जिंदगी ने दिए दर्द पर सुनील ने नहीं मानी हार, पिता-बहन को खोया दोनों हाथ गंवाए और मां के हौसले से रचा इतिहास

Last Updated:August 29, 2026, 20:22 IST
Rajasthan Sunil Success Story: राजस्थान के सुनील की कहानी संघर्ष और हौसले की मिसाल है. उन्होंने पिता और बहन को खोने का दर्द झेला और अपने दोनों हाथ भी गंवा दिए. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. करीब पांच साल तक असफलताओं का सामना करने के बाद मां के हौसले और अपने जुनून के दम पर सुनील ने सफलता हासिल की. लगातार मेहनत करते हुए वह इंटरनेशनल स्तर पर मेडल जीतकर राजस्थान का नाम रोशन करने में कामयाब रहे.
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कोटा। राजस्थान के अलवर जिले के मालाखेड़ा निवासी पैरा एथलीट सुनील कुमार साहू की जिंदगी संघर्षों से भरी रही. पिता और बहन को खोने के बाद एक हादसे में उन्होंने दोनों हाथ गंवा दिए. कभी खुद से खाना तक नहीं खा पाते थे, लेकिन मां के हौसले और अपनी मेहनत से उन्होंने खेल की दुनिया में पहचान बनाई. 5 साल तक असफलताओं का सामना करने के बाद आज सुनील इंटरनेशनल सिल्वर मेडलिस्ट हैं. वे 6 बार नेशनल मेडल जीत चुके हैं और अब तक 20 पदक अपने नाम कर चुके हैं.
सुनील का जन्म एक बेहद सामान्य परिवार में हुआ. पिता राजेश साहू गर्मियों में आइसक्रीम फैक्ट्री चलाते और सर्दियों में रिक्शा चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे. साल 2012 में परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. पहले बड़े भाई का निधन हुआ और फिर आइसक्रीम फैक्ट्री में रिसीवर ब्लास्ट होने से सुनील के दोनों हाथ और एक पैर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए. महीनों आईसीयू में रहने के बाद जान तो बची, लेकिन दोनों हाथों ने काम करना बंद कर दिया. मुसीबतों का सिलसिला यहीं नहीं थमा. अस्पताल से लौटते ही पिता का साइलेंट अटैक से निधन हो गया और कुछ समय बाद बड़ी बहन भी चल बसीं. समाज ने ताने दिए कि ‘अब यह जिंदगी भर भीख मांगेगा’, लेकिन मां प्रेम देवी चट्टान बनकर खड़ी रहीं. उन्होंने घरों में झाड़ू-पोछा किया, अस्पतालों में सफाई की और बेटे को सीख दी ‘अगर बड़ा बनना है, तो पहले छोटा बनना सीखो.’
रिक्शा चलाया, प्लेटें धोईं… पर ट्रैक नहीं छोड़ासुनील का बचपन का सपना सेना में जाने का था. हादसे के बाद जब पैरालंपिक चैंपियन देवेंद्र झाझरिया की कहानी सुनी, तो उन्होंने पैरा स्पोर्ट्स में तिरंगा लहराने की ठान ली. आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन सुनील ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने पढ़ाई जारी रखकर BSTC की, शादियों में कैटरिंग और बर्तन धोने का काम किया, रिक्शा चलाया और स्कूलों में पढ़ाकर खेल का खर्च निकाला. इस कठिन दौर में छोटे भाई अनिल (जो खुद नौकरी कर परिवार संभालते रहे), बुआ के बेटे हरिओम साहू, बड़ी बहन रीना, और कोटा के हेमराज गुर्जर (जिन्होंने एक साल तक बिना पैसे लिए दूध उपलब्ध कराया) मजबूत संबल बने. कोच अजीत सिंह राठौड़, कोटा के कोच तरुण शर्मा और पवन भारद्वाज ने उन्हें नि:शुल्क कोचिंग व मार्गदर्शन दिया. वहीं, पवन राव सर (प्रतिमाह 10 हजार की मदद) और धर्मांश संस्थान 8 हजार की मदद ने उनके अभ्यास को रुकने नहीं दिया.
5 साल की नाकामी के बाद यूं रचा इतिहासशुरुआती 5 साल असफलताओं, चोटों और 4th-5th स्थान पर सिमटने के रहे. कोविड लॉकडाउन में भी उन्होंने रात-रात भर सड़कों और मैदानों में पसीना बहाया. निरंतर तपस्या रंग लाई और पिछले 3 वर्षों में सुनील ने 12 स्वर्ण, 5 रजत और 3 कांस्य समेत कुल 20 पदक अपने नाम किए है. जिनमें T-38 वर्ग: 100 मीटर और 400 मीटर दौड़ में ऑल इंडिया फर्स्ट रैंक. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 7th इंडियन ओपन पैरा एथलेटिक्स इंटरनेशनल चैंपियनशिप (बेंगलुरु) में लॉन्ग जंप में जीता सिल्वर मेडल. वहीं नेशनल गेम्स में खेलो इंडिया पैरा गेम्स, पुणे, गोवा, चेन्नई और दिल्ली नेशनल गेम्स में 6 पदक (स्वर्ण, रजत व कांस्य) इसके साथ ही राज्य स्तर जयपुर, अलवर, बीकानेर और गंगानगर राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में मल्टीपल गोल्ड और सिल्वर मेडल हासिल कर चुके हैं. देशभर से सम्मान, अब लक्ष्य पैरालंपिक गोल्ड सुनील को मेजर ध्यानचंद समर्पण अवार्ड (2024), भारत गौरव अवार्ड, स्वर्ण भारत अवार्ड और इंटरनेशनल यूथ आइकॉन अवार्ड सहित कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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August 29, 2026, 20:22 IST



