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Bhadreshwar Mahadev I भद्रेश्वर महादेव मंदिर I pali news I rajasthan news

Last Updated:June 17, 2026, 22:54 IST

Bhadreshwar Mahadev: राजस्थान के पाली जिले में जवाई बांध के कैचमेंट क्षेत्र में स्थित 11वीं सदी का ऐतिहासिक भद्रेश्वर महादेव मंदिर अपनी पौराणिक मान्यताओं और रहस्यमयी अस्तित्व के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां ठहरे थे, जिसके कारण इस शिवालय का नाम भद्रेश्वर पड़ा. जवाई बांध के निर्माण के बाद से यह प्राचीन मंदिर लगातार पानी और मिट्टी में समाता जा रहा है. आज हालात यह हैं कि गर्मियों में बांध खाली होने पर केवल इसका अंतिम शिखर ही दिखाई देता है, जिसे देखकर स्थानीय लोग बांध के जलस्तर का अंदाजा लगाते हैं.

पाली. राजस्थान की वीरधरा अपने आगोश में न जाने कितने ही रहस्य और पौराणिक गाथाएं समेटे हुए है. आज हम आपको मारवाड़ के एक ऐसे ही अनोखे और चमत्कारिक महादेव मंदिर की सैर पर लेकर चल रहे हैं, जिसका सीधा कनेक्शन द्वापर युग के ‘पांडवों’ से जुड़ा है. एक ऐसा मंदिर जो पश्चिमी राजस्थान की लाइफलाइन कहे जाने वाले जवाई बांध की अथाह जलराशि और मिट्टी के बीच पिछले कई दशकों से ‘भू-समाधि’ ले रहा है. कुदरत का करिश्मा देखिए कि यहां कोई आधुनिक पैमाना नहीं, बल्कि इस मंदिर का डूबता शिखर देखकर ही स्थानीय ग्रामीण जवाई बांध के पानी का सटीक अंदाजा लगा लेते हैं.

जवाई बांध की गोद में दफन हो रहा यह मंदिर पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा जवाई बांध न केवल करोड़ों कंठों की प्यास बुझाता है, बल्कि यह रियासतकालीन वैभव के साथ-साथ हमारी प्राचीन धर्म और संस्कृति से भी गहरा नाता रखता है. जवाई बांध के कैचमेंट में दूदनी गांव के समीप मेवाड़ शैली में बना 11वीं सदी का ऐतिहासिक ‘भद्रेश्वर महादेव मंदिर’ स्थित है. दुर्भाग्यवश, यह पौराणिक मंदिर पिछले कई सालों से लगातार मिट्टी और पानी में डूब रहा है. प्रतिवर्ष मानसून के दौरान आने वाले नदी के पानी के साथ बहकर आने वाली मिट्टी के कारण यह पवित्र मंदिर हर साल करीब आधा इंच तक जमीन में धंसता जा रहा है.

ऐसे पड़ा ‘भद्रेश्वर’ महादेव नाम स्थानीय मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. बताया जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने मारवाड़ के इस दुर्गम मार्ग से प्रवास किया था. इस यात्रा के दौरान पांडवों ने इसी पावन स्थान पर रुककर अपने सिर का मुंडन करवाया था और वे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर ‘भद्र’ हुए थे. पांडवों के इसी स्थान पर भद्र होने की ऐतिहासिक घटना के कारण इस प्राचीन शिवालय का नाम ‘भद्रेश्वर महादेव’ पड़ा. यह स्थान सदियों तक तपस्वियों और भक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र रहा है.

5 फीट नीचे था शिवलिंग बुजुर्गों की मानें तो जवाई बांध के निर्माण से पहले इस डूब क्षेत्र में तीन विशाल गुंबदनुमा पौराणिक मंदिरों का समूह हुआ करता था. इस भव्य परिसर के पास इमली के तीन बेहद विशाल पेड़, पानी निकालने वाली एक बड़ी प्राचीन रहटनुमा बावड़ी और दूर-दराज से आने वाले यात्रियों के ठहरने के लिए एक धर्मशाला निर्मित थी. मंदिर का स्थापत्य ऐसा था कि मुख्य द्वार से प्रवेश करने के बाद भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग करीब 5 फीट नीचे गर्भगृह में स्थापित थी. जब पुजारी पूजा के लिए बैठते थे, तो बाहर से सिर्फ उनका सिर ही नजर आता था. लेकिन आज बांध के भराव और मिट्टी के कारण वह वैभव इतिहास के गर्त में खो चुका है.

बांध खाली होते ही होते है महादेव के अंतिम शिखर के दर्शन जवाई बांध के हर साल भरने और खाली होने के चक्र के बीच इस मंदिर के लगातार जमींदोज होने का सिलसिला बदस्तूर जारी है. बांध के निर्माण के बाद से ही इसके दोनों विशाल गुंबद पूरी तरह से मिट्टी में धंस चुके हैं. अब हालात यह हैं कि जब गर्मियों के मौसम में जवाई बांध का पानी पूरी तरह खाली हो जाता है, तब इस विशाल मंदिर का एकमात्र अंतिम गुंबद (शिखर) दिखाई देता है, जो जमीन से मात्र 6 फीट ही बाहर रह गया है. इस दौरान आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस चमत्कारी गुंबद के दर्शन करने और महादेव की चौखट पर मत्था टेकने खिंचे चले आते हैं.

इंजीनियर्स भी मानते हैं लोहाजल संसाधन विभाग के अभियंता का मानना है कि जवाई बांध में पानी का गेज जैसे ही 52 फीट पर पहुंचता है, यह मंदिर आधा पानी में डूब जाता है. वहीं, जब बांध अपनी पूरी क्षमता यानी 61 फीट के करीब पहुंचता है, तो मंदिर का यह शिखर पूरी तरह आंखों से ओझल हो जाता है. वर्ष 2017 का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जब बांध क्षेत्र में भेड़ें डूबने के दौरान एक बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया था, तब जवाई का गेज 52 फीट था और यह मंदिर ठीक आधा डूबा हुआ नजर आ रहा था.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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