Rajasthan

1 MM लकड़ी उकेरकर तारों से बनाते हैं अद्भुत डिजाइन,जयपुर के राम दयाल ने तारकशी कला में बनाई खास पहचान

जयपुर. राजस्थान की कला और संस्कृति की पहचान यहां की पारंपरिक कलाओं से भी होती है। जयपुर में आज भी कई कलाकार पीढ़ियों से चली आ रही कलाओं को जीवित रखने का काम कर रहे हैं. इन्हीं कलाकारों में राम दयाल शर्मा का नाम भी शामिल है, जो करीब पांच दशक से तारकशी कला को संजो रहे हैं. तारकशी यानी इनले वर्क ऑन वुड में लकड़ी पर तांबे, पीतल और चांदी के तारों से बेहद बारीक डिजाइन तैयार किए जाते हैं.

राम दयाल शर्मा बताते हैं कि वह वर्ष 1975 से तारकशी कला का काम कर रहे हैं, उन्होंने यह कला अपने गुरु और भाई रामस्वरूप शर्मा से सीखी. इस कला में मुख्य रूप से शीशम की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. लकड़ी पर फूल-पत्तियों, डबल जाल, लोटे, लहरिया और मटरमाला जैसी पारंपरिक डिजाइन बनाई जाती हैं. इसके बाद बारीकी से तारों को लकड़ी में फिट करके कलाकृति तैयार की जाती है. तारकशी का काम पुराने महलों और हवेलियों के दरवाजों, झरोखों, सिंहासन, फर्नीचर, हाथी के हौदों और घोड़े-ऊंट की काठी जैसी वस्तुओं पर भी देखने को मिलता है. इस कला में काफी धैर्य और बारीकी की जरूरत होती है.

प्रिंस ऑफ वेल्स को भेंट किया वुडन बॉक्स

राम दयाल शर्मा ने अपनी कला के जरिए देश-विदेश में पहचान बनाई है. वर्ष 2003 में प्रिंस ऑफ वेल्स के जयपुर दौरे के दौरान उन्होंने उन्हें तारकशी से तैयार किया हुआ वुडन बॉक्स भेंट किया था. इसके अलावा उनकी बनाई कलाकृतियां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक भी पहुंच चुकी हैं. जयपुर के सिटी पैलेस की सवाई भवानी सिंह आर्ट गैलरी में वर्ष 1997 से उनकी तारकशी कला से जुड़ी वस्तुएं प्रदर्शित हैं. राजस्थान सरकार की ओर से उन्होंने इटली के मिलान शहर में आयोजित 17वीं इंटरनेशनल क्राफ्ट्स सेलिंग एग्जीबिशन में भी जयपुर की इस पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया.

कई पुरस्कारों से हो चुके हैं सम्मानित

राम दयाल शर्मा को तारकशी कला के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं, उन्हें वर्ष 1983 में स्टेट मेरिट अवार्ड, 1985 में स्टेट अवार्ड, 2008 में नेशनल मेरिट अवार्ड, 2009 में राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार और 2010 में कला निधि सम्मान से सम्मानित किया. राम दयाल शर्मा के अनुसार तारकशी राजस्थान में मध्यकाल से प्रचलित काष्ठकला की एक खास शैली है। इसमें सबसे पहले लकड़ी पर डिजाइन बनाई जाती है. इसके बाद छैनी और हथौड़े की मदद से लकड़ी को करीब 1 मिलीमीटर तक उकेरा जाता है. इसी जगह पर तांबे, पीतल या चांदी के तारों को लगाकर डिजाइन को अंतिम रूप दिया जाता है. आज भी उनके बनाए दर्पण फ्रेम, आभूषण बॉक्स, कलम-पेन स्टैंड, फूलदान, टेबल लैंप, पेपरवेट, की-चेन और हाथी-ऊंट सहित कई कलात्मक सामान पर्यटकों को पसंद आते हैं.

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