Rajasthan

मशीनें भी फेल हैं जालोर के इस 1500 धागों वाले जादू के आगे, एक बार ओढ़ लिया तो मखमली नींद की गारंटी

Last Updated:April 27, 2026, 10:43 IST

Jalor Hindi News: राजस्थान के जालोर का पारंपरिक खेस अपनी अनोखी कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है. इसे करीब 1500 धागों से पूरी तरह हाथों से बुना जाता है, जिसमें किसी मशीन का उपयोग नहीं होता. 100% कपास से बना यह खेस हर मौसम में आरामदायक रहता है—गर्मी में ठंडक और सर्दी में हल्की गर्माहट देता है. ग्रामीण कारीगरों की मेहनत और हुनर का यह बेहतरीन उदाहरण है. इसकी टिकाऊ गुणवत्ता और प्राकृतिक कपड़े के कारण यह आज भी लोगों की पसंद बना हुआ है और भारतीय हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है.

जालोर का खेस, जिसे आम बोलचाल में खेसला भी कहा जाता है, कभी यहां के ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा हुआ करता था. हर घर में चरखा चलता था और हथकरघों की आवाज गांव की पहचान बन चुकी थी. यह सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि परंपरा, मेहनत और स्थानीय संस्कृति का प्रतीक था. लेकिन समय के साथ मशीनों और आधुनिक कपड़ा उद्योग के बढ़ते प्रभाव के कारण यह पारंपरिक शिल्प धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है.

खेस की सबसे बड़ी खासियत इसकी बनावट और उपयोगिता है. यह 100 प्रतिशत शुद्ध कपास से तैयार किया जाता है, जिससे यह सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है. बिना किसी केमिकल के बनने के कारण यह शरीर के लिए भी सुरक्षित और आरामदायक माना जाता है. यही वजह है कि इसे हर मौसम में इस्तेमाल किया जा सकता है और यह आज भी लोगों की पसंद बना हुआ है.

खेस बनाने की प्रक्रिया बेहद मेहनत और धैर्य मांगती है. इसके लिए पाली की प्रसिद्ध उम्मेद मिल से सूती धागा मंगवाया जाता है. इसके बाद लगभग 1500 धागों को एक साथ सेट कर हथकरघे में बुना जाता है. यह पूरी प्रक्रिया हाथों से की जाती है और एक खेस तैयार करने में कई दिन लग जाते हैं. हर धागा कारीगर की मेहनत और अनुभव की कहानी कहता है.

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लेकिन अब बदलते समय के साथ यह हस्तशिल्प कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन इसकी खासियत और परंपरा आज भी इसे जीवित रखे हुए हैं. जरूरत है इस कला को प्रोत्साहन और पहचान देने की, ताकि जालोर का यह खेस आने वाले समय में भी अपनी खास पहचान बनाए रख सके और कारीगरों की मेहनत रंग लाती रहे.

जालोर जिले के लेटा गांव में आज भी इस कला की झलक देखने को मिलती है. कभी यहां सैकड़ों हथकरघा इकाइयां सक्रिय थीं, लेकिन अब कुछ ही कारीगर इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. ये कारीगर अपने पूर्वजों से मिली इस कला को न सिर्फ सहेज रहे हैं, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाने की भी कोशिश कर रहे हैं.

इस खेस की खास पहचान इसकी सादगी और टिकाऊपन में छिपी है. यह सालों तक चलने वाला कपड़ा है, जो अपनी गुणवत्ता के कारण अलग स्थान रखता है. अब धीरे-धीरे यह खेस स्थानीय बाजार के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यमों से भी लोगों तक पहुंच रहा है, जिससे इसे नई पहचान मिलने लगी है.

First Published :

April 27, 2026, 10:43 IST

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