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Unwanted Pregnancy Case: अनचाहे गर्भ पर दो कोर्ट दो फैसले; सुप्रीम कोर्ट से HC तक डॉक्टरों की शामत, जज साहब ने खूब लताड़ा

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अनचाहे गर्भ पर दो कोर्ट दो फैसले; सुप्रीम कोर्ट से HC तक डॉक्टरों की शामत

Last Updated:May 07, 2026, 10:41 IST

Unwanted Pregnancy Case: अनचाहे गर्भ और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी के दो मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों और मेडिकल बोर्डों पर सख्त टिप्पणी की है. दिल्ली हाईकोर्ट ने 27 हफ्ते की गर्भवती महिला के मामले में आरएमएल अस्पताल के डॉक्टरों को फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की रेप पीड़िता के मामले में AIIMS के रवैये पर नाराजगी जताई. अदालतों ने कहा कि महिलाओं की प्रजनन स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार है और मेडिकल संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट तरीके से निभानी होगी.अनचाहे गर्भ पर दो कोर्ट दो फैसले; सुप्रीम कोर्ट से HC तक डॉक्टरों की शामतZoomअनचाहे गर्भ और MTP मामलों में सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉक्टरों और मेडिकल बोर्डों को फटकार लगाई. (सांकेतिक फोटो)

Unwanted Pregnancy Case: अनचाहे गर्भ और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) को लेकर अदालतों की सख्ती अब सिर्फ कानूनी बहस तक सीमित नहीं रह गई है. दिल्ली हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जजों ने साफ संकेत दिया है कि किसी महिला की प्रजनन स्वतंत्रता को सरकारी मेडिकल बोर्डों की हिचकिचाहट या डॉक्टरों की ढुलमुल राय के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता. एक तरफ दिल्ली हाईकोर्ट ने 27 हफ्ते की गर्भवती महिला के मामले में राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टरों को फटकार लगाई. क्योंकि मेडिकल बोर्ड कोर्ट के सीधे आदेश के बावजूद यह नहीं बता पाया कि अबॉर्शन संभव है या नहीं. दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की रेप पीड़िता की 30 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म कराने के मामले में AIIMS के खिलाफ अवमानना कार्यवाही तक शुरू कर दी थी. दोनों मामलों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कानून साफ होने के बावजूद मेडिकल संस्थान निर्णय लेने से क्यों बचते हैं. अदालतों की टिप्पणी यह भी बताती है कि अब महिला की ‘रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी’ को केवल मेडिकल राय नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के इन दोनों फैसलों में एक समान बात दिखाई देती है. अदालतें डॉक्टरों से सिर्फ मेडिकल राय नहीं, बल्कि संवेदनशील और स्पष्ट जवाब चाहती हैं. हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि किसी नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. जस्टिस बी वी नागरत्ना ने यहां तक कहा कि अगर बड़े अस्पताल मदद नहीं करेंगे तो महिलाएं झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाएंगी और उनकी जान खतरे में पड़ जाएगी. वहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को कानूनी दायित्व की अनदेखी बताया. अदालतों का यह कड़ा रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल के सालों में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है जहां गर्भ में गंभीर असामान्यताएं या रेप पीड़िता की स्थिति अदालत तक पहुंच जाती है और हर दिन की देरी महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ती है.

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत 24 हफ्ते तक कुछ शर्तों के साथ अबॉर्शन की अनुमति दी जा सकती है.

मेडिकल बोर्ड की चुप्पी पर हाईकोर्ट नाराज

दिल्ली हाईकोर्ट में 29 वर्षीय महिला ने 27 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म करने की अनुमति मांगी थी. महिला का कहना था कि भ्रूण में गंभीर असामान्यताएं हैं और गर्भ जारी रखने से गर्भ में ही बच्चे की मौत का खतरा है. कोर्ट ने RML अस्पताल और ABVIMS को मेडिकल जांच कर स्पष्ट राय देने का आदेश दिया था. लेकिन मेडिकल बोर्ड ने यह बताने के बजाय कि अबॉर्शन संभव है या नहीं, महिला को गर्भ जारी रखने की सलाह दे दी.
जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने इसे अदालत के आदेश की अनदेखी माना. कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों ने MTP एक्ट की भावना और अपने वैधानिक दायित्वों को नजरअंदाज किया. अदालत ने यहां तक चेतावनी दी कि भविष्य में कोर्ट के आदेशों का अक्षरश: पालन होना चाहिए. इसके बाद महिला को जांच के लिए AIIMS भेजा गया.
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि महिलाओं की प्रजनन स्वतंत्रता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने केंद्र सरकार के वकील से कहा कि मेडिकल बोर्ड को साफ-साफ बताना चाहिए था कि वे अबॉर्शन के पक्ष में हैं या निजी डॉक्टरों की राय से असहमत हैं.

