Rajasthan

इस गांव में बेटियां भी चढ़ती हैं घोड़ी, 365 दीपकों से होती है दामाद की आरती, 150 साल से कायम है परंपरा

Last Updated:June 20, 2026, 06:45 IST

Jhunjhunu Kalipahari Village: झुंझुनूं का कालीपहाड़ी गांव अपनी ऐतिहासिक धरोहर और अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है. कालू खान पठान और संग्राम सिंह शेखावत के इतिहास से जुड़े इस गांव में पिछले 150 वर्षों से बेटियों की घोड़ी पर बिंदौरी निकालने की अद्भुत रस्म निभाई जाती है जो महिला सम्मान का बड़ा संदेश देती है. सूबेदार शायर सिंह और कुलदीप सिंह के अनुसार यहाँ विवाह में दामाद का स्वागत 365 दीपकों की आरती से होता है और दो तोरण लगाने की अनूठी परंपरा है. यह गांव अपनी सांस्कृतिक विरासत को आज भी पूरी तरह सहेजे हुए है.

झुंझुनूं जिले में स्थित कालीपहाड़ी गांव अपनी ऐतिहासिक पहचान और अनूठी परंपराओं के कारण पूरे राजस्थान में अपनी एक विशेष पहचान रखता है क्योंकि इस गांव का इतिहास कई रोचक कथाओं से जुड़ा हुआ है और यहां की सामाजिक परंपराएं व रीति-रिवाज आज भी लोगों द्वारा पूरी श्रद्धा तथा उत्साह के साथ निभाए जाते हैं जिससे गांव की सांस्कृतिक विरासत जीवंत बनी हुई है.

गांव के नाम कालीपहाड़ी को लेकर दो प्रमुख मान्यताएं प्रचलित हैं जिनमें से पहली मान्यता के अनुसार गांव के निकट स्थित पहाड़ी का रंग काला है जिसके कारण लोगों ने इस स्थान को कालीपहाड़ी कहना शुरू कर दिया था और समय के साथ यही नाम पूरे गांव की पहचान बन गया क्योंकि आज भी यह पहाड़ी गांव के इतिहास और भौगोलिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है.

दूसरी मान्यता गांव के ऐतिहासिक विकास से जुड़ी हुई है जिसके अनुसार बताया जाता है कि विक्रम संवत की 15वीं शताब्दी में जब यह क्षेत्र नरहड़ नवाब के नियंत्रण में था तब कालू खान नामक एक पठान ने यहां पेयजल की गंभीर समस्या को दूर करने के लिए एक कुआं बनवाया था और ग्रामीणों का मानना है कि कालू खान के नाम और उनके योगदान की स्मृति में ही इस गांव का नाम कालीपहाड़ी पड़ा.

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गांव के सूबेदार शायर सिंह के अनुसार लगभग दो सौ वर्ष पूर्व टाई क्षेत्र से शेखाजी के वंशज संग्राम सिंह शेखावत यहां आकर बसे थे और उनके आगमन के बाद गांव का विकास तेजी से हुआ तथा धीरे-धीरे उनका परिवार बढ़ता गया जिसके कारण वर्तमान में संग्राम सिंह शेखावत के वंशजों के करीब 600 घर गांव में मौजूद हैं जो यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं.

कालीपहाड़ी गांव की सबसे विशेष और अनूठी परंपराओं में बेटियों की घोड़ी पर बिंदौरी निकालने की रस्म शामिल है और कुलदीप सिंह कालीपहाड़ी के अनुसार यह परंपरा करीब 150 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है जहां कई स्थानों पर केवल दूल्हे की बिंदौरी निकाली जाती है वहीं इस गांव में बेटियों को भी समान सम्मान देते हुए उनकी घोड़ी पर बिंदौरी निकाली जाती है जो महिला सम्मान का प्रतीक मानी जाती है.

विवाह समारोहों में यहां कई अनोखी रस्में देखने को मिलती हैं क्योंकि दामाद के स्वागत के दौरान महिलाएं और परिजन 365 दीपकों से सजे विशेष थालों के माध्यम से उनकी आरती उतारते हैं तथा इसके अलावा विवाह स्थल पर दो तोरण लगाने की परंपरा भी है जिसमें से एक तोरण स्वागत द्वार पर लगाया जाता है जबकि दूसरा घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्थापित किया जाता है जिससे शुभता और सम्मान का संदेश दिया जाता है.

करीब छह हजार की आबादी वाले कालीपहाड़ी गांव को फौजियों का गांव भी कहा जाता है क्योंकि यहां के अधिकांश परिवारों का सेना से गहरा जुड़ाव रहा है जिसके तहत गांव के लगभग 500 लोग सेना में सेवा दे चुके हैं या वर्तमान में जुड़े हुए हैं और इनमें कई सैनिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि करीब 150 जवान आज भी देश की सीमाओं पर तैनात होकर राष्ट्र सेवा का दायित्व निभा रहे हैं जिसके कारण ही इस गांव को सैन्य परंपरा और देशभक्ति का मजबूत केंद्र माना जाता है.

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