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Exclusive: उन्नाव रेप केस में CBI ने कैसे पीड़िता को निराश किया? कोर्ट के ऑर्डर से हुआ खुलासा

Last Updated:December 25, 2025, 11:41 IST

Unnao Rape Case: उन्नाव रेप केस में पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को सस्पेंड करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर हो रहे हंगामे के बीच ऑर्डर पढ़ने से पता चलता है कि सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने भी केस के दौरान पीड़िता को निराश किया.उन्नाव रेप केस में CBI ने कैसे पीड़िता को निराश किया? कोर्ट ऑर्डर से खुलासाकोर्ट के दस्तावेज़ों से पता चला है कि CBI ने उन्नाव रेप पीड़िता को कैसे निराश किया. (फाइल फोटो)

Unnao Rape Case: उन्नाव रेप केस मामले में भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा दिल्ली हाईकोर्ट ने निलंबित कर दी. इस फैसले से पीड़ित फैमिली निराश है. हाकोर्ट के फैसले पर हंगामा मचा है. हालांकि, कोर्ट का ऑर्डर पढ़ने से पता चलता है कि सीबीआई यानी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने भी केस के दौरान पीड़िता को निराश किया.

असल में सीबीआई ने हाईकोर्ट के सामने यह माना कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले के एक मामले में फैसला सुनाया था कि आईपीसी की धारा 21 के तहत एक विधायक पब्लिक सर्वेंट नहीं होता. हाईकोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) की धारा 5(सी) और 6 को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि एक विधायक पब्लिक सर्वेंट नहीं है और इसलिए इन प्रावधानों के तहत उसे उम्रकैद की सजा नहीं दी जा सकती. सीबीआई ने हाईकोर्ट से ‘उद्देश्यपूर्ण व्याख्या के सिद्धांत को अपनाने’ के लिए कहा था, मगर इसका कोई फायदा नहीं हुआ.

कोर्ट के ऑर्डर में क्या?

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि जब 2019 में पीड़िता का परिवार कुलदीप सेंगर पर आईपीसी की अधिक गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलाना चाहता था. पीड़िता परिवार ने यह कहा था कि वह यानी कुलदीप सेंगर एक पब्लिक सर्वेंट है और उसने रेप किया. तब सीबीआई ने याचिका में पीड़िता का साथ नहीं दिया. उस वक्त सीबीआई ने कहा था कि पीड़िता द्वारा सुझाए गए नए आरोप या धारा पूरी तरह से लागू नहीं होते. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 2019 में याचिका खारिज कर दी थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने अब अपने फैसले में नोट किया है कि ‘लर्नड ट्रायल कोर्ट द्वारा 20.08.2019 को पारित आदेश को न तो पीड़िता ने चुनौती दी और न ही CBI ने इसका समर्थन किया.’

पीड़िता का परिवार क्या चाहता था?

तब पीड़िता का परिवार चाहता था कि कुलदीप सेंगर को आईपीसी की धारा 376(2)(एफ) और (के) के तहत दोषी ठहराया जाए, न कि आईपीसी की धारा 376(2) और पॉक्सो की धारा 5 और 6 के तहत. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब कुलदीप सेंगर को कोर्ट ने पॉक्सो की धारा 5 और 6 के तहत आरोपों से बरी कर दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि कुलदीप सेंगर पर केवल पॉक्सो (POCSO) की धारा 3 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसमें अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है. सेंगल यह अवधि पहले ही जेल में काट चुका है.

सीबीआई के कारण केस कमजोर हुआ?

हाईकोर्ट के फैसले में ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी का भी जिक्र है. ट्रायल कोर्ट ने कहा कि यह अपरिहार्य निष्कर्ष है कि सीबीआई के जांच अधिकारी ने निष्पक्ष जांच नहीं की. इससे पीड़िता और उसके परिवार के केस को नुकसान हुआ. पीड़िता के परिवार ने हाईकोर्ट से कहा कि जांच सीबीआई को ट्रांसफर होने के बाद भी निष्पक्षता और ईमानदारी नहीं बरती गई. लेकिन सीबीआई के मामले में ट्रायल कोर्ट में दोष सिद्धि हुई.

पीड़िता के परिवार ने हाईकोर्ट में क्या कहा?

पीड़िता के परिवार ने मौजूदा मामले में हाईकोर्ट को यह भी बताया कि सीबीआई के जांच अधिकारी ने कुलदीप सेंगर के साथ मिलकर काम किया ताकि पीड़िता की उम्र से जुड़ा अहम सबूत कभी सामने न आए और सेंगर द्वारा तैयार किए गए झूठे और फर्जी दस्तावेज ही पेश किए जाएं.

About the AuthorShankar Pandit

Shankar Pandit has more than 10 years of experience in journalism. Before (Network18 Group), he had worked with Hindustan times (Live Hindustan), NDTV, India News Aand Scoop Whoop. Currently he handle ho…और पढ़ें

First Published :

December 25, 2025, 11:38 IST

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