राजस्थान निकाय चुनाव क्या भजनलाल के लिए बन गया है लिटमस टेस्ट? क्यों यूपी इलेक्शन से पहले राजस्थान पर फोकस कर रही भाजपा?

जयपुर. राजस्थान इन दिनों चुनावी फिजां में रंगा हुआ है. राजस्थान में चुनाव भले ही नगरीय निकायों के हो रहे हों लेकिन इनका असर करीब ढाई साल बाद आने वाले विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव तक पड़ेगा. उससे पहले इन चुनाव परिणामों की छाया सूबे में आगामी महीनों में होने वाले पंचायतीराज चुनावों पर भी नजर आएगी. यह चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब सूबे की भजनलाल सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है. प्रदेश में भजनलाल की सरकार आने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है जिसमें पूरे प्रदेश की भागीदारी होगी. यह सीएम भजनलाल शर्मा का लिटमस टेस्ट होगा.
यह चुनाव प्रदेश में भजनलाल सरकार के कामकाज पर ‘पॉजिटिव’ या ‘नगेटिव’ मुहर लगाने का काम करेगा. यही वजह है कि बीजेपी इसे बेहद गंभीरता से ले रही है. सीएम भजनलाल शर्मा खुद स्टार प्रचारक बनकर मैदान में उतर गए हैं. वहीं संगठन के स्तर पर भी राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने चुनावी मैनेजमेंट की कमान संभाल ली. राजस्थान से सटे उत्तर प्रदेश में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. राजस्थान और उत्तर प्रदेश दोनों जगह बीजेपी की सरकार है. लिहाजा यह चुनाव बीजेपी के लिए ‘नैरेटिव’ सैट करने का काम करेगा. बीजेपी इस चुनावी टास्क में किसी भी सूरत में फेल नहीं होना चाहती है. लिहाजा चुनावों को लेकर ‘टॉप टू बॉटम’ सॉलिड रणनीति पर काम किया जा रहा है.
भजनलाल पार्टी की ओर से लिए गए फैसले पर कितना ‘खरा’ उतरे हैं?
सीएम भजनलाल के लिए यह चुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि पार्टी के सत्ता में आने के बार बीजेपी ने अप्रत्याशित तरीके से उनकी ताजपोशी की थी. किसी भी तरह की गुटबाजी और विवादों से संबंध नहीं रखने वाले भजनलाल शर्मा पहली बार विधायक बने हैं. साफ सुथरी छवि वाले शर्मा पर पार्टी ने बड़ा भरोसा जताया. बीजेपी ने ऐसा ही राजस्थान के साथ चुनाव हुए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किया था. राजस्थान में पूर्व सीएम वसुंधरा राजे जैसे दिग्गज को परे कर जिस तरह से भजनलाल शर्मा को आगे लाया गया उससे उनके कंधों पर जिम्मेदारियों का भार बढ़ गया है. अब समय उनकी लीडरशिप पर ‘मुहर’ लगाने का है. यह चुनाव तय करेंगे कि भजनलाल शर्मा पार्टी की ओर से लिए गए फैसले पर कितना ‘खरा’ उतरे हैं? इसके साथ ही सूबे पर उनकी पकड़ कितनी है?
ताकि माहौल को शुरुआती फेज से ही अपने पक्ष में किया जा सके
निकाय चुनावों में जिस तरह से बगावत की बयार चली है वह पार्टी के चिंता बनी हुई है. नामांकन वापसी के बाद भी बड़ी संख्या में बागियों की फौज चुनावी मैदान में डटी है. यह फौज भले ही खुद जीते या नहीं जीते लेकिन पार्टी के समीकरण बिगाड़ सकती है. इसलिए बीजेपी संगठन ने पूरे चुनाव पर नजरें गाड़ दी है. पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने शुक्रवार को जयपुर पहुंचकर चुनावों से जुड़ा पूरा फीडबैक लिया. वहीं सीएम भजनलाल शर्मा चुनाव प्रचार को धार देने के लिए खुद रोड़ शो करने के लिए निकल गए हैं ताकि माहौल को शुरुआती फेज से ही अपने पक्ष में किया जा सके.
बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष का स्वागत करते सीएम भजनलाल शर्मा.
पार्टी इसे सामान्य और छोटा चुनाव नहीं मान रही हैराजस्थान की ‘डबल इंजन’ सरकार को ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार बनाने के लिए संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने जयपुर स्थित पार्टी के मुख्यालय में संभागवार फीडबैक लिया. नामांकन से लेकर बगावत तक पहलू पर चर्चा की. कहां क्या हाल है इसके प्रत्येक बिन्दु पर बात कर आगामी रणनीति बनाई. बैठक में प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, राष्ट्रीय महामंत्री हरीश द्विवेदी और संगठन महामंत्री अजेय कुमार समेत चुनाव संचालन समिति के सदस्य तथा सूबे के आला नेता मौजूद रहे. बीजेपी की इन तैयारियों से साफ जाहिर है कि पार्टी इसे सामान्य और छोटा चुनाव नहीं मान रही है बल्कि उसे पूरी गंभीरता से भविष्य को देखते हुए तैयारियां की जा रही है.
बीजेपी को लोकसभा चुनावों में बड़ा झटका लग चुका हैराजस्थान में प्रत्येक पांच साल में सत्ता परिवर्तन की रवायत रही है. साल 2023 में कांग्रेस को बेदखल कर सत्तासीन हुई बीजेपी को यहां लोकसभा चुनाव 2024 में बड़ा झटका लगा था. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सूबे की लोकसभा की सभी 25 की 25 सीटें जीती थी. कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं आया था. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के हाथ से लोकसभा की 11 सीटे छिटक गई. यह बीजेपी के लिए बड़ा धक्का था और कांग्रेस के ‘संजीवनी बूंटी’. बस यहीं से पार्टी अलर्ट मोड पर आ गई.
