भारत नहीं जापान में भी तंबाकू के शौकीन, पता है वहां कैसे छुड़ा रहे ये आदत? रिसर्च में खुलासा

भारत में तंबाकू और तंबाकू से बने प्रोडक्ट का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में होता है. हालांकि ये चीजें सेहत पर भी बुरा असर डालती हैं और अक्सर विशेषज्ञ इन पर पाबंदी लगाने की मांग करते हैं. जबकि डॉक्टर हर व्यक्ति को इनसे दूर रहने की सलाह देते हैं. बावजूद इसके सिगरेट-बीड़ी से लेकर तंबाकू खाने की आदत छुड़ाना बड़ा मुश्किल काम बन गया है, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत की तरह जापान में भी तंबाकू के शौकीन लोग हैं.
हाल ही में आए कई रिसर्च में बताया गया है कि भारत में जहां तंबाकू के उपभोग पर रोक लगाने को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन जापान तंबाकू नियंत्रण के लिए अलग ही राह पर चल रहा है. यहां सबसे अलग तरीके से तंबाकू से लड़ने की कोशिशें की जा रही हैं. वर्ष 2014 के बाद से यहां हीटेड टोबैको डिवाइस, जिनमें तंबाकू को जलाने के बजाय गर्म किया जाता है, जापान के तंबाकू बाजार में तेजी से बढ़े हैं और मात्रा के आधार पर बाजार के लगभग एक-चौथाई हिस्से तक पहुंच गए हैं.
इसके बाद के प्रभावों पर कई शोध हुए हैं. हाल ही में टोबेको कंट्रोल में प्रकाशित एक अध्ययन ने जापान के 12 में से 11 क्षेत्रों में खुदरा बिक्री के आंकड़ों का विश्लेषण किया. अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2011 से ही सिगरेट की बिक्री में गिरावट जारी थी, लेकिन हीटेड टोबैको उत्पादों के देशभर में उपलब्ध होने के बाद सिगरेट की बिक्री में गिरावट की रफ्तार और तेज हुई. शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार, गिरावट की दर लगभग पांच गुना तेज हो गई.
वहीं, इंटरनेशनल जॉर्नल ऑफ इनवायरनमेंटल रिसर्च एंड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक अलग विश्लेषण भी अलग आंकड़ों के आधार पर इसी तरह के निष्कर्ष पर पहुंचा. हालांकि, अध्ययन ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बिक्री के आंकड़ों के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि व्यक्तिगत स्तर पर धूम्रपान करने वालों ने हीटेड टोबैको उत्पादों को अपनाया या बिक्री में बदलाव के पीछे अन्य कारक भी जिम्मेदार थे.
जापान में हुई स्टडी, आए ये नतीजेजापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय ने भी हीटेड टोबैको से निकलने वाले एरोसोल से जुड़े इनडोर एयर क्वालिटी का अध्ययन किया है. मंत्रालय के अनुसार, निर्धारित धूम्रपान कक्षों में हीटेड टोबैको से होने वाला एक्सपोजर सिगरेट के धुएं की तुलना में काफी कम पाया गया. हालांकि, मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि कम एक्सपोजर का अर्थ यह नहीं है कि ये उत्पाद सुरक्षित हैं.
एओआई इंटरनेशनल हॉस्पिटल, कावासाकी के कार्डियोवैस्कुलर सर्जन और वाइस डायरेक्टर डॉ. हिरोया कुमामारू ने इस बदलाव को शुरुआत से देखा है. उनका कहना है, “जापान में तंबाकू से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में सामने आया यह अनुभव दिखाता है कि तकनीक और नई चीजें धूम्रपान में गिरावट को तेज कर सकते हैं और तंबाकू से होने वाले भारी स्वास्थ्य बोझ को कम कर सकते हैं. यह भी दर्शाता है कि राष्ट्रीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक संदर्भ के अनुरूप तैयार किए गए समाधान बड़े पैमाने पर प्रभावी हो सकते हैं. दुनिया भर में धूम्रपान अभी भी बीमारी और मौत के प्रमुख कारणों में शामिल है. ऐसे में जापान का अनुभव दूसरे देशों के लिए एक उपयोगी मॉडल हो सकता है. जापान ने दिखाया है कि लाखों धूम्रपान करने वालों को कम हानिकारक विकल्प चुनने का अवसर देकर अच्छे परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.”