सुप्रीम कोर्ट में AIIMS पर अवमानना की तलवार

दूसरा मामला 15 साल की रेप पीड़िता से जुड़ा था, जिसकी 30 हफ्ते की गर्भावस्था खत्म करने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दी थी. लेकिन AIIMS ने पहले इस आदेश पर हिचक दिखाई और बाद में पुनर्विचार तथा क्यूरेटिव याचिका तक दायर कर दी. अस्पताल का कहना था कि इतने समय बाद अबॉर्शन में बच्चा जीवित पैदा हो सकता है और उसमें गंभीर विकलांगताएं हो सकती हैं.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला माना. कोर्ट ने कहा कि किसी नाबालिग लड़की को अनचाहे गर्भ के साथ जीने के लिए मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. बाद में AIIMS ने कोर्ट के आदेश के अनुसार प्रक्रिया पूरी की. बच्चा जीवित पैदा हुआ और उसे NICU में रखा गया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही बंद कर दी.

जजों की चिंता सिर्फ कानून नहीं, समाज भी

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नाबालिग लड़कियों में अनचाहे गर्भ के मामले बढ़ना चिंता का विषय है. उन्होंने कहा कि परिवार पहले सदमे में रहता है और फैसला लेने में देर हो जाती है, जिससे मामला सातवें महीने तक पहुंच जाता है. कोर्ट ने सरकार को MTP कानून में बदलाव पर भी विचार करने की सलाह दी.

कोर्ट की टिप्पणियां बताती हैं कि अब ऐसे मामलों को सिर्फ मेडिकल प्रक्रिया नहीं माना जा रहा. इसमें महिला की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और संवैधानिक अधिकार को बराबर महत्व दिया जा रहा है. यही वजह है कि अदालतें अब मेडिकल बोर्डों की अस्पष्ट रिपोर्ट पर सख्त रुख अपना रही हैं.

अदालतें डॉक्टरों और मेडिकल बोर्डों से नाराज क्यों दिखीं?

जवाब: दोनों मामलों में कोर्ट को लगा कि मेडिकल बोर्ड और अस्पताल स्पष्ट जिम्मेदारी लेने से बच रहे थे. दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों ने कोर्ट के सीधे आदेश के बावजूद यह नहीं बताया कि अबॉर्शन संभव है या नहीं. वहीं सुप्रीम कोर्ट को लगा कि AIIMS बार-बार कानूनी प्रक्रिया में देरी कर रहा है. अदालतों का मानना है कि ऐसे मामलों में अस्पष्ट राय महिला के अधिकारों और स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करती है.

MTP एक्ट महिलाओं को क्या अधिकार देता है?

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत 24 हफ्ते तक कुछ शर्तों के साथ अबॉर्शन की अनुमति दी जा सकती है. लेकिन यदि भ्रूण में गंभीर असामान्यता हो या महिला के जीवन और मानसिक स्वास्थ्य पर खतरा हो, तो अदालतें 24 हफ्ते के बाद भी अनुमति दे सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि महिला की प्रजनन स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा है.

कोर्ट की सख्ती का आगे क्या असर पड़ सकता है?

इन फैसलों के बाद मेडिकल बोर्डों और सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ेगा कि वे ऐसे मामलों में स्पष्ट और समयबद्ध राय दें. अदालतों ने संकेत दिया है कि महिला की इच्छा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. साथ ही सरकार पर भी दबाव बनेगा कि MTP कानून में बदलाव कर नाबालिग रेप पीड़िताओं और गंभीर भ्रूण असामान्यता वाले मामलों के लिए प्रक्रिया आसान बनाई जाए.

About the AuthorSumit KumarSenior Sub Editor

सुमित कुमार हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 4 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह…और पढ़ें

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