Rajasthan

क्यों पिछड़ी कांग्रेस, क्या BJP का पॉलिटिकल मैनेजमेंट मजबूत था या फिर यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव है?

जयपुर. राजस्थान के 309 निकायों में हुए चुनाव में बीजेपी ने भले ही बीजेपी ने ग्राउंड लेवल पर कांग्रेस के मुकाबले करीब एक फीसदी ही वोट ज्यादा लिए हैं लेकिन वह फ्लोर मेनैजमेंट में सफल रही. यही वजह रही कि उसने प्रदेशभर में अजमेर, पाली, भरतपुर और अलवर जैसे नगर निगमों समेत अन्य दर्जनों निकायों में निर्दलीयों को ऐसा साधा कि कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई. कांग्रेस का साफ और गंभीर आरोप है कि सत्तारुढ़ पार्टी बीजेपी सत्ता का बेजा लाभ उठाया है और उसने संसाधनों का अनुचित तरीके से उपयोग कर कई निकाय जबरन छीन लिए जबकि उसके पास जनादेश नहीं था. फिर भी बीजेपी ने 197 निकायों में कब्जा कर लिया. जबकि कांग्रेस महज 97 तक पहुंच पाई है. अभी चार निकाय प्रमुखों के चुनाव और होने हैं. उनमें भी तीन में बीजेपी का प्रमुख चुने जाने के आसार हैं.

अब सवाल उठता है कि क्या है यह हार का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने की आदत का हिस्सा है या फिर आंतरिक गुटबाजी का परिणाम. लेकिन राजनीति के जानकार इसका क्रेडिट बीजेपी के ‘पॉलिटिकल मैनेजमेंट’ और ‘मनोवैज्ञानिक प्रभाव’ दोनों को दे रहे हैं. राजस्थान में बीजेपी को सत्ता में आए पौने तीन साल के करीब हो गए हैं. बीजेपी के सत्ता में आने के बाद लोकसभा चुनाव हुए. उसके बाद लोकसभा चुनाव में जीते कई विधायकों के कारण विधानसभा की सीटें खाली हुए सीटों पर विधानसभा उपचुनाव हुए. लोकसभा में बीजेपी ने पिछले चुनाव के मुकाबले मात खाई लेकिन विधानसभा उपचुनाव में उसने बड़ी बढ़त बनाए रखी. उसके बाद अब निकाय चुनाव हुए हैं.

वोट भले ही वार्डवार कम होते हैं लेकिन उनको साधना बड़ी चुनौती होता हैराजनीतिक विशलेषकों के मुताबिक लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे ही राष्ट्रीय और राज्यस्तर के होते हैं. उन चुनावों की स्थानीय निकाय चुनावों से तुलना करना बेमानी है. निकाय चुनाव नितांत स्थानीय स्तर के होते हैं. इसके मुद्दे स्थानीय स्तर के होते हैं. ये वो मुद्दे होते हैं जिनसे आम आदमी डे-टू-डे रू-ब-रू होता है. सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट और आवारा जानवारों से मुक्ति जैसे. निकाय और पंचायत चुनाव का दायरा छोटा होता है. लेकिन स्थानीय मुद्दे बड़े होते हैं. ये वो चुनाव है जिनमें प्रत्याशी का आम आदमी से टच ज्यादा होता है. वोट भले ही वार्डवार कम होते हैं लेकिन उनको साधना बड़ी चुनौती होता है. ऐसे में इन चुनावों में हार जीत का संदेश आगे तक जाता है. बड़े चुनावों के लिए कार्यकर्ता यहीं से तैयार होता है.

वोट शेयर में महज 0.94 प्रतिशत का अंतर थाराजस्थान के 309 निकायों में 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगर पालिकाएं हैं. इनमें कुल 10245 वार्डों में से बीजेपी ने इस बार 4,179 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. निकाय चुनावों के बाद राजस्थान पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने मतदान की डाटाशीट शेयर करते हुए बताया था कि कांग्रेस ने 3613 वार्ड जीते हैं. शेष 2444 वार्ड निर्दलीयों समेत अन्य छोटी पार्टियां आप, बसपा, माकपा, आरएलपी और अन्य पार्टियों के पास थे. इसमें बीजेपी का वोट शेयर 35.19 और कांग्रेस का 34.25 है. यानी बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर में महज 0.94 प्रतिशत का अंतर था. यह स्थिति 15 सितंबर को थी.

पुर्नमतदान में कांग्रेस ने आगे रही
14 सितंबर को निकाय चुनावों की मतगणना हुई थी. उसके बाद 16 सितंबर को जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम समेत कोटा जिले की सुकेत नगर पालिका के 9 वार्डों के कुछ बूथों पर पुर्नमतदातन हुआ था. इसकी वजह थी नतीजों के दौरान इन वार्डों के कुछ बूथों की ईवीएम में आई तकनीकी खराबी जिसके कारण वहां पुर्नमतदान कराया गया था. इनका परिणाम 17 सितंबर को आया था. इन नौ वार्डों में से कांग्रेस ने छह और बीजेपी ने तीन सीटें जीती थी. उनको मिलाकर बीजेपी कांग्रेस का कुछ आंकड़ा बदल गया था. इससे बीजेपी की जीत वाले वार्डों की संख्या 4,182 और कांग्रेस के वार्डों की संख्या 3619 हो गई. इन परिणामों के बाद वोट शेयर में मामूली घटत बढ़त हुई थी.

