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Fodder Crisis In Hadoti: हाड़ौती में चारे का भारी संकट, 50% बढ़े दाम से पशुपालकों का बजट बिगड़ा, अब महंगा हो सकता है दूध

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Fodder Crisis:चारे के दाम ने बढ़ाई पशुपालकों की चिंता, अब महंगा हो सकता है दूध

Last Updated:June 20, 2026, 07:09 IST

Hadoti Fodder Crisis: हाड़ौती अंचल के कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ में चारे की कीमतें 50 फीसदी तक बढ़ने से पशुपालक संकट में हैं. भूसे के दाम 1400 रुपये क्विंटल तक पहुंच गए हैं. स्थानीय स्तर पर चारे की कमी के चलते पंजाब-हरियाणा से सप्लाई हो रही है जिससे ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ गया है. व्यापारी रामदयाल पारेता के अनुसार फैक्ट्रियों में चारे का इस्तेमाल ईंधन के रूप में होने से बाजार में किल्लत बढ़ी है. लागत बढ़ने से दूध महंगा होने के पूरे आसार हैं और आर्थिक नुकसान के चलते छोटे पशुपालक पशु बेचने को मजबूर हैं.

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कोटा. हाड़ौती अंचल में इस बार चारे का संकट लगातार गहराता जा रहा है. चारे का उत्पादन बेहद कम होने और बाजार में इसकी बढ़ती डिमांड के चलते चारे की कीमतों में लगातार रिकॉर्ड इजाफा हो रहा है. इसका सीधा और बड़ा असर पशुपालक फैमिली के मासिक बजट पर पड़ रहा है. कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिलों के हजारों पशुपालक अब अपने दुधारू पशुओं के लिए पर्याप्त चारा जुटाने को लेकर भारी फिक्र में डूबे हुए हैं. पशुपालकों को समझ नहीं आ रहा है कि वे इतनी महंगी दरों पर चारे की व्यवस्था कैसे करें.

स्थानीय चारा व्यापारियों के अनुसार पहले जो सूखा भूसा 700 से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक आसानी से उपलब्ध हो जाता था, उसका भाव अब बढ़कर 1050 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है. इसके अलावा प्रीमियम क्वालिटी का भूसा तो 1250 से 1400 रुपये प्रति क्विंटल तक ऊंचे दामों पर बिक रहा है. वहीं दूसरी ओर चूरी (गेहूं व सरसों) 2200 से 2800 रुपये प्रति क्विंटल और हरी ज्वार व मक्का का हरा चारा 350 से 500 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बाजार में बिक रहा है. कुल मिलाकर देखा जाए तो चारे की इन कीमतों में 35 से 50 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

पंजाब और हरियाणा से चारा मंगवाने को मजबूर हुए डेयरी संचालकहाड़ौती के स्थानीय पशुपालकों का कहना है कि पहले स्थानीय मंडियों और आसपास के गांवों से ही पशुओं के लिए पर्याप्त चारा बहुत ही आसानी से उपलब्ध हो जाता था, लेकिन अब जमीनी हालात काफी बदल गए हैं. स्थानीय स्तर पर चारे की उपलब्धता बेहद कम होने के कारण डेयरी संचालकों और बड़े पशुपालकों को अब पंजाब और हरियाणा जैसे बाहरी राज्यों से भूसा व अन्य चारा मंगवाना पड़ रहा है. बाहरी राज्यों से माल आने के कारण भारी ट्रांसपोर्ट कॉस्ट जुड़ रही है जिससे चारे की कुल लागत में 30 से 40 फीसदी तक का और अधिक इजाफा हो गया है जिससे पशुपालन का दैनिक खर्च लगातार बढ़ता ही जा रहा है.

फैक्ट्रियों में फ्यूल के रूप में चारे का इस्तेमाल होने से बढ़ी किल्लतचारा व्यापारियों का कहना है कि पहले भूसे और चारे का इस्तेमाल मुख्य रूप से केवल पशुओं के पेट भरने के लिए होता था, लेकिन अब कई बड़ी फैक्ट्रियों में इसे फ्यूल यानी ईंधन के तौर पर धड़ल्ले से यूज किया जा रहा है. कुछ बड़ी इंडस्ट्री में इससे गैस और अन्य कमर्शियल प्रोडक्ट भी तैयार किए जा रहे हैं. इसके चलते खुले मार्केट में चारे की रेगुलर सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है और कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. झालरापाटन, सुल्तानपुर, इटावा, खतौली और ईकलेरा सहित हाड़ौती के कई प्रमुख ग्रामीण इलाकों से बड़ी मात्रा में चारा ट्रकों के जरिए बाहर भेजा जा रहा है जिससे स्थानीय बाजार पर दबाव बढ़ रहा है. व्यापारी रामदयाल पारेता का कहना है कि यदि फैक्ट्रियों में चारे और भूसे को जलाने पर सरकार द्वारा तुरंत रोक नहीं लगी तो हालात आने वाले समय में और भी संगीन हो सकते हैं.

लागत बढ़ने से दूध प्रोडक्शन महंगा, पशु बेचने को मजबूर किसानचारे की लगातार बढ़ती कीमतों का बहुत बड़ा असर अब सीधे डेयरी सेक्टर पर साफ दिखाई देने लगा है. चारे के अत्यधिक महंगे होने से दूध प्रोडक्शन की कॉस्ट लगातार बढ़ रही है, जबकि दूध के मार्केट रेट उस अनुपात में बिल्कुल नहीं बढ़ पा रहे हैं. ऐसे में पशुपालकों का शुद्ध मुनाफा लगातार घटता जा रहा है और कई परिवार गंभीर आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं. छोटे पशुपालक इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जिसके कारण कुछ लोग अपने पशुओं की संख्या कम करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, जबकि कई गरीब पशुपालक तो अपने दुधारू पशुओं को सस्ते दामों में बेचने पर मजबूर हो रहे हैं.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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