रंगों से नहीं पानी पर रची जाती है कृष्ण की कहानी, जल सांझी की अनोखी कला देखकर रह जाएंगे हैरान

Last Updated:October 08, 2026, 13:13 IST
Rajasthan Folk Art: राजेश वैष्णव का कहना है कि आज के दौर में जब कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, ऐसे में जल सांझी जैसी कला को बचाए रखना जरूरी है. यह केवल चित्र बनाने की कला नहीं है, बल्कि इसके साथ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और मेवाड़ की पुरानी परंपरा भी जुड़ी हुई है.
ख़बरें फटाफट
उदयपुर: मेवाड़ अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है.यहां आज भी कई ऐसी परंपराएं देखने को मिलती हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं. इन्हीं में से एक है जल सांझी। इस कला में पानी की सतह पर प्राकृतिक रंगों से भगवान श्रीकृष्ण की अलग-अलग लीलाओं और स्वरूपों को उकेरा जाता है. देखने में यह कला जितनी खूबसूरत लगती है, इसे तैयार करना उतना ही मुश्किल काम है.
उदयपुर शहर के कलाश मार्ग स्थित गोवर्धननाथ जी मंदिर में वर्षों से जल सांझी की यह परंपरा निभाई जा रही है. हर साल श्राद्ध पक्ष की एकादशी से लेकर अमावस्या तक मंदिर में जल सांझी बनाई जाती है.इस दौरान पानी के ऊपर भगवान श्रीकृष्ण की अलग-अलग लीलाओं और झांकियों को प्राकृतिक रंगों के जरिए आकार दिया जाता है.
कला की शुरुआत महाभारत काल से जुड़ी मानी जातीइस खास कला को तैयार करने वाले उदयपुर के कलाकार राजेश वैष्णव बताते हैं कि उनके परिवार में जल सांझी बनाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है.परिवार की पीढ़ियां इस कला को सीखती और आगे बढ़ाती रही हैं। राजेश वैष्णव के अनुसार इस कला की शुरुआत महाभारत काल से जुड़ी मानी जाती है इसमें अलग-अलग प्राकृतिक रंगों की मदद से पानी की सतह पर भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न स्वरूप बनाए जाते हैं.
काफी धैर्य और बारीकी से काम करना पड़ता जल सांझी की सबसे खास बात यह है कि इसमें कागज, कपड़े या किसी ठोस सतह पर चित्र नहीं बनाया जाता, बल्कि पानी को ही कला का आधार बनाया जाता है. पानी की सतह पर रंगों को इस तरह से सजाया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की पूरी लीला एक झांकी की तरह दिखाई देने लगती है. इसे तैयार करने में कलाकार को काफी धैर्य और बारीकी से काम करना पड़ता है.
महाभारत काल से जुड़े स्वरूपों तक को दिखाया जाता इसमें भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर महाभारत काल से जुड़े स्वरूपों तक को दिखाया जाता है. हर साल अलग-अलग विषय और स्वरूपों के जरिए जल सांझी को तैयार किया जाता है. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु जब पानी पर बनी इन आकृतियों को देखते हैं तो कुछ देर के लिए वहीं रुक जाते हैं.
कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे खत्म हो रहीराजेश वैष्णव का कहना है कि आज के दौर में जब कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, ऐसे में जल सांझी जैसी कला को बचाए रखना जरूरी है. यह केवल चित्र बनाने की कला नहीं है, बल्कि इसके साथ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और मेवाड़ की पुरानी परंपरा भी जुड़ी हुई है. मेवाड़ में आज भी पुरानी कलाओं और धार्मिक परंपराओं को किस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जा रहा है. पानी पर रंगों से साकार होती कृष्ण की लीलाएं यहां की सांस्कृतिक विरासत को और खास बनाती हैं.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
और पढ़ेंLocation :
Udaipur,Rajasthan
First Published :
October 08, 2026, 13:13 IST