ये मुद्दे बीजेपी के लिए गले की फांस बन गएलोकसभा चुनाव के बाद में खाली हुई विधानसभा की सात सीटों पर हुए उपचुनाव में हालांकि बीजेपी ने अपना वर्चस्व कायम रखा था. लेकिन उसके बाद पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के इलाके में अंता विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी मात खा गई. उसके बाद पंचायतीराज संस्थाओं का कार्यकाल खत्म हुआ तो वहां प्रशासन नियुक्त कर दिए. यही हालात बाद में शहरी निकायों में हुआ. वहां भी चुनाव की बजाय कमान सरकारी मशीनरी के हाथों में दे दी गई. इसे कांग्रेस ने मुद्दा बना लिया और सरकार को पूरी तरह से घेर लिया. उसके बाद उसने नगरीय निकाय और पंचायतों के ‘परिसीमन’ और ‘नीट पेपर लीक’ के मुद्दे पर हवा के रुख को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश की. यही मुद्दे अब बीजेपी के लिए गले की फांस बन गए. इनसे पार पाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है.
राजस्थान बीजेपी ने निकाय चुनाव के लिए लंबा चौड़ा घोषणा-पत्र जारी किया है.
कांग्रेस मैदान में अपनी रणनीति के तहत माहौल बनाने में सफल रहीसरकार ने चुनाव में देरी के लिए ओबीसी आयोग का हवाला देते हुए कहा कि जब तक इसकी रिपोर्ट नहीं आती तब तक चुनाव नहीं कराए जा सकते. क्योंकि इन चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण तय किए बिना चुनाव कराना उनके साथ अन्याय होगा. अंतत: मामला हाईकोर्ट पहुंचा. कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद आयोग की रिपोर्ट आई और चुनाव की राह प्रशस्त हुई. लेकिन तब तक कांग्रेस मैदान में अपनी रणनीति के तहत माहौल बनाने में काफी हद तक सफल हो गई. ओबीसी आयोग की ओर से नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं में इस वर्ग के तय किए आरक्षण पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए और बीजेपी को घेरने की कोशिश की.
भाजपा-संघ संगठन के बीच तालमेल को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा हैअब इन चुनावों में संगठन महामंत्री बीएल संतोष की मौजूदगी और सीएम भजनलाल शर्मा का रोड शो के कार्यक्रम इस बात के संकेत हैं कि केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान निकाय चुनावों को हल्के में नहीं ले रहा है. वह भाजपा-संघ संगठन के बीच तालमेल को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है. उसका प्रयास है कि इन चुनावों के जरिये सूबे से सटे यूपी के विधानसभा चुनाव के लिए मनोवैज्ञानिक स्तर पर ‘सकारात्मक नैरेटिव’ सैट किया जाए ताकि इसका फायदा राजस्थान के साथ-साथ उत्तर प्रदेश को भी मिले.
बागियों को कहीं न कहीं से पार्टी के भीतर से समर्थन मिल रहा है
इसके साथ ही पार्टी का प्रयास है कि पूर्वी राजस्थान और भरतपुर-ब्रज क्षेत्र का समीकरण एक हो. निकाय चुनाव को लेकर हुई फीडबैक की बैठक में बीएल संतोष ने इस बात पर जोर दिया कि हमारा प्रत्याशी चाहे कितना भी कमजोर हो लेकिन अंत तक उसी का साथ दें. इससे जाहिर है कि बागियों को कहीं न कहीं से पार्टी के भीतर से समर्थन मिल रहा है. खास बात यह भी प्रदेश में जिन निकायों में चुनावी मुकाबला सबसे तगड़ा है उनमें सीएम भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र भरतपुर नगर निगम भी शामिल है.
सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की झांकी दिखाई देचूंकि भरतपुर सीएम भजनलाल शर्मा का गृह जिला है. भरतपुर उत्तर प्रदेश बॉर्डर से सटा है. यह मथुरा और आगरा से प्रदेश का जोड़ता है. सीएम का प्रभाव और स्टार प्रचारक बनाना दोनों राज्यों के सीमावर्ती इलाकों के जातीय और राजनीतिक समीकरण साधने में भी अहम हो सकता है. बीजेपी संगठन सीएम भजनलाल शर्मा को फ्रंट फुट पर लाकर साफ-सुथरा कैडर-आधारित चेहरा पेश करने की कोशिश कर रही है ताकि उनका असर केवल राजस्थान तक सीमित न रहकर पड़ोसी राज्यों में भी पड़े. वहीं सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की झांकी भी दिखाई दे.
चुनावों को लेकर भी बीजेपी की एक अलग रणनीति रही हैपार्टी सूत्रों की मुताबिक कोर्ट के दखल के बाद हो रहे इन चुनावों को लेकर भी बीजेपी की एक अलग रणनीति रही है. चुनावों के लिए हमेशा तैयार रहने वाली बीजेपी गांवों के बजाय शहरों में ज्यादा प्रभावी है. शहरी लोग बीजेपी का ‘कोर वोटर’ माने जाते हैं. ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस का प्रभाव ज्यादा है. नगरीय निकाय और पंचायतीराज चुनावों में से पहले नगरी निकाय चुनाव करवाने का फैसला भी इसी रणनीति का हिस्सा है. पार्टी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती. वह चाहती कि शहरी निकायों के चुनाव में परिणाम अच्छे रहने से इसका मनोवैज्ञानिक असर पंचायती राज चुनावों में भी पड़ेगा. वह अपने विजयी रथ को शहर से गांव की तरफ ले जाना चाहती है.



