Rajasthan

बढ़ा मतदान किसके पक्ष में? क्या बदलेगा सत्ता का गणित? जयपुर-जोधपुर के आंकड़े दे रहे बड़े संकेत

जयपुर. राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के दूसरे चरण में मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक दलों की धड़कन बढ़ा दी है. 147 नगरीय निकायों में हुए मतदान का अंतिम आंकड़ा 70.68 प्रतिशत रहा. शुरुआती आंकड़ों में शाम 6 बजे तक 70.01 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ था, लेकिन अपडेटेड आंकड़ों में यह बढ़कर 70.68 प्रतिशत पहुंच गया. पहले चरण में 162 निकायों में 76.41 प्रतिशत मतदान हुआ था. इस तरह दोनों चरणों में प्रदेश के सभी 309 नगरीय निकायों के लिए मतदान पूरा हो गया है. अब 14 सितंबर को आने वाले परिणाम आने वाला है.

अब यह आने वाले परिणाम तय करेंगे कि बढ़ा हुआ मतदान सत्ता परिवर्तन का संकेत है या मौजूदा राजनीतिक समीकरण ही कायम रहते हैं. दूसरे चरण में जयपुर समेत छह नगर निगमों और कई नगर परिषदों व नगरपालिकाओं में मतदान हुआ. बड़े शहरों में जोधपुर में 71.95 प्रतिशत, उदयपुर में 69.77 प्रतिशत, कोटा में 67.66 प्रतिशत, भीलवाड़ा में 63.71 प्रतिशत, अजमेर में 63.65 प्रतिशत और जयपुर में 63.55 प्रतिशत मतदान हुआ. खास बात यह है कि जयपुर में इस बार मतदान ने पिछले कई चुनावों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.

जयपुर में रिकॉर्ड वोटिंग के क्या हैं मायने

जयपुर में इस बार 63.55 प्रतिशत मतदान हुआ. पिछले चुनावों के आंकड़ों से तुलना करें तो 2004 में यहां 41.30 प्रतिशत, 2009 में 51.80 प्रतिशत, 2014 में 60 प्रतिशत और 2020 में 57.82 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ था. यानी 2020 के मुकाबले इस बार करीब 5.73 प्रतिशत अंक ज्यादा मतदान हुआ है. 2014 की तुलना में भी करीब 3.55 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई है. जयपुर के आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राजधानी में लंबे समय से मतदान प्रतिशत को लेकर चिंता रही है. इस बार मतदाताओं की ज्यादा भागीदारी ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए नए राजनीतिक समीकरण खड़े कर दिए हैं.

ज्यादा मतदान को सामान्य तौर पर सत्ता विरोधी रुझान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन निकाय चुनाव में वार्ड स्तर के प्रत्याशी, स्थानीय मुद्दे और संगठन की पकड़ भी नतीजों को प्रभावित करती है. भाजपा इसे अपने पक्ष में मतदान बढ़ने का संकेत मान रही है, जबकि कांग्रेस के लिए यह बदलाव की संभावित जमीन के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि रिकॉर्ड वोटिंग अपने आप में किसी एक दल की जीत की गारंटी नहीं है.

जोधपुर में सबसे ज्यादा मतदान, उदयपुर और कोटा भी आगे

दूसरे चरण के बड़े नगर निगमों में जोधपुर 71.95 प्रतिशत मतदान के साथ सबसे आगे रहा. उदयपुर में 69.77 प्रतिशत, कोटा में 67.66 प्रतिशत, भीलवाड़ा में 63.71 प्रतिशत और अजमेर में 63.65 प्रतिशत मतदान हुआ. इन शहरों में पिछले चुनाव के आंकड़ों के साथ तुलना भी अब राजनीतिक विश्लेषण का अहम आधार बन गई है. वहीं छोटे निकायों में मतदान का उत्साह बड़े शहरों से भी ज्यादा रहा. चोमू नगरपालिका में 91.60 प्रतिशत, गोलूवाला में 90.03 प्रतिशत, अलवर के बायोदेब में 89.79 प्रतिशत, कोटकासिम में 89.56 प्रतिशत और मुंडावर में 88.97 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ.

कई छोटे कस्बों में 85 से 90 प्रतिशत के बीच मतदान ने स्थानीय चुनावों में मतदाताओं की सक्रियता को दिखाया है. यहां पानी, सड़क, सफाई, सीवरेज, अतिक्रमण और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे मतदान के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. ऐसे निकायों में कुछ वार्डों में बेहद कम अंतर से जीत-हार होने की संभावना है, इसलिए ज्यादा मतदान का असर सीधे बोर्ड के गणित पर पड़ सकता है.

