Bikaner Cardboard Coins History | Rare Cardboard Coins of Bikaner State History

Last Updated:April 17, 2026, 10:01 IST
Bikaner Cardboard Coins History: 19वीं शताब्दी में बीकानेर रियासत में गत्ते के सिक्कों का उपयोग लेन-देन के लिए किया जाता था. एक पैसा से लेकर चार आना तक के ये चौकोर सिक्के सरकारी मोहर और सदर ट्रेजरी के अधिकारियों के हस्ताक्षर के साथ जारी होते थे. धातु की कमी के दौरान शुरू की गई यह वैकल्पिक मुद्रा आज इतिहास की एक दुर्लभ धरोहर बन चुकी है. संग्रहकर्ता किशन के अनुसार ये सिक्के बीकानेर की प्रशासनिक कुशलता और आर्थिक प्रबंधन का अनूठा उदाहरण पेश करते हैं.
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बीकानेर. आज के डिजिटल युग में जहाँ पूरी दुनिया कैशलेस लेन-देन और मोबाइल वॉलेट की ओर बढ़ रही है, वहीं राजस्थान के बीकानेर का इतिहास एक ऐसी अनोखी मुद्रा का गवाह रहा है जिसकी कल्पना आज मुश्किल है. 19वीं शताब्दी के दौरान बीकानेर रियासत में चांदी या सोने के सिक्कों के साथ-साथ गत्ते (कार्डबोर्ड) से बने सिक्कों का भी प्रचलन था. यह सुनने में भले ही किसी अजूबे जैसा लगे, लेकिन बीकानेर के बाजार और दैनिक लेन-देन में इन गत्ते के सिक्कों की पूरी मान्यता थी. इतिहास की ये अनमोल कड़ियाँ आज भले ही चलन से बाहर हो चुकी हैं, लेकिन संग्रहकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए ये सिक्के बीकानेर की समृद्ध और नवाचारी विरासत का सबसे बड़ा प्रमाण हैं. बीकानेर के संग्रहकर्ता किशन के पास आज भी ये दुर्लभ सिक्के सुरक्षित हैं, जो उस दौर की आर्थिक व्यवस्था की एक झलक पेश करते हैं.
उस समय बीकानेर रियासत में एक पैसा, एक आना, दो आना और चार आना के मूल्य वाले गत्ते के सिक्के उपयोग में लाए जाते थे. ये सिक्के वर्तमान के गोल सिक्कों के बजाय आकार में छोटे और चौकोर या आयताकार होते थे. इन सिक्कों को खास तरीके से तैयार किया जाता था ताकि उनकी प्रामाणिकता बनी रहे. सिक्के के मुख्य भाग यानी आगे की तरफ अंग्रेजी में ‘गवर्मेंट ऑफ बीकानेर’ लिखा होता था और साथ ही उस सिक्के का मूल्य भी अंकित किया जाता था. धातु के अभाव में भी इन सिक्कों को इस तरह बनाया गया था कि लोग इन्हें आसानी से पहचान सकें और इनका उपयोग कर सकें. ये सिक्के उस दौर के प्रशासनिक कौशल का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करते हैं.
सरकारी मोहर और ट्रेजरी के हस्ताक्षरगत्ते के सिक्कों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी सुरक्षा और प्रामाणिकता थी. सिक्के के पीछे की ओर बाकायदा सरकारी मोहर लगाई जाती थी, जो इसे राज्य द्वारा वैध घोषित करती थी. इतना ही नहीं, इन पर सदर ट्रेजरी के उच्च अधिकारियों के हस्ताक्षर भी होते थे, जिससे यह सुनिश्चित किया जाता था कि सिक्का असली है और इसे बाजार में कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता. यह व्यवस्था आज के नोटों की तरह ही काम करती थी, जहाँ कागज के मूल्य को सरकार की गारंटी दी जाती है. उस समय गत्ते के इन सिक्कों को प्रशासन द्वारा पूरी तरह मान्य किया गया था, जिससे आम जनता और व्यापारियों के बीच लेन-देन सुगम बना रहा.
आर्थिक नवाचार और दुर्लभ विरासतइतिहासकारों का मानना है कि गत्ते के सिक्कों का प्रचलन संभवतः किसी विशेष आर्थिक परिस्थिति या धातु की भारी कमी के कारण शुरू किया गया था. जब चांदी या तांबे जैसे संसाधनों का प्रबंधन कठिन हुआ, तब बीकानेर रियासत के शासकों ने इस वैकल्पिक मुद्रा को पेश कर एक बड़े आर्थिक संकट को टाला होगा. यह तथ्य दर्शाता है कि उस समय भी बीकानेर प्रशासनिक नवाचार और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने में काफी आगे था. आज ये सिक्के विश्वभर के संग्रहकर्ताओं के बीच आकर्षण का केंद्र हैं और इन्हें एक दुर्लभ धरोहर के रूप में देखा जाता है. यह बीकानेर की उस आर्थिक समझ को बयां करता है, जिसने संसाधनों की कमी के बावजूद राज्य के व्यापारिक पहिये को रुकने नहीं दिया.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Bikaner,Bikaner,Rajasthan
First Published :
April 17, 2026, 10:01 IST



