4 घंटे से ज्यादा बैठना, 4 सिगरेट पीने जितना खराब, डॉक्टरों की ये रिपोर्ट बढ़ा देगी टेंशन

डॉक्टरों ने कहा कि यह समस्या भारत की युवा आबादी के लिए भी एक बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही है, क्योंकि मनोरंजन, शिक्षा, गेमिंग और लोगों से बातचीत अब ज्यादातर स्क्रीन पर ही होती है. उम्रदराज लोगों में जोखिम के जो पारंपरिक कारण होते हैं, उनसे अलग, डिजिटल डिवाइस का ज्यादा इस्तेमाल युवा और स्वस्थ लोगों को भी लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रख सकता है. विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि गेमिंग या OTT कंटेंट देखने से सीधे DVT नहीं होता, लेकिन घंटों तक लगातार बैठे रहने से जोखिम बढ़ सकता है. यह जोखिम तब और भी बढ़ जाता है जब इसके साथ मोटापा, डिहाइड्रेशन, स्मोकिंग, हार्मोनल कारण, खून का थक्का जमने से जुड़ी वंशानुगत बीमारी या पहले कभी थ्रॉम्बोसिस होने का इतिहास जैसी समस्याएं भी हों.
डॉक्टरों ने ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित एक बड़े सिस्टेमैटिक रिव्यू और डोज-रिस्पॉन्स मेटा-एनालिसिस का हवाला देते हुए बताया कि जिन लोगों में बैठे रहने की आदत (सेडेंटरी बिहेवियर) सबसे ज्यादा थी, उनमें वीनस थ्रोम्बोएम्बोलिज्म (VTE) का जोखिम उन लोगों की तुलना में लगभग 24% ज्यादा था जिनमें यह आदत सबसे कम थी. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने पाया कि दिन भर में बैठे रहने की आदत में हर एक घंटे की बढ़ोतरी के साथ VTE का जोखिम 2% बढ़ जाता है.
ओपीडी में आ रहे युवा मरीज
इस बारे में मैक्स हॉस्पिटल में वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर सर्जरी विभाग के डायरेक्टर और हेड डॉ. तापिश साहू ने कहा , “हम अपनी OPD में ऐसे युवा मरीजों को तेजी से देख रहे हैं जिनमें ऐसे लक्षण दिखते हैं जो हमें उनकी जीवनशैली पर बारीकी से ध्यान देने के लिए मजबूर करते हैं. इसमें लंबे समय तक बैठे रहना, ज्यादा स्क्रीन देखना और लंबे समय तक गेमिंग करना शामिल है. हालिया सबूत चिंताजनक हैं क्योंकि यह जोखिम सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं है जो बिल्कुल भी शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं. जब कोई युवा व्यक्ति गेम खेलने या OTT कंटेंट लगातार देखने में चार, पांच या छह घंटे बिताता है, तो पैर की पिंडलियों की मांसपेशियां (calf muscles) नसों के खून को पंप करने का काम बहुत कम कर पाती हैं. हमें अपनी डिजिटल ज़िंदगी में बीच-बीच में उठने-फिरने या हिलने-डुलने को शामिल करने की जरूरत है.”
किशोरों और लंबे समय तक डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल पर की गई रिसर्च में भी इस बढ़ती चिंता को उजागर किया गया है. थ्रॉम्बोसिस वाले किशोरों पर हाल ही में हुई एक स्टडी में ऐसे 11 मरीजों की पहचान की गई, जो रोजाना कम से कम चार घंटे स्क्रीन के सामने बिताते थे. उनके डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल का औसत समय लगभग छह घंटे रोजाना था, जबकि बिना हिले-डुले बैठने का औसत समय 2.7 घंटे था. इन 11 किशोरों में से आठ को पैरों में DVT (डीप वेन थ्रॉम्बोसिस), दो को पल्मोनरी एम्बोलिज्म और एक को सबक्लेवियन-वेन थ्रॉम्बोसिस की समस्या थी. रिसर्चर्स ने इनमें से कई मरीजों में जन्मजात थ्रॉम्बोसिस की प्रवृत्ति (थ्रॉम्बोसिस के प्रति आनुवंशिक संवेदनशीलता) भी पाई, जिससे एक अहम बात सामने आई. लंबे समय तक बिना हिले-डुले डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल थ्रॉम्बोसिस का एकमात्र कारण न होकर, एक ट्रिगर या अतिरिक्त जोखिम कारक (रिस्क फैक्टर) हो सकता है.
ओटीटी स्क्रीन सबसे ज्यादा खतरनाक
मेदांता में पेरिफेरल वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर साइंसेज के सीनियर डायरेक्टर डॉ. तरुण ग्रोवर बताते हैं, ‘हमारी OPD में हम ऐसे मरीज देख रहे हैं जिनकी जीवनशैली का इतिहास वैस्कुलर जांच का एक अहम हिस्सा बन गया है. पहले, जब हम लंबे समय तक बिना हिले-डुले रहने के बारे में सोचते थे, तो मुख्य रूप से लंबी दूरी की यात्रा, अस्पताल में भर्ती होने या बिस्तर पर पड़े रहने की बात करते थे. आज, हमें युवा मरीजों से यह भी पूछने की जरूरत है कि वे गेमिंग कंसोल, कंप्यूटर या OTT स्क्रीन के सामने लगातार कितने घंटे बिताते हैं. कम उम्र होने से सुरक्षा का गलत एहसास नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब लंबे समय तक बैठे रहने के साथ-साथ अन्य जोखिम कारक भी मौजूद हों.”
डॉक्टरों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चिंता का विषय यह नहीं है कि बैठे रहना सचमुच धूम्रपान के बराबर है, बल्कि यह है कि दोनों ही अलग-अलग तरीकों से वैस्कुलर जोखिम बढ़ा सकते हैं. धूम्रपान एक जाना-माना जोखिम कारक है जो रक्त वाहिकाओं पर बुरा असर डाल सकता है और थ्रॉम्बोसिस से जुड़ी स्थितियों को बढ़ावा दे सकता है, जबकि लंबे समय तक बैठे रहने से ‘वेनस स्टेसिस’ (venous stasis) हो सकता है, यानी पैरों से रक्त की वापसी धीमी हो जाती है और थक्का (clot) बनने का जोखिम बढ़ जाता है.
वैस्कुलर सोसाइटी ऑफ इंडिया के सीनियर वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर सर्जन, डॉ. भूपेश गर्ग ने कहा, “जिस तरह स्मोकिंग से वैस्कुलर और क्लॉटिंग का खतरा बढ़ता है, उसी तरह लंबे समय तक बैठे रहने से भी ब्लड क्लॉट का खतरा बढ़ सकता है, भले ही इसका तरीका अलग हो.
ऐस में वैस्कुलर कम्युनिटी का मानना है कि इस मुद्दे पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि लंबे समय तक बैठे रहने की आदत अब सिर्फ ऑफिस में काम करने वालों तक ही सीमित नहीं है. युवा स्कूल या कॉलेज के लिए घंटों बैठे रह सकते हैं, और उसके बाद गेमिंग, सोशल मीडिया, स्ट्रीमिंग या ऑनलाइन मनोरंजन में समय बिताते हैं, जिससे पूरे दिन शारीरिक गतिविधि बहुत कम हो जाती है.



