हार मानने चले थे, मिट्टी ने बदल दी किस्मत! 72 की उम्र में लिखी ‘गार्डन ऑफ होप’, अब युवाओं में जगा रहे नई उम्मीद

पाली. अगर आप जीवन में हारे हैं तो यह जीवन का अंत नहीं, बल्कि उसकी नई शुरुआत है. बस जरूरत है अपने गलत फैसलों से सीख लेकर आगे बढ़ने की. ये शब्द हैं 72 वर्षीय रविंद्र काबरा के, जो आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. एक समय था, करीब 25 साल पहले, जब वे डिप्रेशन के उस गहरे अंधेरे में थे, जहां से अमूमन लोग लौट नहीं पाते. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने मिट्टी से ‘जिंदगी का सीक्रेट’ ढूंढ निकाला, प्रकृति को अपना हमसफर बनाया और आज वे दुनिया के मशहूर उम्मेद भवन पैलेस की खूबसूरती को अपनी कला से महका रहे हैं.
72 साल की उम्र में भी रोजाना 10 घंटे लगातार काम करने वाले इस ‘शेर’ ने अब युवाओं को डिप्रेशन से बाहर निकालने के लिए ‘गार्डन ऑफ होप’ नामक किताब लिखी है. यह किताब केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि संघर्ष, उम्मीद और आत्मविश्वास की कहानी है. रविंद्र काबरा का मानना है कि प्रकृति के करीब रहकर, सकारात्मक सोच अपनाकर और खुद पर भरोसा रखकर जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों को भी हराया जा सकता है. आइए जानते हैं उनकी जिंदगी को मुस्कुराकर जीने का वह ‘ग्रीन फॉर्मूला’, जिसने अंधेरे को रोशनी में बदल दिया.
25 साल पहले अंधेरों से भर गई थी जिंदगी
रविंद्र काबरा ने बताया कि आज से 25 साल पहले उन्होंने जिंदगी का एक ऐसा दौर देखा था, जब उन्हें केवल एक ही बात नजर आती थी कि अब जिंदगी का अंत कर देना चाहिए. उन्हें लगता था कि अब जीवन जीना संभव नहीं है. लेकिन इसके बाद प्रकृति उनकी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गई और वे उसके अंदर पूरी तरह डूबते चले गए. प्रकृति ने ही उन्हें जीवन की नई राह दिखाने का काम किया. उन्होंने बताया कि आज उनकी जिंदगी का उद्देश्य यही है कि जिस तरह वे डिप्रेशन से निकलकर एक मुस्कुराती हुई जिंदगी जी रहे हैं, उसी तरह अपने अनुभव लोगों के साथ साझा करें और उन्हें बताएं कि कठिन परिस्थितियों और अवसाद से बाहर कैसे निकला जा सकता है. उनका मानना है कि सकारात्मक सोच, प्रकृति से जुड़ाव और आत्मविश्वास के बल पर जीवन को नई दिशा दी जा सकती है.
जीवन में कामयाबी के ये हैं बड़े मूल मंत्र
सबसे पहला सवाल यह है कि जिंदगी में आपने जो बुरे वक्त देखे हैं, उनसे सीख लेकर आगे बढ़ें और वही गलतियां दोबारा न करें. रास्ते स्वयं दिखाई देने लगेंगे और आप एक नए मार्ग पर आगे बढ़ते चले जाएंगे. उम्र कुछ भी हो, चाहे आप 25 साल के हों, 50 साल के हों या फिर 60 वर्ष के, उम्र को अपने जीवन में कभी सवाल मत बनने दीजिए. आज अगर मैं 72 साल की उम्र में 10 घंटे काम करके अपने 60 हजार बच्चों को संभाल सकता हूं, तो कोई भी इंसान यह कर सकता है. इसलिए हमारी सोच सकारात्मक होनी चाहिए. हमें सकारात्मक मार्ग पर चलना चाहिए, सकारात्मक लोगों के बीच रहना चाहिए और प्रकृति से जुड़े रहना चाहिए.
प्रकृति एक ऐसा माध्यम है, जो सकारात्मक विचार देने का काम करती है. प्रकृति की सेवा यानी ईश्वर की सेवा, और जब आप ईश्वर की सेवा करते हैं तो उनका आशीर्वाद आपको डिप्रेशन से बाहर निकलने में तथा जीवन के संघर्षमय समय से उबरने में मदद करता है. असफलता को जिंदगी का अंत न मानें, बल्कि उससे सीख लेकर आगे बढ़ें. ऐसा करने पर जिंदगी गोकुल के बागवान की तरह मुस्कुराने लगेगी.
भांजी के मोटिवेशन से लिखी किताब
रविंद्र काबरा ने बताया कि किताब लिखने का उन्होंने कभी नहीं सोचा था, लेकिन उनकी भांजी उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनी. वह बोली कि, “मामाजी, आपकी जिंदगी बहुत बड़ा इम्प्रेशन है और आपको अपने विचारों तथा संघर्ष की कहानी किताब में लिखनी चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी उसे पढ़ सके.” उन्होंने बताया कि आज की युवा पीढ़ी डिप्रेशन की समस्या से ज्यादा जूझ रही है. ऐसे में यदि वे इस किताब को पढ़ेंगे तो उन्हें यह समझने में मदद मिलेगी कि किस तरह डिप्रेशन से बाहर निकलकर सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है.
हार जीवन का अंत नहीं बल्कि शुरुआत है
रविंद्र काबरा बताते हैं कि उनकी किताब का शीर्षक ही “गार्डन ऑफ होप” है. उनका संदेश है कि “Failure is not the end of life.” यदि आप जीवन में हार गए हैं तो यह जीवन का अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत है. संघर्ष के दौरान जो गलत निर्णय हो गए, उनसे सीख लेकर यदि आप आगे बढ़ते हैं तो जिंदगी आपके स्वागत के लिए नए द्वार खोलती है और नए रास्ते दिखाती है. उनका मानना है कि असफलता इंसान को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे और मजबूत बनाने के लिए आती है.
गोकुल वैली बनी डिप्रेशन से बाहर निकलने का द्वार
रविंद्र काबरा अपने जीवन में सफलता हासिल करने के बाद लोगों के लिए प्रेरणा बने हैं. साथ ही उन्होंने अपने 60 हजार पौधों, जिन्हें वे अपने बच्चों की तरह सहेजते हैं, के बीच पाली के जवाई क्षेत्र में गोकुल वैली विकसित की है. उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति वहां कुछ समय बैठ जाए तो उसे ऐसा महसूस होगा मानो उसने डिप्रेशन और तनाव को गोकुल वैली के प्रवेश द्वार पर ही छोड़ दिया हो. प्राकृतिक वातावरण, हरियाली और शांति से भरपूर यह स्थान लोगों को मानसिक सुकून देने का काम करता है.