 भीलवाड़ा में इस बार घटा मतदान का प्रतिशत

जहां जयपुर में मतदान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, वहीं भीलवाड़ा का आंकड़ा अलग कहानी बता रहा है. यहां इस बार 63.71 प्रतिशत मतदान हुआ. पिछले चुनावों में भीलवाड़ा में 2005 में 68.62 प्रतिशत, 2010 में 63.71 प्रतिशत, 2015 में 68.89 प्रतिशत और 2021 में 67.13 प्रतिशत मतदान हुआ था. यानी 2021 के मुकाबले इस बार भीलवाड़ा में करीब 3.42 प्रतिशत अंक की गिरावट आई है. 2015 के मुकाबले गिरावट और ज्यादा है. मतदान में यह कमी भाजपा और कांग्रेस दोनों के स्थानीय रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय है. अब राजनीतिक दल यह आकलन कर रहे हैं कि कम मतदान का असर किसके वोट बैंक पर पड़ा और किस दल के समर्थक अपेक्षाकृत ज्यादा संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचे.

बढ़े मतदान का मतलब कहीं सत्ता परिवर्तन तो नहीं

निकाय चुनावों में मतदान प्रतिशत और सत्ता परिवर्तन के बीच संबंध हमेशा सीधा नहीं रहा है. जयपुर के पिछले आंकड़े इसकी तस्वीर दिखाते हैं. 2004 में 41.30 प्रतिशत मतदान के बाद भाजपा का बोर्ड बना, 2009 में 51.80 प्रतिशत मतदान के बीच कांग्रेस सत्ता में आई. 2014 में मतदान बढ़कर 60 प्रतिशत हुआ तो भाजपा का बोर्ड बना. 2020 में 57.82 प्रतिशत मतदान के बाद जयपुर ग्रेटर में भाजपा और हेरिटेज में कांग्रेस का बोर्ड बना.

इसलिए सिर्फ मतदान प्रतिशत बढ़ने को सत्ता विरोधी लहर मानना जोखिम भरा होगा. इस बार जयपुर में 63.55 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग हुई है, लेकिन यह बढ़ा हुआ मतदान भाजपा के पक्ष में गया या कांग्रेस के, यह वार्डवार नतीजों के बाद ही साफ होगा. दूसरे शहरों में भी यही स्थिति है. जोधपुर में 71.95 प्रतिशत, उदयपुर में 69.77 प्रतिशत और कोटा में 67.66 प्रतिशत मतदान ने मुकाबले को रोचक बना दिया है. राजनीतिक दल अपने-अपने संगठन, प्रत्याशी और बूथ मैनेजमेंट के आधार पर जीत के दावे कर रहे हैं.

छह निगमों में भाजपा, तीन में कांग्रेस का दावा

चुनाव के बाद राजनीतिक गलियारों में छह नगर निगमों में भाजपा, तीन में कांग्रेस और एक में निर्दलीय मेयर बनने की संभावनाओं को लेकर अलग-अलग आकलन चल रहे हैं. हालांकि यह केवल राजनीतिक अनुमान हैं. असली तस्वीर 14 सितंबर को मतगणना के बाद सामने आएगी. इस चुनाव में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका भी अहम हो सकती है. कई वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बागी प्रत्याशी मैदान में रहे हैं. ऐसे में यदि किसी नगर निगम या नगर परिषद में दोनों प्रमुख दल बहुमत के आंकड़े से दूर रहते हैं तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड बनाने में निर्णायक हो सकते हैं.

14 सितंबर को खुलेगा बढ़े मतदान का राज

दोनों चरणों में मतदान पूरा होने के बाद अब प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में बंद है. भाजपा और कांग्रेस ने भी अपने प्रत्याशियों और संभावित विजेताओं को लेकर रणनीति बनानी शुरू कर दी है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि रिकॉर्ड मतदान किसके पक्ष में गया. जयपुर में 2020 के 57.82 प्रतिशत से बढ़कर 63.55 प्रतिशत मतदान, जोधपुर में 71.95 प्रतिशत वोटिंग और छोटे निकायों में 90 प्रतिशत के आसपास पहुंचा मतदान चुनाव के सबसे बड़े संकेत हैं. वहीं भीलवाड़ा में 2021 के 67.13 प्रतिशत से घटकर 63.71 प्रतिशत मतदान अलग संदेश दे रहा है. अब 14 सितंबर को मतगणना के साथ इन आंकड़ों का राजनीतिक मतलब भी सामने आएगा. तभी पता चलेगा कि राजस्थान के शहरी मतदाताओं ने बदलाव के लिए वोट किया है या फिर मौजूदा राजनीतिक समीकरण को ही बरकरार रखा है.

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