जब कादर खान की कलम ने अमिताभ बच्चन को रुला दिया, यादगार बन गया था ब्लॉकबस्टर फिल्म का ये सीन

Last Updated:October 22, 2026, 05:01 IST
हिंदी सिनेमा में कादर खान का नाम उन कलाकारों में शुमार है, जिन्होंने अपनी कलम से बड़े-बड़े सितारों के किरदारों में जान डाल दी. उन्होंने अमिताभ बच्चन के लिए एक ऐसा सीन लिखा था, जिसे सुनकर खुद बिग बी भी भावुक हो गए थे. साल 1978 में आई फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के इस 16 पन्नों के सीन में कादर खान ने अपने निजी दर्द और जिंदगी के अनुभवों को शब्दों में पिरोया था. जब उन्होंने अपनी आवाज में यह सीन अमिताभ को सुनाया, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए. आखिर इस सीन में ऐसा क्या था, जिसने सदी के महानायक को भी भावुक कर दिया था? कादर खान का जन्म आज ही के दिन 22 अक्टूबर साल 1937 में हुआ था.
नई दिल्ली. हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं, जिन्होंने पर्दे पर अपनी एक्टिंग से ही नहीं, बल्कि अपनी कलम से भी लोगों के दिलों पर राज किया. कादर खान भी ऐसे ही कलाकारों में से एक थे. उन्होंने कभी विलेन बनकर दर्शकों को डराया, कभी अपनी कॉमेडी से लोगों को खूब हंसाया और कभी ऐसे डायलॉग लिखे, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं. उनकी लेखनी का ऐसा ही एक यादगार किस्सा अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ से जुड़ा है. बताया जाता है कि इस फिल्म के लिए कादर खान ने 16 पन्नों का एक लंबा सीन लिखा था. इसमें उन्होंने अपने निजी जीवन के दर्द और अनुभवों को भी शामिल किया था. जब उन्होंने यह सीन अमिताभ बच्चन को सुनाया, तो बिग बी इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें नम हो गईं.
साल 1978 में रिलीज हुई फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ अमिताभ बच्चन के करियर की यादगार फिल्मों में गिनी जाती है. फिल्म में उनके अभिनय के साथ-साथ दमदार डायलॉग्स ने भी दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी थी. इस फिल्म के एक खास सीन को लिखने के पीछे कादर खान के अपने अनुभव जुड़े हुए थे. इस सीन में अमिताभ बच्चन का किरदार स्टेज पर अपनी जिंदगी की कहानी बयां करता है. कादर खान ने इसे लिखते समय सिर्फ फिल्म की कहानी पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि अपने जीवन में देखे और महसूस किए दर्द को भी शब्दों में ढाल दिया. यही वजह थी कि यह सीन उनके लिए बेहद खास बन गया था.
बताया जाता है कि जब कादर खान ने यह सीन फिल्म के निर्देशक और निर्माता प्रकाश मेहरा को सुनाया, तो वह भी इसके भावनात्मक असर से प्रभावित हुए थे. हालांकि, जब यह स्क्रिप्ट अमिताभ बच्चन के पास पहुंची, तो 16 पन्नों की लंबाई देखकर वह हैरान रह गए. उन्हें लगा कि इतने लंबे डायलॉग याद करना और उन्हें पर्दे पर उसी भाव के साथ पेश करना आसान नहीं होगा. ऐसे में उन्होंने सीन को छोटा करने की बात कही.
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उस समय कादर खान दूसरी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे. कुछ समय बाद उन्हें अमिताभ बच्चन की तरफ से बुलावा आया. कादर खान को लगा कि शायद उनके लिखे सीन में कोई कमी निकाली गई है या उसमें बदलाव करने की बात होगी. लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें कुछ अलग ही देखने को मिला.कादर खान ने एक इंटरव्यू में इस किस्से का जिक्र करते हुए बताया था कि अमिताभ बच्चन ने कमरे में मौजूद बाकी लोगों को बाहर भेज दिया. इसके बाद उन्होंने कादर खान से पूरा सीन सुनाने को कहा. कादर खान ने जब अपनी आवाज में सीन पढ़ना शुरू किया, तो उसके शब्दों के साथ उसमें छिपे दर्द और भावनाओं का असर भी सामने आने लगा.
सीन सुनते-सुनते अमिताभ बच्चन भावुक हो गए और उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्हें एहसास हुआ कि यह सिर्फ लंबे डायलॉग्स का मामला नहीं था, बल्कि इन शब्दों के पीछे एक गहरी भावना छिपी हुई थी. इसी अनुभव के बाद अमिताभ ने कादर खान से कहा कि वह आगे भी अपने लिखे सीन उन्हें अपनी आवाज में रिकॉर्ड करके दिया करें, ताकि डायलॉग्स के भाव को बेहतर तरीके से समझा जा सके.
कादर खान की जिंदगी का सफर भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था. उनका जन्म साल 1937 में काबुल में हुआ था. बाद में उनका परिवार मुंबई आ गया. बचपन में उन्होंने कई मुश्किल हालात देखे, लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ कला के प्रति उनका लगाव बना रहा.उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और मुंबई के एमएच साबू सिद्दीक पॉलिटेक्निक में लेक्चरर के तौर पर काम किया. पढ़ाने के दौरान भी वह थिएटर से जुड़े रहे. स्टेज पर उनके अभिनय और लेखन ने लोगों का ध्यान खींचा और धीरे-धीरे उनके लिए फिल्मों के दरवाजे खुलने लगे.
सत्तर के दशक में उन्होंने फिल्मी दुनिया में बतौर डायलॉग राइटर अपनी पहचान बनानी शुरू की. राजेश खन्ना की फिल्म ‘रोटी’ से उन्हें खास पहचान मिली. इसके बाद मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशकों के साथ उनके काम ने उन्हें इंडस्ट्री के प्रमुख लेखकों में शामिल कर दिया.कादर खान ने ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘परवरिश’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘नसीब’ और ‘कुली’ जैसी फिल्मों के लिए यादगार डायलॉग लिखे. उनकी खासियत यह थी कि वह हर किरदार की जरूरत के हिसाब से भाषा और संवादों का अंदाज बदल लेते थे. उनके लिखे शब्दों में कभी गुस्सा दिखता था, तो कभी दर्द और कभी ऐसा हास्य, जो सीधे दर्शकों के दिल तक पहुंच जाता था.
साल 1973 में आई फिल्म ‘दाग’ से उन्होंने बतौर अभिनेता भी अपने सफर की शुरुआत की. बाद के वर्षों में गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई. ‘दुल्हे राजा’, ‘कुली नंबर 1’ और ‘हीरो नंबर 1’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमेडी ने दर्शकों को खूब हंसाया.कादर खान की खासियत यही थी कि वह शब्दों के जरिए किसी किरदार को जीवंत बना देते थे. ‘मुकद्दर का सिकंदर’ से जुड़ा यह किस्सा भी बताता है कि जब लिखने वाला अपने अनुभवों और भावनाओं को कहानी में उतार देता है, तो उसका असर सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देखने और सुनने वालों के दिल तक पहुंच जाता है.
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October 22, 2026, 05:01 IST



