Rajasthan

Sundha Parvat: महाराणा प्रताप का ससुराल कहलाने वाला यह पर्वत बना था मुगलों के खिलाफ सबसे बड़ा किला

Last Updated:June 17, 2026, 21:55 IST

Sundha Parvat: हल्दीघाटी के युद्ध के बाद जब महाराणा प्रताप को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, तब अरावली की दुर्गम पहाड़ियां उनके संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत बनी. आबू, आवरगढ़ और सुंधा पर्वत जैसे क्षेत्रों में रहकर उन्होंने अपनी छापामार युद्धनीति को मजबूत किया और मुगलों के खिलाफ लगातार मोर्चा संभाले रखा. लोक मान्यताओं के अनुसार, सुंधा पर्वत पर उन्होंने करीब दो वर्ष बिताए और यही स्थान ‘प्रताप का ससुराल’ के नाम से भी प्रसिद्ध है. इतिहास और लोकविश्वास से जुड़ा यह पर्वत आज भी महाराणा प्रताप के साहस, रणनीति और अदम्य संघर्ष की गाथा सुनाता है.

जालौर. राजस्थान की अरावली पर्वतमाला केवल प्राकृतिक सुंदरता का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह उस इतिहास की जीवंत गवाही है जहां संघर्ष, साहस और रणनीति ने मिलकर एक नया अध्याय लिखा. इन्हीं पहाड़ियों से जुड़ी है महाराणा प्रताप की वह कहानी, जो आज भी लोक स्मृतियों में वीरता के प्रतीक के रूप में जानी जाती है. हल्दीघाटी के युद्ध के बाद जब परिस्थितियां प्रताप के लिए अत्यंत कठिन हो गई, तब उन्होंने हार मानने के बजाय संघर्ष का नया रास्ता चुना. यही वह समय था जब अरावली की दुर्गम पहाड़ियों ने उन्हें सहारा दिया. आबू की पहाड़ियां, आवरगढ़ का क्षेत्र और सुंधा पर्वत, ये सभी स्थान उनके लिए केवल भौगोलिक ठिकाने नहीं थे, बल्कि उनकी छापामार युद्धनीति के मजबूत आधार बने. महाराणा प्रताप ने इन पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बनाया. सकरी घाटियां, घने जंगल और ऊंचे-नीचे रास्ते उन्हें दुश्मनों से बचने और अचानक आक्रमण करने का अवसर देते थे. यही छापामार युद्धनीति उनकी सबसे प्रभावी रणनीति साबित हुई, जिससे वे लंबे समय तक मुगलों के खिलाफ संघर्ष जारी रख सके.

इस स्थान को लोक स्मृतियों में ‘प्रताप का ससुराल’ भी कहा

सुंधा पर्वत इस पूरे संघर्षकाल का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. लोक कथाओं और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, महाराणा प्रताप ने यहां लगभग दो वर्षों तक समय बिताया. यह स्थान उनके लिए एक सुरक्षित आश्रय की तरह था, जहां वे अपने साथियों के साथ आगे की रणनीति तैयार करते थे और युद्ध की योजनाओं को आकार देते थे. सुंधा पर्वत केवल एक ठिकाना नहीं था, बल्कि यह उनके जीवन के कठिन समय का साक्षी भी बना. यहां की शांति और दुर्गमता ने उन्हें आत्मबल दिया और उनके संघर्ष को और मजबूत किया. यही कारण है कि यह स्थान आज भी इतिहास और लोकविश्वास दोनों में विशेष महत्व रखता है. लोक परंपराओं में एक रोचक मान्यता यह भी जुड़ी हुई है कि सुंधा माता पर्वत पर महाराणा प्रताप का एक विवाह भी हुआ था. इसी कारण इस स्थान को लोक स्मृतियों में ‘प्रताप का ससुराल’ भी कहा जाता है. यह कथाएं इतिहास और लोकविश्वास के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती हैं, जो इस स्थल को और भी विशेष बना देती हैं. इतिहासकार चन्द्रशेखर शर्मा ने बताया कि यह पूरा क्षेत्र प्रताप की युद्धनीति का महत्वपूर्ण केंद्र था. अरावली की पहाड़ियों में छिपकर उन्होंने न केवल अपनी सेना को संगठित किया, बल्कि मुगलों के खिलाफ लगातार छापामार हमले भी किए. यह रणनीति इतनी प्रभावी थी कि बड़े साम्राज्य के सामने भी वे लंबे समय तक डटे रहे. सुंधा पर्वत और अरावली की यह पूरी श्रृंखला आज भी उस संघर्ष की याद दिलाती है, जहां एक योद्धा ने संसाधनों की कमी के बावजूद अपनी बुद्धिमानी और साहस से इतिहास को नया मोड़ दिया.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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