कहीं किन्नर जीते, कहीं Gen-Z छाई, 1 वोट ने भी बदला चुनावी खेल, राजस्थान निकाय चुनाव के इन नतीजों ने चौंकाया

जयपुर. राजस्थान के निकाय चुनाव के नतीजे सिर्फ राजनीतिक दलों की जीत-हार तक सीमित नहीं रहे. इन परिणामों में ऐसे कई रोचक, चौंकाने वाले और भावुक किस्से सामने आए, जिन्होंने चुनावी आंकड़ों से ज्यादा लोगों का ध्यान खींचा है. कहीं किन्नर प्रत्याशियों ने जीत दर्ज कर अपनी अलग पहचान बनाई, तो कहीं महज एक या दो वोट के अंतर ने हार-जीत का फैसला कर दिया. कुछ वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने बड़े दलों के उम्मीदवारों को शिकस्त देकर चौंकाया. कहीं जीत के अगले ही दिन परिवार में मातम छा गया, तो कहीं प्रत्याशी को खुद और उसके परिवार के सदस्यों से भी ज्यादा वोट नहीं मिल सके.
निकाय चुनाव के इन नतीजों में Gen-Z यानी युवा चेहरों की जीत भी चर्चा में रही. थानागाजी और अजमेर में युवा महिला प्रत्याशियों ने जीत दर्ज कर नई पीढ़ी की सियासत में दस्तक दी. वहीं भरतपुर, डीग और धौलपुर जैसे इलाकों में निर्दलीयों के प्रदर्शन ने स्थानीय समीकरणों की ताकत दिखाई. इन परिणामों ने साफ कर दिया कि निकाय चुनाव में पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ स्थानीय चेहरा, व्यक्तिगत पकड़, सामाजिक समीकरण और वार्ड के मुद्दे भी नतीजों पर बड़ा असर डालते हैं.
लालसोट में ‘बुआजी’ की जीत, किन्नर समुदाय की बड़ी दस्तक
लालसोट के वार्ड 34 में भाजपा की टिकट पर मीनू किन्नर ने जीत दर्ज की. स्थानीय लोगों के बीच ‘बुआजी’ के नाम से मशहूर मीनू ने पहले निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन किया था, लेकिन बाद में भाजपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी बना लिया. चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व मंत्री के एक बयान के बाद उनका मुकाबला और ज्यादा चर्चा में आ गया. आखिरकार मीनू ने जीत हासिल कर निकाय राजनीति में किन्नर समुदाय की मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई.
लूणकरणसर में सिर्फ 2 वोट से फैसला
लूणकरणसर के वार्ड 22 का परिणाम भी बेहद दिलचस्प रहा. यहां कांग्रेस की पूजा बाई किन्नर ने भाजपा के बृजलाल पुरी को महज दो वोट से हरा दिया. इस मुकाबले की सबसे खास बात यह रही कि पूरी नगरपालिका में सिर्फ दो ट्रांसजेंडर मतदाता बताए गए हैं और दोनों वार्ड 26 में रहते हैं. यानी पूजा बाई की जीत सिर्फ दो वोटों के अंतर से हुई, लेकिन इसका संदेश पूरे क्षेत्र में बड़ा रहा.
एक वोट ने बदली बाजी, जीत के अगले दिन मां का निधन
नदबई के वार्ड 6 में मुकाबला इतना करीबी रहा कि सिर्फ एक वोट ने परिणाम बदल दिया. निर्दलीय जगदीश प्रसाद को 151 वोट मिले, जबकि भाजपा के रामशरण को 150 वोट मिले. लेकिन इस जीत के साथ जुड़ी कहानी ने इसे और भावुक बना दिया. मतदान के अगले ही दिन जगदीश प्रसाद की मां का निधन हो गया. ऐसे में मां के आखिरी वोट से मिली जीत की चर्चा पूरे इलाके में होती रही.
कहीं प्रत्याशी को मिला सिर्फ एक वोट
डीडवाना-कुचामन और श्रीडूंगरगढ़ समेत कई जगहों पर भी चुनावी नतीजों ने चौंकाया. कुछ प्रत्याशियों को सिर्फ एक-एक वोट मिला. ऐसे मामले भी सामने आए, जहां प्रत्याशी को खुद या उसके परिवार से भी उम्मीद के मुताबिक वोट नहीं मिले. इन परिणामों ने निकाय चुनाव की जमीनी राजनीति और वार्ड स्तर के समीकरणों की तस्वीर सामने रख दी.
भरतपुर संभाग में पार्टी से ज्यादा चला स्थानीय चेहरों का असर
भरतपुर, डीग और धौलपुर संभाग में भी नतीजों ने स्थानीय समीकरणों की ताकत दिखाई. तीनों जिलों के 20 निकायों के 645 वार्डों में भाजपा को 194, कांग्रेस को 117 और अन्य प्रत्याशियों को 333 सीटें मिलीं. इनमें 331 निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे. भरतपुर नगर निगम में भाजपा 20 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन 65 में से 36 वार्ड निर्दलीयों के खाते में चले गए. ऐसे में बोर्ड गठन में निर्दलीयों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई.
Gen-Z जैसे स्थानीय प्रभावशाली चेहरों की भी चर्चा
राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों में जेन-जी यानी युवा चेहरों ने भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है. कई जगह पार्टी के बड़े नेताओं से ज्यादा स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले लोगों का असर दिखाई दिया. थानागाजी के वार्ड 6 में भाजपा की 21 वर्षीय नेहा शर्मा ने 101 वोट से जीत दर्ज की. नेहा को कुल 262 वोट मिले. वहीं अजमेर के वार्ड 80 में भाजपा की 21 वर्षीय काश्यपी सांखला ने शानदार जीत हासिल की. काश्यपी को 3,323 वोट मिले और उन्होंने 1,275 वोट के बड़े अंतर से चुनाव जीता. खास बात यह है कि बीटेक की छात्रा काश्यपी का यह पहला चुनाव था. दोनों युवा चेहरों की जीत ने निकाय राजनीति में नई पीढ़ी की दस्तक को मजबूत किया है.
इन नतीजों ने क्या संदेश दिया?
राजस्थान के निकाय चुनावों के इन अलग-अलग परिणामों को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ है. शहरी मतदाता सिर्फ पार्टी के चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं रहा. वार्ड में प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण और मतदाताओं से जुड़ाव ने कई जगह नतीजों की दिशा बदल दी. कहीं किन्नर प्रत्याशी की जीत ने नई मिसाल कायम की, कहीं दो वोट ने इतिहास लिख दिया और कहीं सिर्फ एक वोट ने हार-जीत का फैसला कर दिया. यही वजह है कि इस बार के निकाय चुनाव सिर्फ भाजपा-कांग्रेस की जीत-हार नहीं, बल्कि वार्ड स्तर की छोटी-छोटी कहानियों और बड़े चुनावी उलटफेर के लिए भी याद किए जाएंगे



