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पीएम मोदी-अमित शाह ने कौन सा खुल्ला चैलेंज दे दिया कि राहुल का गुब्बारा फिर फट गया?

पिछले 20 दिन से पूरा देश देख रहा है कि संसद में क्या हो रहा है और ये इंडी वाले क्या कर रहे हैं. ये बैक टू बैक एक्सपोज़ हो रहे हैं. पहले छात्रों के मुद्दे पर इनकी पॉलिटिक्स की पोल खुली. फिर आज ये संसद को रोकने वाली पॉलिटिक्स में एक्सपोज हो गए. इतने दिन से इन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को घेरने में पूरी ताकत लगा रखी थी. ये अमित शाह का जवाब सुनना चाहते थे कि जंतर मंतर पर छात्रों के साथ क्या हुआ था? लेकिन जब जवाब सुनने की बारी आई तो ये सुनने को तैयार नहीं हैं.

अमित शाह ने तो आज खुला चैलेंज दे दिया कि चर्चा करो, जवाब देने के लिए तैयार हूं. अमित शाह ने टाइम भी बता दिया. लेकिन अब ये कह रहे हैं कि अमित शाह कौन होते हैं टाइम तय करने वाले. अमित शाह कौन होते हैं हमें एजेंडा बताने वाले. राहुल गांधी तो यहां तक कहने लगे कि अमित शाह के लेक्चर सुनने में उनका कोई इंटरेस्ट नहीं.

मोदी-शाह को घेरने चले राहुल गांधी खुद ही फंसे

जब अमित शाह को सुनना ही नहीं, फिर ये जवाब क्यों अमित शाह से मांग रहे हैं. यानी या तो ये लोग कंफ्यूज है या फिर इनका मकसद जवाब लेना नहीं हंगामा करना है. क्योंकि इन्हें भी पता है कि जब चर्चा होगी, जवाब मिलेगा तो फिर इनको ही उल्टा पड़ सकता है. इसीलिए अब इन्होंने फिर से गोलपोस्ट चेंज कर दिया. अब ये कह रहे हैं कि जैसे ये चाहते हैं, वैसे ही अमित शाह बोलें. ना एक शब्द ज्यादा ना एक शब्द कम.

ये सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि मोदी-शाह को घेरने चले राहुल गांधी खुद ही फंसे हुए हैं. जो लोग अमित शाह से जवाब मांग रहे हैं, वो खुद अब झारखंड पर सफाई देते फिर रहे हैं, क्योंकि झारखंड में बच्चे अभी भी डटे हुए हैं. जो राहुल गांधी ये माहौल बना रहे थे कि पीएम मोदी और अमित शाह की इमेज का गुब्बारा फट गया है. वो राहुल गांधी अब झारखंड के मुद्दे पर ऐसा फंसे ही उनकी Genz के नेता वाली इमेज धुआं-धुआं हो रही है.

और शायद इसलिए राहुल गांधी भड़क रहे हैं, इसके बारे में आपको बताऊंगा… संसद में मोदी-शाह विदेशी फंडिंग से जुड़ा बिल ले आई तो कौन सा ट्विस्ट आ गया उसकी भी बात होगी. झारखंड के मुद्दे पर फंसे कॉकरोच वाले अब कौन सा आंदोलन शुरू करने वाले हैं इसकी भी बात होगी.

गोलपोस्ट चेंज, नई शर्तें लगाई

संसद में पिछले 20 दिन से जो सीन दिख रहा है, उसमें यही डेली रूटीन बना हुआ था कि संसद के बाहर नारे लगाए जाते थे, संसद के अंदर जाकर हंगामा किया जाता था. एक-दो दिन की बात होती तो कोई सवाल नहीं उठाता, क्योंकि ये तो सब जानते हैं कि यही विपक्ष का काम है. लेकिन जब 20-20 दिन संसद नहीं चलेगी और सिर्फ हंगामा होगा तो फिर सवाल ये उठेंगे कि कोई मजाक चल रहा है क्या? क्योंकि तरीका तो ये होता है कि चर्चा करो, जवाब लो, लेकिन जब गोलपोस्ट चेंज किए जाएंगे, नई शर्तें लगाई जाएंगी.

