झालावाड़ की वो ऐतिहासिक धरोहर, जहां आज भी दीवारें सुनाती हैं खींची राजाओं की गौरवगाथा

Last Updated:June 25, 2026, 06:34 IST
Moti Mahal Mahu Jhalawar: झालावाड़ में भीमसागर के पूर्वी तट पर स्थित महू नगर और वहाँ का मोती महल खींची राजवंश के वैभव का प्रतीक हैं. महू की स्थापना गागरोन के शासक अचलदास जी खींची के पुत्र धीरजदेव जी ने सन् 1478 ईस्वी में की थी और इसे अपनी राजधानी बनाया, जिसके अधीन 1400 गांव थे. 175 फीट लंबे और 60 फीट ऊंचे तीन खंडों के इस महल में राजपूत और मुगल स्थापत्य कला का सुंदर संगम है. यहां विक्रम संवत 1768 का नागरी लिपि का शिलालेख, दरीखाना, कचहरी और राता देवी की प्रतिमा स्थित है.
हाड़ौती की सरज़मीं पर बिखरी ऐतिहासिक विरासतों में एक अहम मुक़ाम रखने वाला महू का मोती महल भीमसागर के पूर्वी तट पर पहाड़ी की गोद में खड़ा होकर आज भी अपने अतीत की शानो-शौकत और सल्तनती वैभव की ख़ामोश गवाही देता है, जिसकी स्थापना इतिहास के पन्नों के अनुसार गागरोन के प्रतापी खींची शासक अचलदास जी खींची के सुपुत्र धीरजदेव जी खींची द्वारा सन् 1478 ईस्वी के आसपास की गई थी. धीरजदेव ने इस नवस्थापित नगर को अपनी राजधानी का दर्जा प्रदान किया जिसके बाद यह क्षेत्र शीघ्र ही राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया और उस दौर में महू राज्य के अधीन लगभग चौदह सौ गाँवों का होना इसकी समृद्धि और प्रभाव को साफ़ दर्शाता है.
महू की पहचान अपने भव्य मोती महल से जुड़ी हुई है, जो तीन खण्डों में निर्मित होने के साथ-साथ अपने समय की स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नमूना माना जाता है. लगभग एक सौ पचहत्तर फ़ीट लंबा और साठ फ़ीट ऊँचा यह महल दूर से ही अपनी अज़मत और बुलंदी का एहसास कराता है, जिसके विशाल प्रवेश द्वार, ऊँची प्राचीरें और सुदृढ़ निर्माण उस युग के शिल्पकारों की अद्भुत कलात्मक दृष्टि का साफ प्रमाण हैं.
महल के एक द्वार पर नागरी लिपि में उत्कीर्ण शिलालेख प्राप्त होता है जिसमें विक्रम संवत 1768 का उल्लेख मिलता है, और विद्वानों का मत है कि यह लेख संभवतः महल के किसी पुनर्निर्माण, विस्तार अथवा जीर्णोद्धार से संबंधित हो सकता है क्योंकि महू की स्थापना इससे कहीं पहले मानी जाती है, यही कारण है कि यह शिलालेख इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष रुचि का विषय बना हुआ है. हालांकि समय के थपेड़ों ने भले ही इस राजप्रासाद को आंशिक रूप से खंडहर में तब्दील कर दिया हो, किंतु इसके भग्नावशेष आज भी उस दौर की रौनक और रियासती वैभव का एहसास कराते हैं, जहां परिसर में विशाल प्रवेश द्वार, देवालय, दरीखाना, कचहरी तथा राजमहल के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं और महल के भीतर प्रतिष्ठित राता देवी की प्रतिमा स्थानीय आस्था और धार्मिक परंपराओं की एक अनूठी प्रतीक है.
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महल के पृष्ठ भाग में स्थित कक्षों पर निर्मित पालकीनुमा छतें, अलंकृत स्तम्भ और नफ़ीस झरोखे तत्कालीन स्थापत्य कौशल की उत्कृष्ट मिसाल प्रस्तुत करते हैं, जिनकी वास्तुकला में राजपूत और मुगल शैली का अनुपम संगम दिखाई देता है जहाँ एक ओर राजपूती भव्यता है तो दूसरी ओर मुगल स्थापत्य की नज़ाकत और सलीक़ा भी दृष्टिगोचर होता है. आज भी मोती महल केवल पत्थरों और दीवारों का अवशेष मात्र नहीं है बल्कि यह हाड़ौती की सांस्कृतिक विरासत, खींची राजवंश की गौरवगाथा और राजस्थान के स्वर्णिम इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ है, जिसकी ख़ामोश दीवारें मानो बीते युग की उन दास्तानों को अपने भीतर संजोए बैठी हैं जिनमें वीरता, वैभव और सभ्यता की अमिट छाप अंकित है.
महू का मोती महल हमें यह खूबसूरत पैग़ाम देता है कि इतिहास केवल ग्रंथों और अभिलेखों में ही जीवित नहीं रहता, बल्कि वह उन ऐतिहासिक इमारतों की साँसों में भी हमेशा बसता है जो सदियों का समय बीत जाने के बाद भी अपने गौरवमयी अतीत की अनकही कहानी आज भी बड़ी ख़ामोशी से सुनाती रहती हैं.
हाड़ौती की धरती पर अपने गौरवशाली इतिहास और समृद्ध विरासत के लिए प्रसिद्ध महू नगर की पहचान यहाँ स्थित भव्य मोती महल से जुड़ी हुई है, जिसकी स्थापना गागरोन के प्रतापी खींची शासक अचलदास जी खींची के पुत्र धीरजदेव जी ने सन् 1478 ईस्वी में की थी. धीरजदेव ने इसे अपनी राजधानी बनाया जिसके अधीन उस समय लगभग 1400 गाँव आते थे, और इसी परिसर में तीन खंडों में निर्मित मोती महल स्थित है जिसकी लम्बाई 175 फीट तथा ऊंचाई 60 फीट है, जिसके एक द्वार पर नागरी लिपि में विक्रम सम्वत 1768 का एक ऐतिहासिक लेख उत्कीर्ण है जो आज भी खींची राजवंश की शान और रियासती वैभव की कहानी सुनाता है.
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