बाजार में इस समय क्यों बिकते हैं 10 महीने पुराने सेब, कितने सेहतमंद, कैसे रखे जाते हैं सालभर

हां, ये बिल्कुल सच है. मई- जून के महीनों में हम बाजार से जो सेब खरीदते वो करीब 8 से 10 महीने पुराने होते हैं, कभी-कभी तो सालभर भी. आमतौर पर हिमाचल और कश्मीर में पैदा होने वाले सेब की पैदावार अगस्त से अक्टूबर तक होती है. यही फिर सालभर बाजारों में उपलब्ध रहता है. हां, विदेश से आने वाले सेब भी आते हैं, जो 2-3 महीने पुराने होकर यहां मिलते हैं. क्या ये सेब सेहत के लिए ठीक होते हैं, इनमें पोषक तत्व बने रहते हैं.
भारत में सेब आमतौर पर हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में होता है. कुछ सेब नीलगिरी इलाके में भी होते हैं लेकिन उनकी मात्रा कम होती है. भारत में 12 महीने ‘ताजे’ सेब मिलना नामुमकिन है. इसके पीछे की वजह भारत की भौगोलिक स्थिति और मौसम चक्र है. उत्तर भारत में सेब की फसल साल में केवल एक बार अगस्त से अक्टूबर के बीच ही आती है.
दक्षिण भारत के नीलगिरि की पहाड़ियों में बहुत छोटे स्तर पर अप्रैल से जुलाई के बीच थोड़े से सेब होते हैं, लेकिन उनकी मात्रा इतनी कम होती है कि वे देश के मुख्य बाजारों तक पहुंच ही नहीं पाते.
मतलब ये भी है कि अगस्त, सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के महीने में आप जो सेब खा रहे होते हैं, वो ही पूरी तरह फ्रेश होता है. नवंबर के बाद से लेकर अगले साल के जुलाई तक बाज़ार में दिखने वाले लाल, चमकदार और कड़े सेब असल में महीनों पुराने होते हैं.
हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में सेब की तैयार फसल, ये सेब अगस्त तक पक कर पूरी तरह तैयार हो जाता है, (AI Photo)
विशेष कोल्ड स्टोरेज में कैसे रखते हैं
अक्टूबर के बाद अगले साल के जुलाई-अगस्त तक सेब की सप्लाई बनाए रखने के लिए इन्हें विशेष कोल्ड स्टोरेज में कंट्रोल्ड वातावरण में रखा जाता है. इन स्टोर्स में केवल तापमान ही कम नहीं किया जाता, बल्कि हवा में ऑक्सीजन का स्तर घटाकर नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ा दिया जाता है. इससे सेब की ‘सांस लेने’ की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है, जिससे उसका पकना और सड़ना रुक जाता है. सेब एक तरह से ‘कोमा’ या गहरी नींद की स्थिति में चला जाता है.
इसलिए करते हैं वैक्सिंग
स्टोरेज में रखने से पहले या बाहर निकालते समय सेबों पर अक्सर प्राकृतिक या खाद्य-ग्रेड मोम की एक पतली परत चढ़ाई जाती है. ये सेब की नमी को अंदर ही रोक कर रखती है ताकि वह सूखे या सिकुड़े नहीं. चमकदार बना रहे.
क्या ये सेहत के लिए ठीक होते हैं
इतने महीनों तक स्टोर करके रखने से सेब के विटामिन्स विशेषकर विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स में थोड़ी कमी जरूर आती है, लेकिन इसका फाइबर, कार्बोहाइड्रेट और बाकी मिनरल्स सुरक्षित रहते हैं. बस खाने से पहले सेब को गुनगुने पानी से अच्छी तरह धो लेना चाहिए ताकि ऊपर लगी वैक्स और धूल साफ हो जाए.
विशेष कोल्ड स्टोरेज में रखे गए सेब (AI Photo)
इन कोल्ड स्टोरेज में रखे सेब का डाइजेस्टिव फाइबर 100% सुरक्षित होता है, ये पेट साफ रखता है, कब्ज दूर करता है और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता है. इस पर समय का कोई असर नहीं होता.
