बीकानेर की अनूठी आकाशिया परंपरा

Last Updated:October 30, 2026, 08:16 IST
Bikaner Akashiya Tradition: राजस्थान के बीकानेर में दीपावली से करीब एक महीने पहले शरद पूर्णिमा से ही घरों की छतें जगमगाने लगती हैं. यहाँ पूर्वजों की स्मृति और लोक संस्कृति के प्रतीक के रूप में ‘आकाशिया’ यानी आकाशदीप जलाने की सदियों पुरानी परंपरा है, जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलती है. जैन समाज के कारीगर मथेरान कला और पारंपरिक शिल्पकला के माध्यम से गत्ते, कागज और अबरी से इन सुंदर आकाशियों को तैयार करते हैं. इनमें सरसों या तिल्ली के तेल का दीपक जलाकर छतों पर रखा जाता है, जो दूर से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता है.
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Bikaner: दीपावली का त्योहार आते ही देश भर के घरों और बाजारों में रोशनी की रौनक छा जाती है, लेकिन राजस्थान के बीकानेर में दीपावली से करीब एक महीना पहले ही घरों की छतें जगमगाने शुरू हो जाती हैं. यहाँ शरद पूर्णिमा के पावन अवसर से आकाशदीप जलाने की एक बेहद अनूठी परंपरा शुरू हो जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘आकाशिया’ कहा जाता है. यह केवल घर की सजावट का साधन मात्र नहीं है, बल्कि बीकानेर की अनूठी लोक संस्कृति, गहरी धार्मिक आस्था और दिवंगत पूर्वजों की स्मृति से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है. कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाली इस परंपरा के तहत लोग अपने घरों की छतों पर आकाशिया लगाकर नियमित रूप से दीप जलाते हैं.
स्थानीय कलाकार कृष्ण चंद्र पुरोहित बताते हैं कि आकाशिया बीकानेर की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. मान्यता है कि कार्तिक महीने में दिवंगत पूर्वजों को प्रकाश मिले, इसी पवित्र भावना के साथ घरों की छतों पर आकाशदीप जलाए जाते हैं. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी शहर के कई परिवारों में इसका विशेष महत्व है. बीकानेर का पारंपरिक आकाशिया अपनी खास बनावट और सजावट के कारण भी अलग पहचान रखता है. जैन समाज के कारीगर पारंपरिक मथेरान कला के माध्यम से गत्ते पर रंग-बिरंगी झालर और अबरी लगाकर इसे बेहद खूबसूरत तरीके से तैयार करते हैं. इसके अंदर दीपक रखने की विशेष व्यवस्था होती है, जिसमें बाती डालकर सरसों या तिल्ली का तेल भरा जाता है और फिर उसे जलाकर घर की छत पर स्थापित किया जाता है. बाजार में यह पारंपरिक आकाशिया बेहद किफायती दामों पर आसानी से उपलब्ध हो जाता है.
शरद पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक रहती है विशेष रौनकबीकानेर में आकाशिया लगाने की यह परंपरा शरद पूर्णिमा से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक अनवरत चलती है. जानकारों के अनुसार शरद पूर्णिमा का धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व माना गया है. इस दिन से कार्तिक महीने के कई महत्वपूर्ण अनुष्ठान और परंपराएं शुरू होती हैं. इस समयावधि में खीर का भोग लगाने और भगवान की पूजा करने जैसी धार्मिक गतिविधियां भी संपन्न की जाती हैं. आकाशिया लगाने के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ अपनी परिवार और समाज की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की मजबूत भावना भी जुड़ी होती है. घर की छत पर जलता हुआ यह दीपक अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाने के साथ-साथ पूर्वजों के प्रति सम्मान और अटूट श्रद्धा का संदेश भी प्रसारित करता है.
रामायणकाल और पौराणिक मान्यताओं से भी जुड़ी है परंपराआकाशदीप जलाने की इस परंपरा को लेकर कई तरह की पौराणिक मान्यताएं भी समाज में प्रचलित हैं. कुछ मान्यताओं के अनुसार आकाशदीप जलाने का संबंध भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने से भी जोड़ा जाता है. ऐसा कहा जाता है कि लंका विजय के बाद जब प्रभु श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तब नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका भव्य स्वागत किया था. कुछ लोक कथाओं में ऊंचाई पर दीप प्रज्वलित करने की इस परंपरा को उसी दीपोत्सव से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, आकाशिया की उत्पत्ति और स्वरूप को लेकर अलग-अलग क्षेत्रीय मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं, लेकिन आधुनिक सजावट और चकाचौंध के इस दौर में भी बीकानेर के लोग अपनी इस प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को पूरी शिद्दत के साथ संजोए हुए हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bikaner,Bikaner,Rajasthan
First Published :
October 30, 2026, 08:16 IST



