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‘धर्म चुनते नहीं, विरासत में मिलता है’, जावेद अख्तर ने धर्म और आस्था पर फिर उठाए सवाल

नई दिल्ली. जावेद अख्तर अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं. फिल्मों और गीतों से इतर वह अकसर धर्म, आस्था, तर्क और समाज से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं. अब हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने धर्म को लेकर ऐसा सवाल उठाया है, जिसने एक बार फिर बहस छेड़ दी है. उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग जिस धर्म में पैदा होते हैं, उसी को पूरी जिंदगी मानते रहते हैं. इसी बात के जरिए उन्होंने सवाल किया कि आखिर कितने लोग अपने धार्मिक विश्वासों को खुद जांचने-परखने के बाद अपनाते हैं. हाल ही में ‘एक्सप्रेस हिंदी’ के साथ बातचीत में जावेद अख्तर ने धर्म, आस्था और नास्तिकता पर खुलकर बात की.

जावेद अख्तर पिछले पांच दशकों से भारतीय सिनेमा और साहित्य का एक प्रमुख चेहरा रहे हैं. एक कवि, गीतकार और पटकथा लेखक के रूप में उन्होंने ‘शोले’, ‘दीवार’ और ‘जंजीर’ जैसी ऐतिहासिक फिल्मों की कहानियां लिखी हैं और भारतीय समाज की सोच को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हाल ही में सौरभ द्विवेदी के साथ इस बातचीत में जावेद अख्तर ने माना कि मुश्किल वक्त में धर्म इंसान को इमोशनल सहारा दे सकता है. हालांकि, उन्होंने सवाल किया कि अगर किसी विश्वास से किसी व्यक्ति को सुकून मिलता है, तो क्या सिर्फ यही उस विश्वास के सच होने का सबूत माना जा सकता है? इससे पहले भी वो धर्म, आस्था और नास्तिकता पर बात कर चुके हैं. 

‘धर्म सुकून दे सकता है, लेकिन…’

जावेद अख्तर ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘कई बार इंसान किसी ‘ऊपर वाली ताकत’ पर इसलिए भरोसा करता है क्योंकि इससे उसे यह एहसास मिलता है कि कोई उसकी देखभाल कर रहा है.’ उन्होंने आगे कहा कि यह भावना इंसान को मानसिक राहत तो दे सकती है, लेकिन इससे उस विश्वास की सत्यता साबित नहीं होती.

एलन मस्क का दिया उदाहरण

अपनी बात समझाने के लिए जावेद अख्तर ने एलन मस्क का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति दिल से यह मान ले कि एलन मस्क उसका भाई है. इसके अगले महीने उसे अरबों डॉलर मिलने वाले हैं, तो यह सोच उसे खुश और सुरक्षित महसूस करा सकती है. लेकिन सिर्फ उस विश्वास से यह बात सच नहीं हो जाएगी. उन्होंने तर्क दिया कि किसी चीज पर विश्वास करने से मिलने वाला सुकून और उस चीज के सच होने के बीच अंतर है. इसी उदाहरण के जरिए उन्होंने आस्था और वास्तविकता के बीच फर्क समझाने की कोशिश की.

’99 फीसदी लोग उसी धर्म में मरते हैं’

जावेद अख्तर ने धर्म को लेकर सबसे अहम सवाल उस वक्त उठाया, जब उन्होंने कहा कि करीब 99 फीसदी लोग उसी धर्म में मरते हैं, जिसमें उनका जन्म हुआ था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आस्था या धार्मिक पहचान कभी भी इंसान का अपना स्वतंत्र या सचेत चुनाव नहीं होती. उन्होंने आंकड़ों और व्यावहारिक सच्चाई का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया के 99 प्रतिशत लोग उसी धर्म में मर जाते हैं, जिसमें वे पैदा होते हैं. इसका सीधा अर्थ यह है कि लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं को खुद तलाशने के बजाय, बचपन में अपने माता-पिता और परिवार से विरासत में प्राप्त करते हैं और जीवनभर बिना सवाल किए उनका पालन करते हैं.

व्यक्ति नहीं, ‘विचार और तर्क’ विश्वास पर हो

जावेद अख्तर ने इस बात पर जोर दिया कि इंसानों और उनके विचारों को अलग-अलग करके देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा- ‘हमारी कहानी अलग है. हम किसी व्यक्ति पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करते, हम विचारों, तर्क और लॉजिक पर भरोसा करते हैं. कोई व्यक्ति कल को अपनी बात बदल सकता है, लेकिन तर्क की कसौटी हमेशा एक जैसी रहती है. धार्मिक व्यक्ति अकसर किसी व्यक्ति या परंपरा पर विश्वास करता है… जैसा उसके माता-पिता ने कहा या किसी संत ने बताया. दुनिया में 10 मुख्य धर्म हैं और यह कहना कि ‘सभी धर्म एक समान हैं’ पूरी तरह से बकवास है. वे सभी एक-दूसरे से काफी अलग हैं.’

नास्तिकता पर पहले भी खुलकर बोल चुके हैं जावेद अख्तर

जावेद अख्तर लंबे समय से खुद को नास्तिक बताते रहे हैं. जून 2026 में एक सोशल मीडिया यूजर को जवाब देते हुए भी उन्होंने खुद को नास्तिक बताया था और कहा था कि उनकी ‘कौम’ सभी भारतीय हैं. धर्म और ईश्वर के अस्तित्व पर उनकी सार्वजनिक बहस भी पहले चर्चा में रही है. दिसंबर 2025 में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में जावेद अख्तर और इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच ‘Does God Exist?’ विषय पर करीब दो घंटे की बहस हुई थी.

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