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Tashkhana Bawdi I जाने ताशखाना बावड़ी का सच I jalore news

Last Updated:June 23, 2026, 18:38 IST

Tashkhana Bawdi: जालोर शहर के बीच स्थित ताशखाना बावड़ी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है. माना जाता है कि यह केवल एक साधारण बावड़ी नहीं, बल्कि जालोर किले तक जाने वाली एक गुप्त भूमिगत सुरंग का हिस्सा भी हो सकती है. इतिहासकारों के अनुसार, युद्ध के समय यहां से किले तक रसद और आवश्यक सामग्री पहुंचाई जाती थी. अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण से जुड़े किस्सों में भी इस बावड़ी का उल्लेख मिलता है. आज यह स्थल जालोर की ऐतिहासिक धरोहर और रहस्यमयी अतीत का प्रतीक बन चुका है, जिसे देखकर उस दौर की रणनीतिक सोच और इंजीनियरिंग का अंदाजा लगाया जा सकता है.

जालोर. शहर के बीचों-बीच स्थित ताशखाना बावड़ी आज भी इतिहास के कई अनसुने राज अपने भीतर समेटे हुए है. यह सिर्फ एक साधारण बावड़ी नहीं, बल्कि जालोर की प्राचीन सुरक्षा व्यवस्था और रणनीतिक इतिहास का अहम हिस्सा मानी जाती है. इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस बावड़ी को पहले अपभ्रंश बावड़ी कहा जाता था. समय के साथ इसका नाम बदलकर ताशखाना बावड़ी पड़ा, कहा जाता है कि इस नाम के पीछे भी एक गहरा अर्थ छिपा है. ताश यानी खजाना और खाना/खान यानी रास्ता या स्थान. इस तरह इसे खजाने तक पहुंचने वाला गुप्त मार्ग भी माना जाता है.

इस बावड़ी की सबसे चर्चित बात यह है कि इसे जालोर किले तक जाने वाले एक गुप्त भूमिगत रास्ते से जोड़ा जाता है. माना जाता है कि यह सुरंग उस समय की एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक संरचना थी, जिसका उपयोग युद्ध और संकट के समय किले तक पहुंचने और आवश्यक सामग्री पहुंचाने के लिए किया जाता था.

क्या यह सिर्फ एक बावड़ी है या जालोर किले तक जाने वाला गुप्त रास्ताइतिहास के पन्नों में सबसे ज्यादा चर्चा अलाउद्दीन खिलजी के जालोर आक्रमण के दौरान इस बावड़ी की भूमिका को लेकर मिलती है. जब खिलजी की सेना ने जालोर पर आक्रमण किया और चारों ओर से रास्ते बंद कर दिए, तब किले के भीतर मौजूद लोगों के लिए स्थिति बेहद कठिन हो गई थी. ऐसी परिस्थिति में इसी कथित भूमिगत सुरंग के माध्यम से किले तक रसद, खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुएं पहुंचाई जाती थी. इससे किले के अंदर मौजूद सैनिक लंबे समय तक घेराबंदी के बावजूद टिके रह सके. यही कारण है कि इस बावड़ी को केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि युद्धकालीन जीवनरेखा भी माना जाता है.

इतिहासकार बंसीलाल सोनी ने लोकल 18 को जानकारी दी कि ताशखाना बावड़ी जालोर की सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा रही होगी और इसी गुप्त सुरंग से किले तक रसद और खजाना पहुंचाया जाता था. आज के समय में ताशखाना बावड़ी जालोर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है. यह स्थान पर्यटकों, इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहां आने वाले लोग इसकी संरचना को देखकर उस समय की इंजीनियरिंग और सोच को समझने की कोशिश करते हैं. ताशखाना बावड़ी आज भी जालोर के इतिहास की एक जीवित गवाही है. मौन, रहस्यमयी और गौरवशाली अतीत को अपने भीतर समेटे हुए. यह हमें उस दौर की याद दिलाती है जब हर निर्माण केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा, रणनीति और जीवन रक्षा के लिए किया जाता था.

About the AuthorMonali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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