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वैज्ञानिकों ने लैब में बना दी आर्टिफिशियल लाइफ, असली कोशिकाओं की तरह बढ़ेंगे ये सिंथेटिक सेल्स, भविष्य में अंगों की हो सकेगी मरम्मत

Last Updated:July 06, 2026, 17:51 IST

Synthetic Cell: वैज्ञानिकों ने विज्ञान में बहुत बड़ा कारनामा कर दिखाया है. जिस तरह नायलॉन और पोलिएस्टर से सिंथेटिक कपड़ा बनाया जाता है, उसी तरह स्क्रैच से आर्टिफिशियल सेल्स बना दिया है. खास बात यह है कि यह कोशिका भोजन भी करती है, वृद्धि भी करती है और असली की तरह स्वयं की प्रतिकृति भी बना लेती है. यह उपलब्धि अपने आप में बहुत बड़ा कदम है. इससे भविष्य में शरीर के अंगों की मरम्मत भी हो सकेगी.वैज्ञानिकों ने बनाया सिंथेंटिक सेल्स, असली की तरह करता है ग्रोथ, भविष्य में अंZoomसिंथेटिक सेल्स.

Creation of Synthetic Cell: विज्ञान की तरक्की परम सत्ता को चुनौती देनी लगी है. अब तक हम यही जानते हैं कि इस ब्रह्मांड में जितनी भी जीवित चीजें हैं वे सब किसी न किसी परम सत्ता द्वारा निर्मित होती हैं लेकिन विज्ञान ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए कृत्रिम रूप से इस जीवित चीज को बना लिया है. अमेरिका के मिनिसोटा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया कि उसने सिंथेटिक कोशिका बनाने में सफलता हासिल कर ली है. रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने पहली बार स्क्रैच से ऐसी आर्टिफिशियल कोशिका बनाई है जो असली की तरह खाती है, असली की तरह ग्रोथ करती है और जिस तरह असली कोशिका अपनी ही जैसी नई कोशिका बनाती है, उसी तरह यह भी नई कोशिका बना लेती है. यह है तो सिंथेटिक कोशिका लेकिन असली कोशिका की तरह ही है. इसलिए सिंथेटिक बायोलॉजी के क्षेत्र में यह बड़ी उपलब्धि है. इससे भविष्य में जरूरत के अनुसार तैयार किए गए जीवों का रास्ता खोल सकती है,जो जीवित मशीनों की तरह काम करेंगे. यानी अगर कोई अंग खराब हो गया तो वहां भी वह असली की तरह काम कर सकने लगेगी.

किसी भी तरह से बनाया जा सकतासीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक यूनिवर्सिटी ऑफ मिनीसोटा में सिंथेटिक बायोलॉजी की प्रोफेसर केट अडमाला और उनकी टीम ने इस कोशिका को निर्जीव रासायनिक घटकों को एक-एक करके जोड़कर तैयार किया. यह अभी एक सीमित क्षमता वाला और नाजुक प्रोटोटाइप है लेकिन इससे वैज्ञानिकों को जीवन की उत्पत्ति को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है. साथ ही, भविष्य में इसे इस तरह प्रोग्राम किया जा सकता है कि यह दुनिया की कुछ सबसे बड़ी जैविक चुनौतियों के समाधान में योगदान दे सके. यह कोशिका किसी विशेष जीव की नहीं है, न तो यह पौधे की है और न ही जानवर की. हालांकि इसकी बनावट और कार्यप्रणाली सबसे अधिक एक साधारण बैक्टीरिया से मिलती-जुलती है. केट एडामाला ने कहा, मुझे इस कोशिका में मौजूद हर एक घटक की पूरी जानकारी है. मुझे पता है कि इसमें कौन-कौन से रसायन हैं, कौन-से अणु हैं और उनकी कंसंट्रेशन कितनी है. यह पूरी तरह परिभाषित प्रणाली है, जिसका मतलब है कि हम इसे अपनी जरूरत के मुताबिक इसमें इंजीनियर या डिजाइनिंग कर सकते हैं.

सिंथेटिक कोशिका अगली बड़ी क्रांतिवैज्ञानिक पिछले कई दशकों से प्राकृतिक कोशिकाओं में जैव-इंजीनियरिंग करके मानव समस्याओं का समाधान खोजते रहे हैं. अब तक इसमें कई बड़ी उपलब्धि हासिल हो गई है. उदाहरण के लिए वैज्ञानिकों ने ई. कोलाई बैक्टीरिया की कोशिकाओं में इंसान के इंसुलिन वाले जीन को डाल दिया. इससे ई कोलाई में इंसुलिन का कुदरती उत्पादन करने वाला जीन विकसित हो गया और इसे मानव में प्रत्यारोपित कर दिया गया जिससे डायबिटीज का इलाज संभव हो पाया. अब वैज्ञानिकों का मानना है कि सिंथेटिक कोशिकाएं इस क्षेत्र की अगली बड़ी क्रांति साबित हो सकती हैं. भविष्य में इनके जरिए कैंसर के नए और अधिक प्रभावी इलाज, वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ने की नई तकनीकें और महत्वपूर्ण रसायनों के उत्पादन के अभिनव तरीके विकसित किए जा सकते हैं.

मनपसंद कोशिका बनाने में क्रांतिकारी कदमकोशिकाएं जीवन की सबसे बुनियादी इकाइयां हैं लेकिन इसे समझना बिल्कुल भी आसान नहीं हैं. इंसान के शरीर में लगभग 37 ट्रिलियन (37 हजार अरब) कोशिकाएं होती हैं, जो आकाश में मौजूद तारों की संख्या से भी अधिक हैं. इसके बावजूद वैज्ञानिक आज तक यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि हर प्रकार की कोशिका कैसे काम करती है और उसके भीतर वास्तव में क्या-क्या मौजूद होता है. इंपीरियल कॉलेज ऑफ लंदन में बायोकेमिकल टेक्नोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर युवाल एलानी कहती हैं कि एडामाला ने जो सिंथेटिक कोशिका बनाई है उसे फिलहाल लैब में जीवन का निर्माण नहीं कहा जा सकता. हालांकि यह उस दिशा में एक वास्तविक और ऐतिहासिक उपलब्धि है. यह निर्माण यह समझने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है कि क्या प्रयोगशाला में जीवन जैसी प्रणाली बनाई जा सकती है. एलानी ने कहा, जब आप किसी कोशिका को पूरी तरह शून्य से बनाते हैं, तो आप प्राकृतिक जीवविज्ञान की सीमाओं और करोड़ों वर्षों के विकासक्रम से जुड़े बंधनों से मुक्त हो जाते हैं. इससे ऐसी जैविक प्रणालियां डिजाइन करने और उन्हें प्रोग्राम करने की संभावना के द्वारा खुलेगे जो प्राकृतिक जीवित कोशिकाएं आसानी से नहीं कर सकतीं या शायद कभी कर ही नहीं सकतीं.

About the AuthorLakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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