दो निगमों की कहानी खत्म, बदले सियासी नक्शे में होगा भाजपा-कांग्रेस का इम्तिहान

जयपुर. राजधानी जयपुर की फिजां इन दिनों बदली हुई है. पूरा शहर चुनावी रंग में रंगा हुआ है. यानी सियासी मैदान वही जयपुर है, लेकिन चुनावी नक्शा बिल्कुल नया है. जयपुर का यही नया नक्शा भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा मौका भी. जयपुर की पिछले नगर निगम की सियासत को देखें तो तस्वीर काफी दिलचस्प रही है. 2020 में जयपुर को ग्रेटर और हेरिटेज के दो निगमों में बांटा गया था. ग्रेटर के 150 वार्डों में भाजपा ने 88 सीटों पर कब्जा जमाया था, जबकि कांग्रेस को 49 सीटें मिली थीं. दूसरी तरफ हेरिटेज में कांग्रेस 47 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और भाजपा को 42 सीटें मिली थी. यानी एक ही शहर में दो अलग-अलग सियासी तस्वीरें सामने आई थीं. अब दोनों निगमों का विलय हो चुका है.
यही वजह है कि इस बार भाजपा के सामने सिर्फ अपने मजबूत ग्रेटर इलाके को बचाने की चुनौती ही नहीं है, बल्कि पुराने हेरिटेज इलाके में भी अपनी पकड़ साबित करनी होगी. कांग्रेस के लिए भी मामला कम पेचीदा नहीं है. उसे पुराने हेरिटेज के अपने सियासी आधार को बचाने के साथ-साथ ग्रेटर के उन इलाकों में सेंध लगानी होगी, जहां पिछली बार भाजपा का दबदबा रहा था.
250 से 150 वार्ड बदली पूरी बिसात
वार्डों की तादाद 250 से घटकर 150 होना महज आंकड़ों की तब्दीली नहीं है बल्कि इसने जयपुर की पूरी चुनावी बिसात को बदल दिया है. कई पुराने वार्ड खत्म हो गए हैं. कई वार्डों की सरहदें बदल गई हैं. कई नेताओं के पुराने वोट बैंक दूसरे वार्डों में चले गए हैं. यानी जो नेता कल तक अपने वार्ड का बेताज बादशाह था, जरूरी नहीं कि आज नए वार्ड में भी उसकी वही हैसियत हो. अब हर पार्टी को नए सिरे से देखना होगा कि किस वार्ड में किसका असर है. किस उम्मीदवार की पकड़ है. किस समाज का वोट कहां निर्णायक है और किस चेहरे के पीछे बूथ तक कार्यकर्ता खड़ा है.
94 वार्ड सामान्य वर्ग के लिए खुले हैंइसलिए इस चुनाव में सबसे अहम सवाल होगा कि किस पार्टी का टिकट किस चेहरे को और किस वार्ड में मिलता है? वहीं आरक्षण ने भी कई सियासी समीकरण बदल दिए हैं. 150 वार्डों के आरक्षण ने भी कई पुराने दावेदारों के अरमानों पर पानी फेर दिया है. 20 वार्ड एससी, 6 एसटी और 30 वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित हैं. जबकि 94 वार्ड सामान्य वर्ग के लिए रखे गए हैं. इसके साथ ही महिला आरक्षण ने भी सियासी तस्वीर में बड़ा बदलाव किया है. कई पुराने पार्षदों के लिए चुनाव लड़ने की राह बंद हो गई है तो कई नए चेहरों के लिए दरवाजे खुल गए हैं. अब देखना यह होगा कि भाजपा और कांग्रेस आरक्षण को सिर्फ सामाजिक समीकरण के तौर पर देखती हैं या फिर स्थानीय पकड़, लोकप्रियता और जीतने को भी उतनी ही अहमियत देती है. क्योंकि नगर निगम चुनाव में जातीय गणित जरूरी है. लेकिन सिर्फ जातीय गणित से चुनाव जीतना हमेशा मुमकिन नहीं होता है.
