1 लाख ऊंट, सोने के सिक्के और भाई-बहन की समाधि, राजस्थान के इस 976 साल पुराने मंदिर की कहानी उड़ा देगी होश

पाली: क्या आपने कभी किसी ऐसे प्राचीन शिव मंदिर के बारे में सुना है, जिसका सीधा कनेक्शन 1 लाख ऊंटों से जुड़ा है? एक ऐसा धाम जहाँ खुदाई में निकलते थे सोने के सिक्के और जहाँ के संत कमल के पत्थर पर बैठकर जलाभिषेक करने जाया करते थे. आज हम आपको लेकर चल रहे हैं राजस्थान के पाली शहर में स्थित लाखोटिया महादेव मंदिर. करीब 972 साल पुराना यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि इसके पीछे छिपी है जल संकट से पाली को उबारने वाले संत चंदनपुरी की एक चमत्कारी और अद्भुत गाथा. राजस्थान के पाली शहर का एक ऐसा ऐतिहासिक और आस्था से भरा केंद्र, जिसका इतिहास लगभग 976 साल पुराना है.
जहां केवल पेयजल संकट मिटाने के लिए तालाब ही नहीं खोदा गया, बल्कि उससे जुड़ी हैं कई अलौकिक कथाएं. एक लाख ऊंटों से खुदाई, मिट्टी से निकलने वाले सोने के सिक्के, कमल के पत्थर पर तैरकर महादेव का जलाभिषेक और भाई-बहन की जीवित समाधि की ऐसी गाथा, जो आज भी पाली की फिज़ाओं में रची-बसी है.
मंदिर और तालाब का इतिहासआज से लगभग 972 वर्ष पूर्व पल्लीपुर (वर्तमान पाली) में भीषण पेयजल संकट पैदा हो गया था. इस समस्या के समाधान के लिए जूना मठ के संत चंदनपुरी महाराज ने एक विशाल तालाब की खुदाई करवाई और पास की टेकरी पर शिवलिंग की स्थापना की. दंतकथाओं के अनुसार, तालाब की खुदाई के दौरान मिट्टी ढोने और कार्य निष्पादन के लिए करीब एक लाख ऊंटों का उपयोग किया गया था. इसी कारण इस मंदिर का नाम लाखोटिया महादेव और तालाब का नाम लाखोटिया तालाब पड़ा.
मंदिर व जूना मठ से जुड़ी अद्भुत मान्यताएंसोने के सिक्के: लोकमान्यता है कि तालाब की खुदाई के समय रहस्यमयी ढंग से सोने के सिक्के निकलते थे, जिन्हें संत चंदनपुरी मजदूरों की पारिश्रमिक के रूप में बांटते थे.
कमलनुमा पत्थर की सवारी: कहा जाता है कि संत चंदनपुरी एक कमल के आकार के विशेष पत्थर पर बैठकर जूना मठ से लाखोटिया महादेव मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक करने जाते थे.
संरक्षित ऐतिहासिक धरोहरें: जूना मठ में आज भी संत की चमत्कारी छड़ी, दो बड़े शंख, प्राचीन धूणी, वही कमलनुमा पत्थर, चिलम, भाला और लकड़ी का डमरू सुरक्षित रखा हुआ है.
संत चंदनपुरी और बहन की जीवित समाधिसंत चंदनपुरी महिलाओं का मुख नहीं देखते थे और उनके मठ में महिलाओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित था. एक बार उनकी बहन अन्नपूर्णा उनसे मिलने मठ पहुंचीं. बहन का चेहरा देखने के बाद संत ने जीवित समाधि लेने का निर्णय कर लिया. जब उनकी बहन को यह ज्ञात हुआ कि उनके आने की वजह से भाई समाधि ले रहे हैं, तो उन्होंने भी वहीं जीवित समाधि ले ली. आज भी जूना मठ परिसर में भाई-बहन दोनों के समाधि स्थल मौजूद हैं.
उपेक्षा का शिकार संत की धरोहरसमय के साथ लाखोटिया तालाब और महादेव मंदिर का तो विकास और सौंदर्यकरण होता रहा, लेकिन पाली शहर को जल संकट से उबारने वाले और इस ऐतिहासिक मंदिर की नींव रखने वाले संत चंदनपुरी का जूना मठ आज भी जीर्णोद्धार और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है. स्थानीय लोग इस ऐतिहासिक मठ के संरक्षण और पुनरुद्धार की मांग कर रहे हैं.



