15 दिन की मेहनत, हाथों की बारीक कारीगरी और शाही अंदाज, जानें जरदोजी कला क्यों है खास?

Last Updated:October 23, 2026, 11:27 IST
Rajasthan Dharohar Zardosi Art: जोधपुर में दिवाली की खरीदारी के बीच जरदोजी की पारंपरिक कला लोगों का ध्यान खींच रही है. राजा-महाराजाओं के दौर से जुड़ी इस पुश्तैनी कारीगरी को दिल्ली के कारीगर कासुद्दीन अंसारी आगे बढ़ा रहे हैं. उनके पूर्वज शाही परिवारों के लिए ओढ़ने-दोशाले तैयार करते थे. पहले इस कढ़ाई में सोने-चांदी के तारों का इस्तेमाल होता था, जबकि अब तांबे के तारों से पारंपरिक डिजाइन बनाए जाते हैं. दुल्हनों के लहंगे, चुनरी, सुहाग के जोड़े और दूल्हों की शेरवानी के अलावा अब जरदोजी की कढ़ाई चप्पलों, टोपियों और कुशन कवर पर भी की जा रही है. पूरी जरदोजी साड़ी तैयार करने में करीब 15 दिन तक लग सकते हैं. कासुद्दीन को 8 अक्टूबर 2010 को तमिलनाडु सरकार की ओर से उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मानित भी किया गया था.
जोधपुर. राजा-महाराजाओं के दौर में सोने-चांदी के तारों से सजने वाले शाही वस्त्रों की जरदोजी कला आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है. पीढ़ियों से चली आ रही इस कला में अब बदलते फैशन के साथ नए प्रयोग हो रहे हैं. जोधपुर के अर्बन हार्ट में दिवाली की खरीदारी के बीच पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक फैशन का यह संगम लोगों को आकर्षित कर रहा है. दिल्ली के कारीगर कासुद्दीन अंसारी इस पुश्तैनी कला को आगे बढ़ा रहे हैं.
कासुद्दीन अंसारी बताते हैं कि उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के लिए ओढ़ने-दोशाले तैयार करते थे. पहले जरदोजी में सोने-चांदी के तारों का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब तांबे के तारों से वही पारंपरिक डिजाइन तैयार किए जाते हैं. सामग्री बदली है, मगर कला की बारीकी और शाही अंदाज आज भी कायम है.
मशीन नहीं, हाथों की मेहनत से तैयार होती है कढ़ाई
जरदोजी की खासियत इसकी बारीक हस्तकला है. दुल्हनों के लहंगे, चुनरी, सुहाग के जोड़े और दूल्हों की शेरवानी पर यह कढ़ाई शाही लुक देती है. कासुद्दीन ने बताया कि पूरी जरदोजी साड़ी तैयार करने में करीब 15 दिन तक लग सकते हैं. कपड़े के डिजाइन और काम की बारीकी के अनुसार समय भी बदलता है.
चप्पलों पर जरदोजी की कढ़ाई बना नया फैशन ट्रेंड
उन्होंने बताया कि पहले लहंगे, सूट और दुपट्टों तक सीमित माने जाने वाले इस काम का दायरा अब बढ़ रहा है. कासुद्दीन बताते हैं कि इन दिनों जरदोजी वाली चप्पलें खास आकर्षण बनी हुई हैं. इसके अलावा कुशन कवर, सजावटी वस्त्र और टोपियों पर भी यह कढ़ाई की जाती है. पारंपरिक कला को नए उत्पादों से जोड़ना कारीगरों के लिए फैशन की बदलती पसंद के साथ आगे बढ़ने का अवसर है.
पुश्तैनी विरासत को आगे बढ़ाने का है प्रयास
कासुद्दीन को 8 अक्टूबर 2010 को तमिलनाडू सरकार की ओर से उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया था. उनका कहना है कि ग्राहक अपनी पसंद का डिजाइन भेजकर भी काम करवा सकते हैं. दिवाली जैसे त्योहारों पर सजावटी वस्तुओं और पारंपरिक परिधानों की खरीदारी के बीच ऐसी हस्तकला खास जगह रखती है. जरदोजी की यह कहानी बताती है कि बदलते दौर में भी पुश्तैनी हुनर अपनी पहचान नए अंदाज में कायम रख सकता है.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Jodhpur,Rajasthan
First Published :
October 23, 2026, 11:27 IST



