पेसमेकर लगते ही 69 साल की हार्ट पेशेंट को हुआ दो बार संक्रमण, आखिर में इससे बची जान

हार्ट की बीमारियां हों या ब्रेन की, आज मॉडर्न साइंस लगातार नए-नए इलाज खोज रही है. ऐसा ही एक मामला हाल ही में आया है. जब हार्ट में 100 फीसदी ब्लॉकेज के बाद 69 साल की महिला को पेसमेकर लगा दिया गया, लेकिन इससे उन्हें संक्रमण हो गया. जब उन्हें अस्पताल लाया गया तो इसे निकालकर उन्हें सीने के दायीं ओर पेसमेकर लगाना पड़ा, लेकिन इससे भी संक्रमण फैल गया. आखिर में मरीज को पारंपरिक की जगह एडवांस्ड ड्यूल-चेंबर लीडलेस पेसमेकर लगाया गया, जिससे उनकी जान बच गई.
बता दें कि बिहार की रहने वाली मरीज सीतापति देवी को 6 महीने पहले कंप्लीट हार्ट ब्लॉकेज डायग्नोज हुआ था, यह एक गंभीर स्थिति है जिसमें दिल के इलेक्ट्रिकल सिग्नल ठीक से काम नहीं करते और नियमित हार्टबीट बनाए रखने के लिए पेसमेकर की जरूरत होती है. मार्च में बिहार में उनकी छाती के बाईं ओर से ड्यूल-चेंबर पेसमेकर इम्प्लांट किया गया. हालांकि, बाद में पेसमेकर वाली जगह पर उन्हें संक्रमण हो गया, जिसके बाद डिवाइस को निकालना पड़ा. इसके बाद उन्हें टेम्परेरी पेसमेकर पर रखा गया.
जुलाई में बिहार में ही उनकी छाती के दाईं ओर से दूसरा पारंपरिक ड्यूल-चेंबर पेसमेकर लगाया गया. लेकिन इस बार भी नई पेसमेकर साइट पर उन्हें संक्रमण हो गया, जिसमें पस डिस्चार्ज होने लगा और एक घाव बन गया जिससे लगातार रिसाव होता रहा. इसके बाद उन्हें एडवांस्ड इलाज के लिए मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज लाया गया.
जांच के दौरान मरीज ने चक्कर आना, बीच में बुखार, बेचैनी और पेसमेकर वाली जगह पर दर्द की शिकायत की. इस जटिल मामले को देखते हुए, डॉ . चयन वर्मानी, सीनियर कंसल्टेंट कार्डियोलॉजी, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज के नेतृत्व में कार्डियोलॉजी टीम ने ड्यूल-चेंबर लीडलेस पेसमेकर लगाने का फैसला किया.
डॉ. वर्मानी ने कहा, “यह एक चुनौतीपूर्ण मामला था क्योंकि मरीज को अपने गृहनगर में कुछ महीनों के भीतर दो पारंपरिक पेसमेकर प्रक्रियाओं के बाद संक्रमण हो गया था. लगातार संक्रमण होने की स्थिति में एक और पारंपरिक पेसमेकर इम्प्लांटेशन से और भी चुनौतियां पैदा हो सकती थीं. ऐसे में ड्यूल-चेंबर लीडलेस पेसमेकर ने पेसमेकर पॉकेट और डिवाइस को दिल से जोड़ने वाले तारों की जरूरत को खत्म करते हुए एक विकल्प दिया. प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई और मरीज अच्छी तरह ठीक हो गईं.”
इस तकनीक के फायदों के बारे में बताते हुए डॉ. चयन वर्मानी ने आगे कहा, “पारंपरिक पेसमेकर के विपरीत, लीडलेस पेसमेकर को ग्रोइन (जांघ के जोड़) की एक नस के जरिए सीधे दिल के अंदर रखा जाता है और इसके लिए कॉलरबोन के नीचे किसी चीरे या पेसमेकर पॉकेट की जरूरत नहीं होती. यह उन मरीजों के लिए खासतौर पर उपयोगी हो सकता है जिन्हें पेसमेकर से जुड़ा संक्रमण बार-बार होता है, क्योंकि इसमें डिवाइस पॉकेट और छाती से दिल तक जाने वाले तारों की जरूरत नहीं पड़ती.”
यह ड्यूल-चेंबर लीडलेस पेसमेकर पेसिंग की एक एडवांस्ड तकनीक है, जिसमें दिल के अलग-अलग चैंबर में दो छोटी डिवाइस लगाई जाती हैं. ये डिवाइस वायरलेस तरीके से आपस में संपर्क करके दिल की लय को तालमेल में रखने में मदद करती हैं. सिंगल-चैंबर लीडलेस पेसमेकर की प्रक्रिया अधिक बार की जाती है, जबकि ड्यूल-चेंबर लीडलेस पेसमेकर इम्प्लांटेशन के लिए दोनों डिवाइस को सटीक तरीके से रखने और विशेष विशेषज्ञता की जरूरत होती है.
प्रक्रिया के बाद मरीज की रिकवरी बिना किसी परेशानी के हुई, और प्रक्रिया के दो दिन बाद उन्हें स्थिर हालत में अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. यह मामला दिखाता है कि नई लीडलेस पेसमेकर तकनीक उन चुनिंदा मरीजों के लिए कैसे एक विकल्प बन सकती है, जिन्हें पारंपरिक पेसमेकर से लगातार जटिलताएं होती हैं.