मिनरल्स यानि पोटैशियम और आयरन भी 100% सुरक्षित रहते हैं, जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने और दिल की सेहत के लिए पोटैशियम वैसे का वैसा ही बना रहता है. कैलोरी और एनर्जी भी इसकी 100% सुरक्षित रहती है. साथ ही इसमें प्राकृतिक शुगर और कार्बोहाइड्रेट भी.
क्या विदेश से आने वाले सेब ताजे होते हैं
यदि आप वसंत या गर्मियों में बिल्कुल ताजा सेब खाना चाहते हैं, तो बाजार में मिलने वाले विदेशी सेब एक विकल्प होते हैं. मार्च से मई के दौरान न्यूजीलैंड, चिली, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सेब का ताजा सीजन होता है, जहां से ये भारत आते हैं. हालांकि ये स्थानीय कोल्ड-स्टोरेज वाले सेबों की तुलना में काफी महंगे होते हैं.
क्या विदेशी सेब भी पुराने नहीं होते
नहीं, ये सेब 2-3 महीने पुराने नहीं होते. समुद्र के रास्ते भारत पहुंचने और फिर आपके हाथ में आने तक विदेशी सेब आमतौर पर 1 से 1.5 महीने पुराने होते हैं. समझिए कि अगर कोई सेब न्यूजीलैंड से आ रहा है तो उसे एक से तीन दिन पेड़ से तोड़ते हैं. धोकर फूड-ग्रेड वैक्स लगाते हैं. फिर ‘रीफर कंटेनर्स’ यानि चलते-फिरते कोल्ड स्टोरेज वाले कंटेनर में पैक कर देते हैं.
गर्मियों के दौरान बाजार में विदेशी सेब आते हैं, जो लाल और ताजे लगते हैं, ये आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा जैसे देशों से आते हैं. (AI Photo)
इनकी समुद्री यात्रा में 20 से 30 दिन लगता है. इन जहाजों के कंटेनरों में भी तापमान और ऑक्सीजन को नियंत्रित रखा जाता है, जिससे सेब ‘सोया’ रहता है. भारत पहुंचने के बाद इनकी कस्टम क्लीयरेंस में 3-5 दिन लगते हैं. बंदरगाहों से इन्हें रीफर ट्रकों में भरकर 2-3 दिनों में दिल्ली, बेंगलुरु या अन्य बड़े शहरों की थोक मंडियों में पहुंचा दिया जाता है. जहां ये खुदरा मार्केट में जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में पेड़ से टूटने से बाजार में पहुंचने तक औसतन 35 से 45 दिन का समय लगता है.
क्या बाजार पहुंचने वाले सभी फल पुराने होते हैं
नहीं, ऐसा नहीं होता. असलियत ये है कि ज्यादातर फलों के मामले में ऐसा नहीं होता. सेब और कुछ चुनिंदा फलों को छोड़कर बाजार में मिलने वाले अधिकांश फल 3 से 10 दिन या अधिकतम दो हफ्ते से ज्यादा पुराने नहीं होते.
बाजार में मिलने वाले ज्यादातर फल ऐसे हैं जिन्हें कोल्ड स्टोरेज में महीनों तक रखना नामुमकिन है. अगर इन्हें पेड़ से तोड़ने के बाद कुछ दिन से ज्यादा रखा जाए, तो ये सड़ने लगते हैं, पानी छोड़ देते हैं या इनका स्वाद कड़वा हो जाता है. इसमें केला, पपीता, तरबूज, खरबूजा, अंगूर, जामुन, लीची और आम शामिल हैं, तो ये मानकर चलिए कि ये ज्यादा ज्यादा तीन दिनों से लेकर 10 दिन पहले पेड़ से टूटे होते हैं.
