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Agriculture: यूरिया-डीएपी की किल्लत से बचना है? किसान अपनाएं ये सस्ते विकल्प, बढ़ेगा उत्पादन

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यूरिया-डीएपी की किल्लत से बचना है? किसान अपनाएं ये सस्ते विकल्प, बढ़ेगा उपज

Last Updated:June 16, 2026, 07:05 IST

Agriculture Tips: प्री-मानसून के साथ राजस्थान समेत कई राज्यों में बुवाई का मौसम शुरू होने वाला है. इस दौरान डीएपी और यूरिया की मांग बढ़ने से किसानों को अक्सर खाद की कमी और लंबी कतारों का सामना करना पड़ता है. कृषि विभाग ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों के विकल्प अपनाने की सलाह दी है. गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, रॉक फॉस्फेट, नैनो यूरिया, नैनो डीएपी और जैव उर्वरक मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में मदद करते हैं. इन विकल्पों से खेती की लागत कम होती है, उत्पादन बढ़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता.

राजस्थान समेत अन्य राज्यों में प्री मानसून के साथ किसान बुवाई की शुरुआत करने वाले हैं. बुवाई के दौरान किसानों को खाद की जरुरत ज्यादा होती है. इसमें किसान डीएपी और यूरिया खाद की डिमांड सबसे ज्यादा करते है. एक ही समय में ज्यादा डिमांड की वजह से किसानों को किल्लत का सामना करना पड़ता है. बाजार में इस खाद के कई विकल्प भी मौजूद है. सिरोही कृषि विभाग के अनुसार, खेत में मिट्टी की ताकत को हमेशा बनाए रखने के लिए हर तीन साल में कम से कम एक बार खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, केंचुआ खाद या हरी खाद जैसे ढेंचा या अन्य का उपयोग जरूरी होता है. डीएपी में मिलने वाले फॉस्फोरस की कमी को पनेचुरल ‘रॉक फॉस्फेट’ के जरिए भी पूरा किया जा सकता है. इस रॉक फॉस्फेट को गोबर खाद के साथ मिलाकर खेत में डालने से मिट्टी को बिना कोई नुकसान पहुंचाए डीएपी की अच्छे अच्छे रिजल्ट मिल सकते है.

नैनो टेक्नोलॉजी से तैयार नैनो लिक्विड यूरिया और नैनो डीएपी पारंपरिक रासायनिक खादों का प्रभावी विकल्प बनकर उभरे हैं. सामान्य यूरिया का बड़ा हिस्सा हवा में उड़ जाता है या पानी के साथ बहकर नष्ट हो जाता है, जिससे पौधों को पूरा लाभ नहीं मिल पाता. इसके विपरीत नैनो खाद के सूक्ष्म कण सीधे पौधों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं, जिससे पोषक तत्वों की उपयोगिता बढ़ जाती है. इसका छिड़काव सीधे फसलों की पत्तियों पर किया जाता है. खास बात यह है कि 500 एमएल नैनो यूरिया की एक बोतल लगभग 45 किलो की एक बोरी सामान्य यूरिया के बराबर प्रभाव दे सकती है.

रासायनिक खादों के विकल्प के रूप में बायो-फर्टिलाइजर्स यानी जैव उर्वरकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. ये सस्ते होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित माने जाते हैं. एज़ोटोबैक्टर और राइजोबियम जैसे जैव उर्वरक हवा में मौजूद नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी रूप में मिट्टी में उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं. इससे फसलों को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है. जैव उर्वरकों के नियमित उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति, जैविक गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार होता है, जिससे किसानों को बेहतर और टिकाऊ उत्पादन प्राप्त करने में मदद मिलती है.

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डीएपी में मिलने वाले फॉस्फोरस के विकल्प के रूप में पीएसबी (फॉस्फोरस घोलक बैक्टीरिया) एक प्रभावी जैव उर्वरक माना जाता है. यह मिट्टी में मौजूद अघुलनशील और स्थिर फॉस्फोरस को घोलकर पौधों के लिए उपलब्ध रूप में परिवर्तित करता है. इससे फसलों की जड़ें आवश्यक पोषक तत्वों को आसानी से अवशोषित कर पाती हैं. पीएसबी के उपयोग से फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है, पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन में सुधार देखने को मिलता है. साथ ही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जिससे खेती की लागत घटती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक बनी रहती है.

किसान रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद और अन्य जैव उर्वरकों का उपयोग कर सकते हैं. वर्मी कम्पोस्ट और गोबर खाद खेत पर ही तैयार की जा सकती हैं, जबकि नैनो उर्वरक और जैव उर्वरक बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं. इन विकल्पों को अपनाने से किसानों को खाद वितरण केंद्रों और गोदामों पर लगने वाली लंबी कतारों से राहत मिल सकती है. साथ ही रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति में सुधार होता है. इससे फसल उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने में भी मदद मिलती है.

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