तो फिर मकसद ये दिख जाता है कि किसी को चर्चा नहीं करनी, सिर्फ हंगामा करना है, और वही आज साफ दिख गया. क्योंकि अगर ऐसा ना होता तो आज गृह मंत्री अमित शाह ने जब खुद आकर कह दिया कि सबका जवाब दूंगा. तो फिर क्यों राहुल गांधी ने इसे रिजेक्ट कर दिया.

जंतर मंतर को लेकर इंडी वाले अमित शाह का जवाब मांग रहे थे. आज अमित शाह ने इंडी वालों को मैसेज भिजवा दिया कि आओ चर्चा करते हैं. अमित शाह ने कहा कि दोपहर 2 बजे विपक्ष स्पीकर को चर्चा के लिए लेटर दे दें और दोपहर 3 बजे लोकसभा में चर्चा शुरू कर सकते हैं. अमित शाह ने कहा कि पूरी चर्चा को वो सुनेंगे और कल सबको सुनकर जवाब देंगे.

यही संसद में चर्चा का तरीका है. इसमें किसी को दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए. विपक्ष संसद में ऑन रिकॉर्ड अपनी बात रखे और उस पर सरकार जवाब देगी, लेकिन राहुल गांधी ने फिर से गोल पोस्ट चेंज कर दिया है. नई शर्त लगा दी. राहुल गांधी को उसी शर्त पर अमित शाह का जवाब चाहिए. राहुल गांधी ये चाहते हैं कि जैसा वो कह रहे हैं वैसे ही सदन चले. उनके ऑर्डर पर अमित शाह सदन में आएं और उतना ही बोलें जितना राहुल गांधी पूछ रहे हैं. ना एक शब्द ज्यादा ना एक शब्द कम.

शर्तों पर सदन नहीं चलता

लेकिन ऐसा शर्तों पर सदन नहीं चलता. राहुल गांधी ये नहीं समझ रहे कि अगर देश के गृहमंत्री से सवाल का जवाब चाहिए तो इसके लिए विपक्ष को सदन में उनसे सवाल करने होंगे. ऑन रिकॉर्ड सवाल होगा तभी उसका जवाब दिया जाएगा. इसलिए अमित शाह ने आज कहा कि विपक्ष लिखित में स्पीकर को दे दें कि वो क्या चाहते हैं. सरकार हर मुद्दे पर बात करने को तैयार हैं.

लेकिन राहुल गांधी अलग ही जिद पकड़कर बैठे हुए हैं, जबकि ऐसे नहीं होता कि मीडिया में सवाल कर दो और संसद में उसका जवाब ले लो. और राहुल गांधी को इस बात से दिक्कत क्या है, क्या उन्हें ये डर लग रहा है कि जब अमित शाह जवाब देंगे तो क्या विपक्ष सुनकर चला जाएगा या उस पर कोई काउंटर सवाल नहीं होगा क्या… तो वही चर्चा में बदल जाएगी. यही बात अमित शाह कह रहे हैं.

राहुल गांधी फिर ये माहौल बना रहे हैं कि पीएम मोदी और अमित शाह की इमेज का गुब्बारा फट गया है. ये पिछले 12 सालों से ये यही माहौल बना रहे हैं और बैक टू बैक चुनाव हार रहे हैं. आप देखिए राहुल गांधी आज से नहीं बल्कि 2014, 2016 से ये बातें कर रहे हैं आपको उनके पुराने बयान सुनाता हूं.

