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नासा भी देखती रह गई, एक उड़ान से इसरो ने रचा था इतिहास, ‘मिशन 20’ से अंतरिक्ष में लहराया भारत का परचम

Last Updated:June 22, 2026, 01:01 IST

पीएसएलवी-सी34 मिशन की अपार सफलता ने वैश्विक व्यावसायिक अंतरिक्ष बाजार (कमर्शियल स्पेस मार्केट) में भारत और इसरो की साख को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था. इस मिशन में शामिल 19 सह-यात्री सैटेलाइटों में से 17 अन्य सैटेलाइट दुनिया के विकसित देशों कनाडा, जर्मनी, इंडोनेशिया और शक्तिशाली अमेरिका की थीं.नासा भी देखती रह गई, एक उड़ान से इसरो ने रचा था इतिहासZoomPSLV-C34 मिशन की ऐतिहासिक कामयाबी ने इसरो को बुलंदियों पर पहुंचा दिया. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली. भारत के अंतरिक्ष इतिहास में 22 जून की तारीख स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. यह वह दिन है, जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपनी तकनीकी क्षमता, विश्वसनीयता और बढ़ती वैश्विक साख का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने दुनिया को भारत की अंतरिक्ष शक्ति का नया परिचय दिया. साल 2016 में इसी दिन इसरो ने अपने रॉकेट पीएसएलवी-सी34 के जरिए एक साथ 20 सैटेलाइटों की सफल लॉन्चिंग कर नया इतिहास रचा था.

यह उपलब्धि सिर्फ एक सफल लॉन्चिंग भर नहीं थी बल्कि अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत और वैश्विक स्तर पर उसकी स्वीकार्यता का प्रतीक थी. उस समय एक ही मिशन में 20 सैटेलाइट की लॉन्चिंग भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी गई थी.

आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 9 बजकर 26 मिनट पर पीएसएलवी-सी34 ने उड़ान भरी. मिशन की मुख्य सैटेलाइट 727.5 किलोग्राम वजनी कार्टोसैट-2 कैटेगरी की सैटेलाइट थी. इसके साथ 19 सह-यात्री सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में भेजी गईं.

उड़ान के दौरान रॉकेट के सभी चरण तय योजना के अनुसार सफलतापूर्वक पूरे हुए. लगभग 16 मिनट 30 सेकेंड बाद कार्टोसैट-2 को उसकी निर्धारित कक्षा में स्थापित कर दिया गया और अगले कुछ मिनटों में बाकी सभी 19 सैटेलाइट भी सफलतापूर्वक अलग हो गए. इस तरह मिशन पूरी तरह सफल रहा.

इस मिशन की सबसे महत्वपूर्ण पेलोड कार्टोसैट-2 कैटेगरी की सैटेलाइट थी. यह अत्याधुनिक कैमरों से लैस थी, जो पृथ्वी की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें लेने में सक्षम है. इसके जरिए शहरी और ग्रामीण उपयोग, सड़क नेटवर्क की निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों का अध्ययन, भूमि उपयोग मानचित्र तैयार करने और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) जैसे कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है. आसान शब्दों में कहें तो यह सैटेलाइट विकास योजनाओं से लेकर संसाधनों के बेहतर प्रबंधन तक में अहम भूमिका निभाने वाली साबित हुई.

मिशन की एक खास बात यह भी थी कि इसमें भारत के छात्रों की ओर से बनाए गए सैटेलाइट को भी अंतरिक्ष में भेजा गया. ‘सत्यभामासैट’ और ‘स्वयं’ नाम की इन सैटेलाइट को बनाने में चेन्नई के सत्यभामा विश्वविद्यालय और पुणे के इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने योगदान दिया था. इन सैटेलाइट की लॉन्चिंग इसका भी संदेश था कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम सिर्फ वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा प्रतिभाओं को भी बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का अवसर दे रहा है.

इस मिशन में पीएसएलवी-सी34 के साथ भेजी गईं 17 अन्य सैटेलाइट कनाडा, जर्मनी, इंडोनेशिया और अमेरिका की थीं. इनमें सबसे अधिक 13 सैटेलाइट अमेरिका की थीं, जबकि कनाडा की दो, जर्मनी और इंडोनेशिया की एक-एक सैटेलाइट को भेजा गया था. इस मिशन की सफलता से साफ है कि भारत ने अंतरिक्ष में अपनी उड़ान को नई ऊंचाई दी और दुनिया को बता दिया कि उसका आसमान अब पहले से कहीं ज्यादा विशाल है.

About the AuthorRakesh Ranjan Kumar

राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें

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