इन्हें जब पेड़ों या लताओं से तब तोड़ा जाता है जब ये थोड़े कच्चे होते हैं. तोड़ने के बाद इन्हें ट्रकों के जरिए तुरंत मंडियों में भेजा जाता है. रास्ते में 2-3 दिन और फिर मंडी से आपके घर तक पहुंचने में 2-3 दिन लगते हैं. जब आप इन्हें खाते हैं, तो ये कुछ पुराने हो चुके होते हैं. अगर इन्हें बहुत ज्यादा समय तक रोका जाए, तो ये पककर बिल्कुल गल जाएंगे.
सेब के अलावा कौन से फल महीनों पुराने हो सकते हैं
ऐसे केवल कुछ ही फल हैं, खासकर वो जिनका छिलका मोटा होता है या जिनकी आंतरिक बनावट ऐसी होती है कि वे कोल्ड स्टोरेज का दबाव झेल सकते हैं. इसमें नाशपाती, संतरा और किन्नू, अनार और कीवी होते हैं लेकिन ये कोल्ड स्टोरेज में भी 2-3 महीने रह सकते हैं. कीवी विशेष तापमान पर 4 से 6 महीने तक स्टोर किया जाता है.
कैसे चलता है सेब के पेड़ का साइकल
सेब के पेड़ का लाइफ साइकल प्रकृति के सबसे अनुशासित और सुंदर चक्रों में एक है. भारत में हिमाचल और कश्मीर में मौसम के हिसाब से इसका साइकल हमेशा एक जैसा ही चलता है.
1. जाड़ों में सोने का समय (दिसंबर से फरवरी)– सर्दियों के महीनों में सेब का पेड़ पूरी तरह पत्ती-विहीन हो जाता है, ये प्रक्रिया दिसंबर से फरवरी तक चलती है, इसे ‘डॉर्मेंसी’ या सुप्तावस्था कहते हैं. इस समय पेड़ को अपनी नींद पूरी करने के लिए भारी ठंड की जरूरत होती है, जिसे ‘चिलिंग ऑवर्स’ कहा जाता है. फरवरी के अंत में जैसे ही मौसम थोड़ा गर्म होने लगता है, पेड़ की कलियां सूजने लगती हैं और हरी पत्तियां बाहर आने लगती हैं.
सेब को नए फूल और पत्तियां बनाने के लिए सर्दियों की लंबी और कड़ाके की ठंड की जरूरत होती है. एक बार फल देने में पेड़ अपनी पूरी ऊर्जा निचोड़ देता है. उसे अगली फसल के लिए खुद को रीचार्ज करने और नई कलियां बनाने के लिए कम से कम 4-5 महीने के आराम की जरूरत होती है.
2. फूलों का खिलना (मार्च से अप्रैल)वसंत ऋतु की शुरुआत होते ही पेड़ पर बेहद खूबसूरत सफेद और हल्के गुलाबी रंग के फूल खिलते हैं. इस समय मधुमक्खियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. वे एक फूल से दूसरे फूल पर बैठकर परागण करती हैं. अगर इस दौरान मधुमक्खियां न हों, तो फूल झड़ जाएंगे और फल नहीं बनेंगे.
3. फल का बनना और ग्रो करना (मई से जुलाई)परागण सफल होने के बाद फूल की पंखुड़ियां गिर जाती हैं. फूल का निचला हिस्सा एक छोटे हरे दाने का रूप ले लेता है. शुरुआत में ये बहुत छोटे होते हैं. जून और जुलाई की धूप और पानी पाकर ये तेजी से बड़े होते हैं. इस दौरान इनका रंग हरे से धीरे-धीरे लाल या पीला होने लगता है.
4. फसल की तुड़ाई (अगस्त से अक्टूबर)फूल आने के ठीक 120 से 150 दिनों (करीब 4 से 5 महीने) बाद सेब पूरी तरह पककर तैयार हो जाता है. अगस्त से अक्टूबर के बीच किसान इन्हें पेड़ों से तोड़ते हैं, जिसके बाद पेड़ फिर से सर्दियों में अपनी गहरी नींद की ओर बढ़ जाता है.