लोकसभा में चर्चा के लिए अमित शाह ने दोपहर 3 बजे का टाइम दिया था, लेकिन ना विपक्ष ने स्पीकर को लेटर लिखा ना ही सदन को चलने दिया. लोकसभा में जब 3 बजे कार्यवाही शुरू हुई तो विपक्ष ने फिर हंगामा शुरू कर दिया है. इस पर संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि आप अभी के अभी हंगामा बंद कर दीजिए. सरकार चर्चा शुरू कर देगी.

अमित शाह ने स्पीकर को लेटर में क्या लिखा?

इंडी वालों ने तो लोकसभा स्पीकर को कोई लेटर नहीं दिया, लेकिन अमित शाह ने लोकसभा स्पीकर को लेटर लिखकर चर्चा शुरू करने की अपील की. लेटर में लिखा गया कि एंटी पेपर लीक पर विपक्ष ने कोई विचार व्यक्त नहीं किए. फिर भी सरकार इस पर फिर से चर्चा को तैयार है. विपक्ष से चर्चा कर जितना वक्त आप उचित समझें उतना वक्त चर्चा के लिए तय करें. अमित शाह ने कहा कि चर्चा के वक्त सदन में उपस्थित रहकर सभी सवालों का जवाब देंगे.

अमित शाह साफ कह रहे हैं कि वो हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार हैं, हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं. लेकिन इंडी वाले चर्चा के लिए एक लेटर लिखने को तैयार नहीं है. कह रहे हैं कि उसकी क्या जरूरत है. अमित शाह सीधे सदन में आएं और जवाब दें. यानी इनके मुताबिक जैसा ये कह रहे हैं बिल्कुल वैसा ही हो.

नहीं तो ये लोग संसद नहीं चलने देंगे. अमित शाह के जिस जवाब को सुनने के लिए आपने इतने दिन संसद नहीं चलने दी. उससे सुनने के लिए भी अब आप 100 तरह की शर्तें लगा रहे हैं. जबकि आपको तो इस पर तुरंत मान जाना चाहिए, क्योंकि राहुल गांधी और इंडी वाले तो यही माहौल बना रहे हैं कि अमित शाह इस मुद्दे पर फंसे हुए हैं. अगर ऐसा ही है तो फिर तो इंडी वालों तो तुरंत चर्चा शुरू कर अमित शाह को घेर लेना चाहिए.

जवाब न देने से दिक्कत, जवाब देने से भी दिक्कत

जब अमित शाह जवाब नहीं दे रहे थे तब इंडी वालों को दिक्कत थी. जब अमित शाह जवाब देने को तैयार हो गए तो भी इन्हें दिक्कत है. इसलिए बीजेपी पहले ये कह रही थी कि जब अमित शाह बोलेंगे तो ये लोग सुन नहीं पाएंगे. वही आज हो रहा है और इसकी वजह भी बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बताई. बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि ‘सच्चाई यह है कि विपक्ष चर्चा से इसलिए भाग रहा था क्योंकि ये लोग गृह मंत्री जी का सामना करने से डरते हैं. जब अमित शाह सदन में तथ्यों के साथ बोलते हैं, तो उनके तर्कों के सामने विपक्ष की बोलती बंद हो जाती है. इसी डर से विपक्ष पूरे सत्र में केवल विषयों को बदलता रहा और चर्चा से भागता रहा.’

छात्रों से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए सरकार ने यहां तक कह दिया कि अगर इंडी वाले चर्चा के लिए तैयार हैं तो वो सत्र की ड्यूरेशन तक बढ़ाने को तैयार हैं. क्योंकि कल संसद सत्र का आखिरी दी है. लेकिन संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा है कि अगर कल सुबह 11 बजे भी कांग्रेस तैयार हो जाती है चर्चा के लिए तो समय बढ़ा देंगे. लेकिन कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि चर्चा का एजेंडा अमित शाह तय करने वाले कौन होते हैं.