30 निकायों में निर्विरोध निकाय प्रमुख बना लिए
फिर निकाय प्रमुखों के लिए हुए नामांकन प्रक्रिया तक 32 निकायों में निकाय प्रमुख निर्विरोध चुन लिए गए. इनमें भीलवाड़ा और भरतपुर नगर निगमों के मेयर समेत अन्य नगर परिषद और नगरपालिकाएं शामिल थी. इनमें से 30 में भाजपा काबिज हुई. अन्य दो निकायों में से दो पर अन्य निकाय प्रमुख निर्विरोध निर्वाचित हुए. आज 273 निकायों में मतदान हुआ. इनमें 36 नगर परिषदें, 191 नगर पालिकाएं और पांच नगर निगम शामिल थे. उनमें से 231 निकायों में बीजेपी कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था. बाकी में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय था. जयपुर, जोधपुर, कोटा और सुकेत में 25 सितंबर को निकाय प्रमुख का चुनाव होना है.

खुद के पार्षदों को सुरक्षित कर निर्दलीयों पर कर दिया फोकसअब सवाल उठता है कि इतने मामूली अंतर के बावजूद क्या कारण रहा है कि बीजेपी एक तिहाई के करीब निकायों में अपना बोर्ड बना ले गई और कांग्रेस ट्रिपल फिगर तक नहीं छू पाई. राजनीति के जानकारों के अनुसार कांग्रेस के तमाम आरोपों और प्रत्यारोपों के बाद यह साफ नजर आता है कि बीजेपी की रणनीति काफी सॉलिड रही. निकाय चुनावों का रिजल्ट आने के साथ ही हालात को देखते हुए बीजेपी ने अपने सभी ऑप्शन खोल दिए. अनुभवी और जमीनी पकड़ वाले नेताओं को फील्ड में उतार दिया. खुद के पार्षदों को सॉलिड तरीके से सुरक्षित करने के बाद पूरा फोकस निर्दलीयों पर कर दिया. नो डाउट सत्ता के सभी समीकरण उसके पक्ष में थे लेकिन उसे इम्पलीमेंट करना भी बड़ा काम है जो बीजेपी ने बखूबी किया. इसका परिणाम यह हुआ कि जब कांग्रेस आरोप-प्रत्यारोपों में जुटी थी तब बीजेपी सबकुछ मैनेज करने में जुटी थी.

कांग्रेस मंथन और बीजेपी तैयारी करती रही
कांग्रेस मामूली अंतर से पीछे रहने के कारणों पर मंथन कर रही थी तब बीजेपी वोट प्रतिशत की घाटा पूर्ति के लिए आगे की रणनीति पर काम करने में जुट गई. उसने इधर उधर की बातों की बजाय निर्दलीयों पर फोकस करके रखा और 21 सितंबर की तैयारियां शुरू कर दी. उसे अपनी तैयारियों पर इतना कॉन्फिडेंस था कि वह चार निगमों में बहुमत होने के बावजूद सभी निगमों में बोर्ड बनाने के दावे करने लगी. उसका रिजल्ट भी आज देखने को मिला. जिन नगर निगमों में निर्दलीय किंगमेकर थे उन सभी में बीजेपी किंग बन गई. उसका परिणाम यह हुआ कि सीएम भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर और उससे सटे डीग में 99 प्रतिशत निकायों में अपने प्रमुख बना लिए. इनमें कई निकाय ऐसे भी थे जिनमें बीजेपी बहुमत के आसपास भी नहीं थी. फिर भी निर्दलीयों के सहयोग से वहां अपने बोर्ड बना ले गई.

पाली में कांग्रेस के 26 पार्षदों ने ही क्रॉस वोटिंग कर डाली
हालांकि बाड़ाबंदी कांग्रेस ने भी की थी लेकिन बीजेपी ने उसमें कई जगह डेंट लगा दिया. अजमेर में वह अपने पार्षदों के साथ तीन निर्दलीय पार्षद को भी कर्नाटक ले गई लेकिन फिर भी नहीं पड़ी. अजमेर में बड़ी पार्टी होने के बावजूद वह बोर्ड नहीं बना पाई. पाली में तो कांग्रेस के ही पार्षदों ने ही उसका साथ नहीं दिया. वहां कांग्रेस के 29 पार्षदों में से 26 ने क्रास वोटिंग कर दी. इसके चलते कांग्रेस प्रत्याशी के महज तीन वोट मिले. केवल बीकानेर एक ऐसा निगम रहा जहां कांग्रेस अपनी तैयारियों को अंजाम तक पहुंचा पाई और वहां बोर्ड बना लिया. यही नहीं बीजेपी की दावे से इतर पांच और निर्दलीयों के वोट भी ले गई.

नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं पाला जाताराजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि निकाय चुनावों में पार्षदों पर स्थानीय नेताओं का प्रभाव ज्यादा रहता है. वे मनोवैज्ञानिक तौर पर इस बात से सहमत होते हैं कि नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं पालना चााहिए अन्यथा उनको कोई काम नहीं हो पाएगा. अगर वे काम नहीं करवा पाएंगे तो उनकी राजनीति को पलीता लग सकता है. लिहाजा वे टूटते जल्दी हैं. इसका फायदा हमेशा सत्तारुढ़ पार्टी को ही मिलता रहा है. फिर चाहे वह बीजेपी हो या कांग्रेस. पार्षद सत्ता के साथ रहकर ही काम करवाने में सफल हो सकता है. लिहाजा हालात देखकर उसका मूड बदल जाता है या फिर बदलवा दिया जाता है.

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj