गैस के दौर में भी जिंदा है यह खास परंपरा! अलवर की महिलाएं ऐसे बचाती हैं सालभर का ईंधन

अलवर: आधुनिक दौर में जहां गैस और अन्य आधुनिक ईंधनों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, वहीं अलवर जिले के मेवात क्षेत्र के कई गांवों में आज भी महिलाएं गोबर के उपलों को घरेलू ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की वर्षों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. ग्रामीण जीवन में आज भी गोबर के उपले रसोई की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल हैं. यही वजह है कि मानसून शुरू होने से पहले महिलाएं पूरे साल के लिए उपले तैयार कर उन्हें सुरक्षित रखने की विशेष व्यवस्था करती हैं.
अलवर जिले का कुछ हिस्सा मेवात क्षेत्र में आता है, ऐसे यहां की महिलाएं आकर्षक ढंग से गोबर के उपलों को सुरक्षित रखने के लिए पारंपरिक देसी गोदाम बनाती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बीटोवड़ा’ कहा जाता है. इसकी खास बनावट के कारण तेज बारिश और नमी भी अंदर तक नहीं पहुंच पाती. यही कारण है कि बरसात के दौरान जब नए उपले बनाना संभव नहीं होता, तब महिलाएं इसी संग्रहित ईंधन का उपयोग कर पूरे परिवार का भोजन तैयार करती हैं.
सालभर ऐसे संभाल कर रखती हैं उपले
गांव की महिलाओं का कहना है कि गर्मी और सर्दी के मौसम में बड़ी संख्या में गोबर के उपले तैयार कर धूप में अच्छी तरह सुखाए जाते हैं. बरसात में नमी अधिक होने के कारण उपले ठीक से नहीं सूखते, इसलिए मानसून आने से पहले ही सालभर के लिए ईंधन का इंतजाम कर लिया जाता है. इसके बाद इन्हें बीटोवड़ा में सुरक्षित रख दिया जाता है, जिससे बारिश के दौरान भी उपले पूरी तरह सूखे रहते हैं. उन्होंने बताया कि बारिश के मौसम में ईंधन भीग जाता है जिसके कारण खाना बनाने में काफी परेशानी होती है इसलिए गांव में गोबर के उपले काम आते हैं.
आज भी पहली पसंद हैं गोबर के उपले
रामगढ़ क्षेत्र की महिलाओं मरियम बानो, रवनक बानो सहित अन्य महिलाओं ने बताया कि गांवों में आज भी अधिकांश घरों में खाना गोबर के उपलों की आग पर ही बनाया जाता है. पशुओं के लिए तैयार किया जाने वाला दलिया भी इसी आग पर पकाया जाता है. उनका कहना है कि उपलों की आग लंबे समय तक सुलगती रहती है, जबकि अन्य ईंधन जल्दी बुझ जाते हैं. इसी कारण ग्रामीण महिलाएं आज भी गोबर के उपलों को सबसे भरोसेमंद ईंधन मानती हैं. महिलाओं के अनुसार, सर्दी और बरसात के मौसम में ईंधन के भीगने और सीलन आने का खतरा बना रहता है. ऐसे में वर्षों से अपनाया जा रहा बीटोवड़ा बनाने का तरीका आज भी सबसे प्रभावी साबित हो रहा है. इसके अंदर का तापमान संतुलित रहता है और तेज बारिश के बावजूद नमी अंदर तक नहीं पहुंच पाती.
बड़े गोदामों से ज्यादा कारगर है बीटोवड़ा
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि पक्के और बड़े गोदामों में भी कई बार बारिश की नमी पहुंच जाती है, लेकिन गोबर के उपलों और गोबर के लेप से तैयार किए गए बीटोवड़ा में नमी प्रवेश नहीं कर पाती. यही वजह है कि आज भी अधिकांश परिवार अपने उपलों को सुरक्षित रखने के लिए इसी पारंपरिक तकनीक का उपयोग करते हैं.
ऐसे तैयार किया जाता है बीटोवड़ा
महिलाओं ने बताया कि बीटोवड़ा पूरी तरह हाथों से तैयार किया जाता है. सबसे पहले जमीन पर पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़े बिछाकर मजबूत और समतल आधार बनाया जाता है. इसके ऊपर गोबर के उपलों की मजबूत परत बिछाई जाती है, जिससे फर्श जमीन से करीब दो से ढाई फीट ऊंचा हो जाता है. इसके बाद पूरे आधार पर गोबर का लेप किया जाता है ताकि नीचे से नमी अंदर न पहुंचे. इसके बाद गोल आकार में उपलों की मोटी चारदीवारी बनाई जाती है.
जिसकी ऊंचाई लगभग पांच से दस फीट तक होती है. चारदीवारी तैयार होने के बाद उस पर दो से तीन इंच मोटी गोबर की परत चढ़ाई जाती है, जिससे दीवारें पूरी तरह मजबूत और जलरोधी बन जाती हैं. अंत में उपलों से ही छत तैयार कर उस पर कई परतों में गोबर का लेप किया जाता है. इसके ऊपर गांव में मिलने वाली जंगली घास ‘झुंडा’ के मजबूत पुलों (गठ्ठरों) से बनी देसी छान बिछाई जाती है. यह छान बारिश के पानी को सीधे अंदर जाने से रोकती है और बीटोवड़ा के भीतर रखे उपलों को पूरी तरह सुरक्षित बनाए रखती है.
महिलाएं मिल-जुलकर निभाती हैं परंपरा
बीटोवड़ा बनाने का कार्य किसी एक महिला का नहीं होता. गांव की कई महिलाएं मिलकर एक-दूसरे की मदद से इसका निर्माण करती हैं. सामूहिक श्रम से तैयार होने वाला यह देसी गोदाम पूरे वर्ष परिवार के लिए ईंधन की सुरक्षा सुनिश्चित करता है. बदलते समय के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र की यह परंपरा आज भी गांव की संस्कृति, आत्मनिर्भरता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का जीवंत उदाहरण बनी हुई है. गांव में गाय, भैंस रखने वाले परिवारों के गोबर का ईंधन मिलेंगा और गांव में जगह जगह आकर्षक सजावट के बीटोवड़ा बने दिखाई देंगे जो गांव में जरूर मिलेंगे.



