रक्षाबंधन के बाद शुरू हुई गवरी, सवा महीने तक घर नहीं लौटेंगे कलाकार, जानें मेवाड़ की अनोखी परंपरा

Last Updated:August 29, 2026, 20:21 IST
Udaipur News : मेवाड़ में प्रसिद्ध लोकनाट्य शैली गवरी की शुरुआत हुई. रक्षाबंधन के दूसरे दिन से सवा महीने तक मेवाड़ के गांवों में इसका मंचन होगा. यह भील समाज की महत्वपूर्ण परंपरा है. धार्मिक कथाओं के साथ लोककथाओं और सामाजिक प्रसंगों का मंचन करती है. इसमें भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी कथाओं को प्रमुखता से प्रस्तुत किया जाता है.
उदयपुर. मेवाड़ की प्रसिद्ध लोक परंपरा और भील समाज की प्राचीन लोकनाट्य शैली गवरी की शुरुआत हो गई है. रक्षाबंधन के दूसरे दिन यानी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकम से गवरी का आगाज होता है. इसके बाद करीब सवा महीने तक मेवाड़ के अलग-अलग गांवों में गवरी का मंचन किया जाएगा. गवरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसमें मेवाड़ की संस्कृति, धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी परंपराओं की झलक देखने को मिलती है.
गवरी को खासतौर पर भील समाज की महत्वपूर्ण परंपरा माना जाता है. मान्यता है कि समाज के कई परिवारों से कम से कम एक व्यक्ति गवरी में शामिल होता है. गवरी में शामिल होने वाले कलाकार सवा महीने तक अपने घर-परिवार से दूर रहकर इस परंपरा को निभाते हैं. इस दौरान कलाकारों की दिनचर्या भी सामान्य जीवन से अलग रहती है.
गांव-गांव पहुंचती है गवरी की टोलीगवरी के दौरान कलाकारों की टोली अलग-अलग गांवों में पहुंचती है और वहां धार्मिक कथाओं के साथ लोककथाओं और सामाजिक प्रसंगों का मंचन करती है. इसमें भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी कथाओं को प्रमुखता से प्रस्तुत किया जाता है. कलाकार नृत्य, संवाद और अभिनय के माध्यम से इन कथाओं को लोगों के सामने रखते हैं. ढोल और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के बीच होने वाला यह आयोजन ग्रामीण क्षेत्रों में खास आकर्षण का केंद्र रहता है.
सवा महीने तक नियमों का पालन करते हैं कलाकारगवरी की एक खास बात यह भी है कि इसमें शामिल कलाकार करीब सवा महीने तक कई तरह के नियमों का पालन करते हैं. इस दौरान वे अपने घर नहीं जाते और घर से दूर रहकर ही समय बिताते हैं. परंपरा के अनुसार कलाकार हरी सब्जियां, मांस और मदिरा का सेवन नहीं करते. वे अलग-अलग स्थानों पर जाकर माता गौरी की पूजा करते हैं और धार्मिक आस्था के साथ गवरी का मंचन करते हैं.
गवरी शुरू होते ही गांवों में बढ़ती है रौनकउदयपुर सहित पूरे मेवाड़ क्षेत्र में गवरी के शुरू होते ही गांवों में रौनक बढ़ जाती है. जहां भी गवरी की टोली पहुंचती है, वहां बड़ी संख्या में ग्रामीण इसे देखने के लिए जुटते हैं. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए यह आयोजन खास होता है.
मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान है गवरीगवरी मेवाड़ की ऐसी लोक परंपरा है, जिसमें धर्म, नृत्य, संगीत, अभिनय और सामाजिक संदेश एक साथ देखने को मिलते हैं. बदलते समय के बावजूद भील समाज और मेवाड़ के लोगों ने इस परंपरा को आज भी जीवित रखा है. यही वजह है कि गवरी को मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान और शान माना जाता है. सवा महीने तक चलने वाली यह परंपरा एक बार फिर गांव-गांव मेवाड़ की लोक संस्कृति की तस्वीर पेश करेगी.
About the Authorआनंद पाण्डेयContent Producer
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…
Udaipur,Rajasthan
First Published :
August 29, 2026, 20:20 IST



