गांव में न मैदान था, न कोच; 9वीं की हर्लिन ने जयपुर में बहाया पसीना, अब राजस्थान में जीत लिया गोल्ड

Last Updated:August 25, 2026, 20:54 IST
Sikar News : सीकर की हर्लिन महला ने ट्राइथलॉन में गोल्ड मेडल जीता. गांव में सुविधा न होने पर भी जयपुर जाकर अभ्यास किया. अब नेशनल टूर्नामेंट पर नजर है. अजमेर में आयोजित प्रतियोगिता में हर्लिन ने ट्राइथलॉन स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया. उसने बीकानेर की एथलीट को पीछे छोड़कर 60 मीटर दौड़, लॉन्ग जंप और बॉल थ्रो में दम दिखाया. स्टेट लेवल पर यह हर्लिन का पहला गोल्ड मेडल है.
Success Story: सीकर जिले के फतेहपुर इलाके के अलफसर गांव की हर्लिन महला ने बेहद कम उम्र में खेल में अपनी अलग पहचान बनाई है. 9वीं क्लास की हर्लिन ने ट्राइथलॉन टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल अपने नाम किया है. उन्होंने बीकानेर की एथलीट को मात देते हुए 60 मीटर दौड़, लॉन्ग जंप और बैंक थ्रो में ये पदक जीता है. उन्होंने ये मेडल जीतकर खेल के प्रति अपने जुनून और मेहनत से नई मिसाल कायम की है. उनकी इस मेडल को जीतने की कहानी किसी आम खिलाड़ी जैसी नहीं है, बल्कि बाकी खिलाड़ियों से बहुत अलग है.
गांव में न मैदान था और न एथलेटिक्स का कोच, लेकिन हर्लिन ने परिस्थितियों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया. बड़ी बहन को खेल में मेडल जीतते देख उसके मन में भी खेलो मे मेडल जीतने का सपना जगा. इसी सपने को पूरा करने के लिए उसने अपनी पूरी दिनचर्या बदल दी. हर्लिन ने करीब दो साल पहले तय किया कि वह एथलेटिक्स में अपनी पहचान बनाएगी. इसके बाद उसने रोजाना स्कूल जाने के बजाय घर पर सेल्फ स्टडी करने का फैसला किया.
उन्होंने घर पर ही स्कूल की पढ़ाई शुरू की और खेल में मेहनत करना शुरू किया. जब गांव में मैदान और एथलेटिक्स का कोच नहीं मिला तो प्रैक्टिस के लिए घर छोड़कर जयपुर रहने लगी. स्कूल में रहकर पढ़ाई करने वाले किसी भी स्टूडेंट के लिए यह डिसीजन लेना आसान नहीं होता है. जयपुर जाने के बाद हर्लिन ने और अधिक मेहनत करना शुरू कार दी. यहां उन्होंने सुबह और शाम करीब तीन-तीन घंटे कड़ी प्रैक्टिस की.
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छह घंटे की रोजाना मेहनत और लगातार प्रेक्टिस से धीरे-धीरे हर्लिन का आत्मविश्वास बढ़ने लगा. उनका मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम राजस्थान स्टेट जूनियर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में सामने आया. अजमेर में आयोजित प्रतियोगिता में हर्लिन ने ट्राइथलॉन स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया. उसने बीकानेर की एथलीट को पीछे छोड़कर 60 मीटर दौड़, लॉन्ग जंप और बॉल थ्रो में दम दिखाया. स्टेट लेवल पर यह हर्लिन का पहला गोल्ड मेडल है. अब उसकी नजर नेशनल टूर्नामेंट्स पर है.
हर्लिन के खेल सफर की शुरुआत के पीछे उसकी बड़ी बहन नव्या की उपलब्धि भी खास वजह रही. नव्या कराटे की चैंपियन रह चुकी हैं और नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं. बहन को मेडल के साथ सम्मान पाते देखकर हर्लिन ने भी मन में ठान लिया कि वह खेल के मैदान में परिवार और राजस्थान का नाम रोशन करेगी. यही सोच आगे चलकर उसकी मेहनत और जुनून की सबसे बड़ी ताकत बन गई.
हर्लिन की इस कामयाबी में उसकी मां ममता की भूमिका भी बेहद अहम रही. ममता हर प्रतियोगिता में बेटी के साथ जाती हैं और उसके अभ्यास से लेकर प्रतियोगिता तक हर कदम पर हौसला बढ़ाती हैं. हर्लिन बचपन से ही खेलों में रुचि रखती थी. वह अक्सर मां से कहती थी कि जब दीदी देश के लिए मेडल ला सकती हैं तो वह क्यों नहीं ला सकती. बेटी की आंखों में यही सपना देखकर मां ने उसके हर कदम पर साथ देने का फैसला किया.
किसान परिवार से आने के बावजूद हर्लिन के परिवार ने उसके सपने के सामने आर्थिक चुनौतियों को आड़े नहीं आने दिया. चाचा एडवोकेट त्रिलोक सिंह और निर्मल जाखड़ ने भी उसे एथलेटिक्स के लिए पूरा सपोर्ट किया. मां ममता कहती हैं कि उन्हें अपनी दोनों बेटियों पर गर्व है. उनकी दूसरी बेटी भी नेशनल गोल्ड मेडल जीत चुकी है और फिलहाल बीकानेर में आगे की तैयारी कर रही है. परिवार के लिए बेटियां ही आज सबसे बड़ी पहचान बन गई हैं.
स्टेट लेवल पर पहला गोल्ड जीतने के बाद हर्लिन की नजर अब राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं पर है. उसका सपना नेशनल और इंटरनेशनल में मेडल जीतकर राजस्थान का नाम रोशन करना है. गांव में सुविधाओं की कमी से शुरू हुआ यह सफर अब बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. हर्लिन की कहानी बताती है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, परिवार का साथ मिले और मेहनत में कमी न हो तो सीमित संसाधनों के बावजूद गांव की बेटियां भी खेल के बड़े मंच पर अपनी पहचान बना सकती हैं.
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August 25, 2026, 20:54 IST



