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फीफा वर्ल्ड कप के बीच देखें फुटबॉल पर बनी 8 फिल्में, खेल के दीवानों के लिए छिपा है भरपूर ड्रामा और इमोशन

Last Updated:June 18, 2026, 04:01 IST

फीफा वर्ल्ड कप का क्रेज दुनिया भर में छाया हुआ है. अगर आप फिल्मों के जरिये फुटबॉल के रोमांच और इतिहास की झलक पाना चाहते हैं, तो आपको ये 8 इंडियन फिल्में जरूर देखनी चाहिए. इन फिल्मों में खेल के प्रति जुनून, संघर्ष और देशप्रेम को बखूबी दिखाया गया है. लिस्ट में ‘मैदान’ और ‘कैप्टन’ जैसी बायोपिक्स हैं, जो भारतीय फुटबॉल के दिग्गजों की कहानी कहती हैं. ‘धन धना धन गोल’, ‘एगारो’ जैसी फिल्में फुटबॉल के जरिए नस्लवाद और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ ऐतिहासिक स्ट्रगल को पर्दे पर उतारती हैं.

नई दिल्ली: दुनियाभर में इस समय फुटबॉल का जबरदस्त क्रेज देखने को मिल रहा है. हर तरफ फीफा वर्ल्ड कप का खुमार छाया हुआ है और फैंस अपनी पसंदीदा टीमों को चीयर कर रहे हैं. ऐसे में फुटबॉल के इसी जुनून और रोमांच को दोगुना करने के लिए भारतीय सिनेमा ने भी समय-समय पर बेहतरीन फिल्में बनाई हैं, जो खेल प्रेमियों का दिल जीत लेती हैं.

अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘झुंड’ (2022) भी फुटबॉल की ताकत को बयां करती है. विजय बारसे के असल जीवन से प्रेरित यह कहानी एक रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर की है. वह झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए फुटबॉल को जरिया बनाता है. वह खेल से उनकी जिंदगी बदल देता है.

साल 2007 में आई जॉन अब्राहम की फिल्म ‘धन धना धन गोल’ भी फुटबॉल प्रेमियों की पसंदीदा रही है. यह हिंदी फिल्म ब्रिटेन के साउथॉल में रहने वाले एशियाई मूल के खिलाड़ियों के फुटबॉल क्लब की कहानी है, जो नस्लवाद और भारी आर्थिक तंगहाली से जूझते हुए अपनी पहचान के लिए लड़ता है.

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अजय देवगन स्टारर फिल्म ‘मैदान’ दिग्गज फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम की जिंदगी पर आधारित है. इसमें 1952 से 1962 के बीच भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम युग को दिखाया गया है, जब भारत ने एशियन गेम्स में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी.

थलापति विजय की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बिगिल’ में ‘माइकल’ नाम का एक पूर्व फुटबॉलर महिलाओं की फुटबॉल टीम का कोच बनता है. वह न सिर्फ उन्हें खेल की बारीकियां सिखाता है, बल्कि समाज और उनकी निजी चुनौतियों से लड़ना भी सिखाता है.

बंगाली फिल्म ‘एगारो’ भी देखने लायक है. अगर आप फुटबॉल के दीवाने हैं, तो आपको इसे जरूर देखना चाहिए. इसमें दिखाया गया है कि कैसे मोहन बागान 1911 में ब्रिटिश ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को हराकर आईएफए शील्ड जीतता है.

फुटबॉल के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए ‘कैप्टन’ (2018) जैसी फिल्में बेहतरीन हैं. मलयालम फिल्म ‘कैप्टन’ भारतीय फुटबॉल कप्तान वीपी सत्यन की बायोपिक है.

‘खेलें हम जी जान से’ (2010) और देव अधिकारी की बंगाली फिल्म ‘गोलोंदाज’ (2021) भी राष्ट्रवाद और खेल के इस मेल को आगे बढ़ाती है. फुटबॉल प्रेमियों को ये फिल्में जरूर देखनी चाहिए.

‘गोलोंदाज’ में नागेंद्र प्रसाद सरबाधिकारी की जिंदगी के जरिए यह दिखाया गया है कि कैसे अंग्रेजों के दौर में फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि देश के आत्मसम्मान और आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया था.

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