कांग्रेस वाले कह रहे हैं कि अमित शाह कौन होते हैं चर्चा का वक्त तय करने वाले या चर्चा का एजेंडा तय करने वाले. जबकि अमित शाह ने साफ साफ कहा कि वो किसी भी सवाल का जवाब देने को तैयार हैं. तो फिर अमित शाह कैसे एजेंडा तय कर रहे हैं, आप संसद में सवाल पूछिए गृहमंत्री जवाब देंगे. लेकिन इन लोगों को हर बात से दिक्कत है.

आप देखिए इंडी वाले बार बार अपना गोल पोस्ट चेंज कर देते हैं. पहले इस बात पर अड़ थे कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो तब संसद में बात होगी. फिर ये शर्त रखी कि अमित शाह जंतर मंतर के मुद्दे पर जवाब दें उसके बाद कुछ होगा. अब इस बात पर अड़ गए कि जैसा वो चाहते हैं उसी के मुताबिक अमित शाह जवाब दें. उधर समाजवादी पार्टी बार बार ये याद दिला रही है कि चढ़ावा चोरी का भी मुद्दा है उस पर भी बहस हो.

यानी अमित शाह अगर सदन में जवाब भी दें तो भी सदन चल जाए इसकी कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि फिर इंडी वाले चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर आ जाएंगे. इधर संसद में चर्चा की चुनौती देकर अमित शाह ने राहुल गांधी और इंडी वालों को फंसा दिया, उधर झारखंड के मुद्दे पर राहुल गांधी की चुप्पी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. क्योंकि राहुल गांधी ने सबको दिखाने के लिए झारखंड के छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की निंदा तो की, लेकिन हेमंत सोरेन को फोन करके ये नहीं कहा कि बॉस आप क्या कह रहे हैं. ये लाठी चलाने का ऑर्डर किसने दे दिया? इसकी सुप्रीम कोर्ट से जांच होनी चाहिए क्योंकि वहां इनकी खुद की सरकार है.

झारखंड ने एक्सपोज किया राहुल का छात्र प्रेम

इसी पर राहुल गांधी फंसे हुए हैं… इतनी मेहनत से वो Genz का कूल नेता बनने में लगे थे, लेकिन झारखंड वाली घटना ने इनके छात्र प्रेम को एक्सपोज कर दिया . और शायद इसी को लेकर राहुल गांधी गुस्से में हैं, गुस्सा मीडिया पर निकाल रहे हैं. राहुल गांधी को हर चीज अपने मुताबिक चाहिए. अमित शाह कैसे बयान देंगे ये राहुल गांधी बताएंगे. मीडिया क्या सवाल करें ये भी राहुल गांधी ही तय करना चाहते हैं. इसलिए जब कभी कभी मीडिया की तरफ से आउट ऑफ सिलेबस सवाल आ जाता है तो राहुल गांधी भड़क जाते हैं.

जब से झारखंड के छात्रों को लाठी पड़ी है. तब से इंडी वालों भागते फिर रहे हैं, झारखंड के सवाल से बच रहे हैं. सवाल होने पर गाड़ी का शीशा ऊपर करके निकल जाते हैं. कोई एक ट्वीट कर खानापूर्ती कर रहा है.

सबसे ज्यादा राहुल गांधी पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि झारखंड में वो भी सत्ता में हैं. बीजेपी पूछ रही है कि छात्रों के मुद्दे पर हेमंत सोरेन का इस्तीफा क्यों नहीं मांग रहे, सीधे-सीधे कहिए कि छात्रों की मांग मानो, नहीं तो सपोर्ट वापस ले लेंगे. लेकिन राहुल गांधी को जंतर मंतर का हिसाब चाहिए, गृहमंत्री का इस्तीफा चाहिए, लेकिन झारखंड के मामले में वो क्या कह रहे हैं आप खुद पढ़ लीजिए. उन्होंने कहा, ‘झारखंड पर मैं चुप नहीं हूं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैंने सीधा बोला है. हम हमारे छात्रों के प्रति किसी भी तरह की हिंसा को स्वीकार नहीं करते. मैं चुप नहीं हूं, खुलकर बोल रहा हूं, ठीक है.’

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