मेयर की कुर्सी…असली खेल यहां से शुरू होगाजयपुर का मेयर पद इस बार अनारक्षित है. यानी सामान्य वर्ग के नेताओं के लिए यह कुर्सी खुली है. जाहिर है कि दोनों पार्टियों में इस कुर्सी को लेकर अंदरखाने सियासी हलचल बढ़ना तय है. लेकिन फिलहाल मेयर का चेहरा तय करने से ज्यादा जरूरी है बोर्ड में बहुमत हासिल करना. क्योंकि पहले 150 पार्षदों में लीड लेनी होगी और फिर बोर्ड पर पकड़ बनानी होगी. उसके बाद मेयर की कुर्सी के लिए पार्टी के भीतर दावेदारों के बीच सामजंस्य बिठाना होगा. दूसरे शब्दों में कहें तो मेयर की जंग अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन उसके लिए बिसात जरूर बिछ चुकी है.
भाजपा के पास सत्ता का फायदा, लेकिन जिम्मेदारी भी बड़ी
भाजपा के लिए जयपुर नगर निगम चुनाव में कई चीजें उसके हक में जाती हैं. सबसे पहली बात पिछले चुनाव में ग्रेटर इलाके में पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा था. दूसरी बात राजस्थान में भाजपा की सरकार है. तीसरी बात जयपुर में भाजपा का संगठन लंबे वक्त से मजबूत माना जाता रहा है. लेकिन सत्ता के साथ जवाबदेही भी आती है. कांग्रेस इस चुनाव को सिर्फ नगर निगम का चुनाव नहीं रहने देना चाहेगी. वह इसे भाजपा सरकार के ढाई साल के कामकाज से जोड़ने की कोशिश करेगी. भाजपा के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है. एक तरफ उसे अपने संगठन की ताकत को वोट में तब्दील करना है. दूसरी तरफ जनता को यह यकीन दिलाना है कि राज्य की सत्ता का फायदा जयपुर की गलियों और मोहल्लों तक भी पहुंचा है.
भाजपा के दरबार में 2500 से ज्यादा दावेदारटिकट के लिए भाजपा के सामने दावेदारों की लंबी कतार है. जयपुर भाजपा को 2500 से ज्यादा आवेदन मिले हैं. कई वार्डों में तीन-तीन नामों के पैनल तैयार किए जा रहे हैं और सर्वे तथा फीडबैक के आधार पर उम्मीदवारों की छंटनी की जा रही है. करीब एक हजार महिला दावेदारों का सामने आना भी पार्टी के लिए एक अहम संकेत है. भाजपा की कोशिश पुराने चेहरों और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाने की है. लेकिन यही उसके लिए सबसे बड़ा इम्तिहान भी है. क्योंकि टिकट 150 सीटों के लिए देना है और दावेदार 2500 से ज्यादा है. टिकट के ऐलान के बाद पार्टी के सामने एक और जंग खड़ी हो सकती है. वह है बगावत की जंग. टिकट नहीं मिला तो बागी मैदान में उतरेंगे. निर्दलीय ताल ठोकेंगे और कई जगह पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का खेल बिगाड़ेगें.
कांग्रेस ने युवाओं पर लगाया है बड़ा दांवकांग्रेस इस चुनाव में एक अलग रणनीति के साथ आगे बढ़ती नजर आ रही है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने निकाय और पंचायत चुनावों में 50 साल से कम उम्र के उम्मीदवारों को 50 फीसदी टिकट देने की बात कही है. यानी कांग्रेस पुराने चेहरों के साथ नई पीढ़ी के नेताओं को मैदान में उतारने की तैयारी में है. युवा दावेदारों के लिए डिजिटल आवेदन और अलग स्तर पर स्क्रीनिंग की कवायद भी इसी रणनीति का हिस्सा है. कांग्रेस की रणनीति साफ है कि नए चेहरे, नया जोश और स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा को घेरना. लेकिन कांग्रेस के सामने भी सवाल कम नहीं हैं. क्या नए चेहरे पार्टी को नई ताकत देंगे? क्या पुराने नेता इन नए चेहरों के साथ खड़े होंगे? सबसे अहम क्या टिकट वितरण के बाद पार्टी अपने ही नेताओं को एकजुट रख पाएगी?



