धनाऊ के खेताराम के अनोखे पट्टू पर दिखती है थार की दुनिया, काला हिरण से गोडावण तक; देखते ही ठहर जाती हैं नजरें

Last Updated:September 26, 2026, 17:41 IST
Dhanau Barmer News: थार की पहचान सिर्फ रेत के धोरों और रेगिस्तानी जीवन से नहीं बल्कि यहां की अनोखी वन्यजीव दुनिया से भी है. इसी पहचान को पारंपरिक पट्टू कला के साथ जोड़कर धनाऊ निवासी खेताराम सुम्बरा एक अनोखा काम कर रहे हैं. वे पट्टू पर थार के उन वन्यजीवों की आकृतियां उकेर रहे हैं जिनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है
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बाड़मेर. रेत के धोरों में लुप्त होती वाइल्डलाइफ को आपने तस्वीरों या जंगल सफारी में तो देखा होगा लेकिन सीमावर्ती बाड़मेर जिले के धनाऊ के खेताराम सुम्बरा इन्हीं वन्यजीवों को पट्टू के धागों में उतार रहे हैं. उनके हाथों से तैयार पट्टू पर कहीं गोडावण की आकृति नजर आती है तो कहीं काला हरिण दौड़ता दिखाई देता है और कुरजां की उड़ान भी डिजाइन का हिस्सा बनी हुई है.
थार की पहचान सिर्फ रेत के धोरों और रेगिस्तानी जीवन से नहीं बल्कि यहां की अनोखी वन्यजीव दुनिया से भी है. इसी पहचान को पारंपरिक पट्टू कला के साथ जोड़कर धनाऊ निवासी खेताराम सुम्बरा एक अनोखा काम कर रहे हैं. वे पट्टू पर थार के उन वन्यजीवों की आकृतियां उकेर रहे हैं जिनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है. उनके बनाए पट्टू पर कहीं गोडावण नजर आता है तो कहीं काला हरिण दौड़ता दिखाई देता है वहीं कुरजां की आकृति भी पारंपरिक डिजाइन में अपनी अलग पहचान बनाती है.
पट्टू की पारंपरिक डिजाइन में विलुप्त होते वन्यजीवखेताराम पट्टू की पारंपरिक कला को सिर्फ कपड़े तक सीमित नहीं रख रहे है बल्कि उसमें थार की प्राकृतिक विरासत को भी शामिल कर रहे हैं. खेताराम पट्टू की पारंपरिक कला के साथ वन्यजीवों को जोड़कर कुशन कवर, वॉल हैंगिंग, पर्दे, शॉल और स्टॉल तैयार कर रहे हैं. उनकी यह कला अब धनाऊ तक सीमित नहीं है बल्कि दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद और महाराष्ट्र समेत देश के अलग-अलग राज्यों की प्रदर्शनियों तक पहुंच रही है.
लुप्त होती प्रजातियों को कला के जरिए याद रखने की कोशिशखेताराम सुम्बरा लोकल18 से बातचीत करते हुए बताते है कि गोडावण, काला हरिण और कुरजां थार की प्राकृतिक पहचान का हिस्सा हैं ऐसे में इन वन्यजीवों को पट्टू की डिजाइन में शामिल करने का मकसद केवल खूबसूरती बढ़ाना नहीं है बल्कि लोगों तक इनके बारे में एक संदेश पहुंचाना भी है. उनके मुताबिक जब कोई व्यक्ति पट्टू अपने घर में सजाता या पहनता है तो उसके साथ थार की वन्यजीव विरासत भी लोगों तक पहुंचती है.
पिछले 10 सालों से यह काम कर रहेखेताराम बताते है कि वे पिछले 10 सालों से यह काम कर रहे है. उनके मुताबिक वे महज आठवी पास है लेकिन छोटे से ग़ांव से उनके पट्टू कला की महक अब देश के अलग अलग राज्यो तक पहुँच रही है. वे बताते है कि इसे पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है. वे इस कला को अपने पिता और दादा से सीखे है लेकिन अब मांग के अनुसार इसमें बदलाव करके नवाचार किया जा रहा है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Barmer,Rajasthan
First Published :
September 26, 2026, 17:41 IST