भारत में कैसे कर रहे तंबाकू कंट्रोल
भारत ने इसके विपरीत एक अलग रास्ता अपनाया है. वर्ष 2019 से प्रोहिबिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स एक्ट के तहत ई-सिगरेट और हीटेड टोबैको उत्पादों के उत्पादन, आयात, बिक्री और विज्ञापन पर प्रतिबंध है. इस वर्ष फरवरी में स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि सरकार इस प्रतिबंध में ढील देने पर विचार नहीं कर रही है.
भारत का यह रुख उसकी व्यापक तंबाकू नियंत्रण प्राथमिकताओं को दर्शाता है. देश में तंबाकू के सेवन से हर वर्ष 10 लाख से अधिक मौतें जुड़ी हुई हैं. वहीं बीड़ी और धुआंरहित तंबाकू आज भी भारतीय तंबाकू बाजार के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. ऐसे में भारतीय नीति निर्माताओं का जोर मुख्य रूप से कराधान, तंबाकू छोड़ने में सहायता, कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और युवाओं को नए निकोटीन उत्पादों की ओर आकर्षित होने से रोकने पर रहा है.
इस बीच, इससे जुड़े वैज्ञानिक प्रमाण भी लगातार विकसित हो रहे हैं. स्वतंत्र समीक्षाओं में पाया गया है कि हीटेड टोबैको से निकलने वाले एरोसोल में सिगरेट के धुएं की तुलना में कई हानिकारक रसायनों का स्तर काफी कम होता है. हालांकि, इन समीक्षाओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि कम रासायनिक एक्सपोजर का अर्थ आबादी के स्तर पर बीमारी के जोखिम में कमी होना अभी निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है.
यहीं भारत और जापान के बीच का अंतर वास्तव में दिखता है. जिसमें दोनों देशों के अलग-अलग अनुभव मिलते हैं.
क्या कह रहे डॉक्टर? बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली के सेंटर फॉर चेस्ट एंड रेस्पिरेटरी डिजीज के डायरेक्टर डॉ. पवन गुप्ता कहते हैं, “जापान तेजी से बदलते निकोटीन बाजार की निगरानी, विस्तृत बाजार और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े जुटाने व अलग-अलग नियामकीय दृष्टिकोणों पर अध्ययन कर रहा है. वहीं भारत के पास कराधान, तंबाकू छोड़ने में सहायता, कानूनों के क्रियान्वयन और एक ऐसे विविध तंबाकू बाजार से निपटने का व्यापक अनुभव है, जिसमें अनौपचारिक क्षेत्र और धुआंरहित तंबाकू की बड़ी हिस्सेदारी है. शोधकर्ताओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों और नीति निर्माताओं के बीच अधिक सहयोग से दोनों देश यह समझने में मदद पा सकते हैं कि कौन से उपाय दूसरे संदर्भों में अपनाए जा सकते हैं और कौन से उपाय स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर हैं. संयुक्त अध्ययन, साझा निगरानी पद्धतियां और उभरते वैज्ञानिक प्रमाणों का पारदर्शी मूल्यांकन विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है. इससे एक देश में सामने आए निष्कर्षों को दूसरे देश के अनुभवों के आधार पर भी परखा जा सकेगा.”
वे कहते हैं कि इस तरह का सहयोग केवल सरकारों और शोधकर्ताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए. नए तंबाकू और निकोटीन उत्पाद विकसित करने वाली कंपनियों के पास तकनीकी और बाजार संबंधी महत्वपूर्ण आंकड़े होते हैं, जो वैज्ञानिक प्रमाण के आधार को मजबूत करने में उपयोगी हो सकते हैं. हालांकि, ऐसे आंकड़ों का महत्व तभी है जब उन्हें पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किया जाए और स्वतंत्र शोधकर्ताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा उनकी जांच की जाए. इन्हें स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.
वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत और जापान को अपनी निकोटीन नीतियों को एक जैसा बनाने की जरूरत नहीं है. दोनों देशों के अलग-अलग दृष्टिकोण और तरीके एक सार्थक परिणाम की दिशा में प्रभावी हो सकते हैं.



