने बड़े स्तर पर चने की जगह सरसों की खेती शुरू कर दी. इसका सीधा असर चने के रकबे पर पड़ा और पिछले चार दशकों में खेती का पूरा समीकरण ही बदल गया. कभी चने की पैदावार से गुलजार रहने वाले भरतपुर के खेतों में अब सरसों की फसल का पीला रंग ज्यादा दिखाई देता है, वहीं चने की घटती खेती के कारण स्थानीय दाल उद्योग भी अपना पुराना दौर खो चुका है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bharatpur,Bharatpur,Rajasthan
First Published :
August 30, 2026, 15:09 IST



