जवाई में लेपर्ड केव का 1 KM दायरा बना विवाद, किसान-पशुपालक बोले- आजीविका पर नहीं चलेगी चोट

पाली. जवाई की पहाड़ियों में इंसानों और लेपर्ड्स का सह-अस्तित्व सदियों पुराना है, जहां दोनों बिना किसी टकराव के साथ रहते आए हैं. लेकिन अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद लेपर्ड केव से 1 किलोमीटर के दायरे में लग रही नई पाबंदियों ने इस कुदरती रिश्ते के बीच दीवार खड़ी कर दी है. इस नियम से स्थानीय किसानों, पशुपालकों और पर्यटन पर सीधा संकट मंडरा गया है. इसके विरोध में जवाई बेल्ट के 11 गांवों ने एकजुट होकर ‘जवाई संघर्ष समिति’ का गठन किया है और साफ कह दिया है कि सदियों पुराना नाता मंजूर है, लेकिन यह 1 किलोमीटर की पाबंदी बिल्कुल नहीं.
बलवना, बीसलपुर, पैरवा, जीवदा और सेणा समेत 11 गांवों के ग्रामीण अब एक सुर में मैदान में उतर आए हैं. ग्रामीणों का साफ कहना है कि दशकों से जो लेपर्ड उनके साथ शांति से रह रहे हैं, उनके नाम पर ऐसी पाबंदियां लगाना यहां के किसानों, पशुपालकों और स्थानीय पर्यटन पर सीधा प्रहार है. अपनी आजीविका और जवाई की इस पौराणिक संस्कृति को बचाने के लिए 11 गांवों ने एकजुट होकर ‘जवाई संघर्ष समिति’ का गठन कर लिया है और अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है.
लेपर्ड और इंसानों का यहां अलग ही रिश्ता है
पाली जिले की पथरीली अरावली पहाड़ियों की गोद में बसा जवाई… एक ऐसी तिलिस्मी जगह है जहां कुदरत का एक अनूठा और हैरान कर देने वाला नियम चलता है. यहां की ऊंची ग्रेनाइट की चट्टानों पर जब ढलते सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो पत्थरों की ओट से झांकती चमकदार आंखें किसी ख़ौफ़ का नहीं, बल्कि सदियों पुराने एक अटूट भरोसे का अहसास कराती है. यह दुनिया की इकलौती ऐसी सरजमीं है जहां खूंखार माने जाने वाले लेपर्ड और इंसान बिना किसी बाड़, दीवार या पिंजरे के एक-दूसरे के साथ बिल्कुल कदम से कदम मिलाकर रहते हैं.
रेबारी समाज की आस्था और गहराई से जुडा है रिश्ता
जवाई में लेपर्ड्स का रिश्ता यहां की आबो-हवा और रेबारी समाज यानी पशुपालकों की आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है. यहां के स्थानीय लोग तेंदुओं को सिर्फ जंगली जानवर नहीं, बल्कि अपनी आराध्य ‘माताजी का वाहन’ और पहाड़ियों का रखवाला मानते हैं. सदियों की इस सांझी विरासत में कभी इंसानों ने लेपर्ड्स के आशियाने में दखल नहीं दिया, और न ही लेपर्ड्स ने कभी इंसानी बस्तियों पर कोई हमला किया. ढलती शाम में जब गांव के मवेशी पहाड़ियों की तलहटी से गुजरते हैं और कुछ ही दूरी पर चट्टान पर बैठा लेपर्ड उन्हें खामोशी से देखता है, तो वहां डर का सन्नाटा नहीं बल्कि एक अनकहा आपसी सम्मान तैरता है. इंसानों और तेंदुओं के बीच प्यार, आस्था और सह-अस्तित्व की यह मिसाल पूरी दुनिया में बेमिसाल है.
जवाई संघर्ष समिति का किया गठन
जवाई क्षेत्र में माननीय उच्च न्यायालय के हाल ही में आए फैसले के विरोध में जवाई बेल्ट के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है. फैसले के विरोध में बलवना, बीसलपुर, पैरवा, जीवदा, सेणा, दुदनी, मोरी बेड़ा, वरावल, रघुनाथपुरा, कोठार और वेलार के ग्रामीण एकजुट हो गए हैं. ग्रामीणों ने एकजुट होकर जवाई संघर्ष समिति का गठन किया है. इसी कड़ी में जीवदा माताजी मंदिर, सेणा और वरावल हनुमानजी मंदिर गांव में बड़ी बैठकें आयोजित की गईं.
एक सुर में लिया गया फैसला
बैठकों की अगुआई किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष जयेन्द्र सिंह गल्थनी, रघुवीर सिंह जी देवड़ा बीसलपुर, जसवंत सिंह जी गल्थनी, राजपूत करनी सेना जोधपुर संभाग अध्यक्ष मनमोहन सिंह जी बीसलपुर, संग्राम सिंह वेलार, लोकेंद्र सिंह पैरवा, विक्रम सिंह जीवदा और हुपेंद्र सिंह सेणा राजेन्द्र सिंह सेणा ने की. इन बैठकों में बलवना, बीसलपुर, पैरवा, जीवदा, सेणा, दुदनी, वरावल, मोरी बेड़ा, रघुनाथपुरा, कोठार, वेलार के सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे और एक सुर में फैसला लिया गया.
लेपर्ड केव से 1 किलोमीटर की दूरी के नियम का पूर्णतया विरोध
ग्रामीणों का कहना है कि लेपर्ड केव से 1 किलोमीटर के दायरे को लेकर लिया गया निर्णय सीधा-सीधा किसानों, पशुपालकों और जवाई के पर्यटन से जुड़े लोगों के हितों पर चोट है. जवाई लेपर्ड दशकों से इंसानों के साथ सह-अस्तित्व में रह रहे हैं, इस तरह का प्रतिबंध जवाई के विकास को रोक देगा. जवाई संघर्ष समिति ने निर्णय लिया है कि इस फैसले के विरोध में आगामी दिनों में जिला कलेक्टर, पाली को शांतिपूर्ण ज्ञापन दिया जाएगा और सरकार तक अपनी बात पहुंचाई जाएगी. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांग नहीं मानी गई तो आगामी दिनों में आंदोलन को और तेज किया जाएगा.



