‘राजस्थान के भागीरथ’ ने बदली रेगिस्तान की किस्मत, ऐसे आई थी सतलुज की धार, जानें गंगनहर की कहानी

बीकानेर. आज जब बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट वर्षों तक फाइलों में अटके रहते हैं, तब करीब एक सदी पहले राजस्थान के रेगिस्तान में ऐसा सपना साकार हुआ जिसने इतिहास बदल दिया. यह सपना था सतलुज नदी का पानी बीकानेर की प्यास बुझाने के लिए लाना. इस दूरदर्शी सोच के पीछे बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह का विजन था, जबकि इसे जमीन पर उतारने में तत्कालीन पीडब्ल्यूडी सचिव और ब्रिटिश इंजीनियर पी. स्टेनली की निर्णायक भूमिका रही. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल के अनुसार, गंगनहर केवल सिंचाई परियोजना नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, इंजीनियरिंग कौशल और दूरदृष्टि का अनूठा उदाहरण थी. इस असाधारण योगदान के लिए महाराजा गंगा सिंह को “गंगनहर का भीष्म पितामह” की उपाधि दी गई. इन्हीं के नाम पर श्रीगंगानगर शहर भी बसा है.
वहीं राजकीय डूंगर महाविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीराम नायक बताते हैं कि महाराजा गंगा सिंह को “राजस्थान का भागीरथ” यूं ही नहीं कहा जाता. उन्होंने बार-बार पड़ने वाले अकालों से स्थायी राहत दिलाने के लिए यह ऐतिहासिक पहल की. दरअसल, 1899-1900 का भीषण ‘छप्पनिया अकाल’ बीकानेर रियासत पर कहर बनकर टूटा था. फसलें नष्ट हो गईं, पशुधन खत्म होने लगा और भुखमरी ने हालात भयावह कर दिए. इसी त्रासदी ने महाराजा गंगा सिंह को रेगिस्तान तक सतलुज का पानी पहुंचाने का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया. हालांकि यह विचार नया नहीं था. वर्ष 1855 में ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल डाइस ने पहली बार यह प्रस्ताव रखा था, लेकिन वह कागजों से आगे नहीं बढ़ सका.
1905 में पंजाब के चीफ इंजीनियर आर. जी. कैनेडी ने गंग नहर परियोजना का विस्तृत खाका तैयार किया था
1905 में आर. जी. कैनेडी ने परियोजना का खाका किया तैयार
20 बार विभिन्न कारणों से प्रस्ताव किए गए खारिज
गंग नहर को धरातल पर उतारने के लिए अड़चने कम होने का नाम नहीं ले रही थी. लगातार विवाद बढ़ते चले गए. जिसके चलते 1913 में सिंचाई क्षेत्र को घटाकर 6.40 लाख एकड़ और 1914 में घटाकर 5 लाख एकड़ करना पड़ा. राजनीतिक विवादों, प्रथम विश्व युद्ध और आर्थिक मंदी के कारण परियोजना वर्षों तक अटकी रही. इतिहासकारों के अनुसार, 1920 तक इस परियोजना से जुड़े करीब 20 प्रस्ताव विभिन्न कारणों से खारिज किए जा चुके थे. इसके बावजूद प्रयास लगातार जारी रहे और अंततः परियोजना को मंजूरी मिली.
कंक्रीट लाइनिंग उस दौर की बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि माना गया
राजनीतिक चुनौतियों के साथ इंजीनियरों के सामने तकनीकी समस्याएं भी कम नहीं थीं. इसके अलावा नहर का लगभग 71 मील हिस्सा ब्रिटिश क्षेत्र से होकर गुजरना था, जहां जलभराव का खतरा था. रेतीली जमीन में पानी के रिसाव और जलभराव की आशंका को देखते हुए नहर के कई हिस्सों में कंक्रीट लाइनिंग का फैसला लिया गया, जिसे उस दौर की बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि माना गया. आखिरकार 1927 में गंगनहर का उद्घाटन हुआ.
20 बार प्रस्ताव विभिन्न कारणों से खारिज होने के बावजूद गंगनहर अस्तित्व में आया
पंडित मदन मोहन मालवीय ने किया था वैदिक मंत्रोच्चार
गंगनहर के उद्घाटन के दौरान पंडित मदन मोहन मालवीय ने वैदिक मंत्रोच्चार किया और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन भी मौजूद रहे. इन तमाम राजनीतिक विरोध, आर्थिक संकट और तकनीकी चुनौतियों के बावजूद गंगनहर परियोजना अंततः साकार हुई. इसने बीकानेर और उत्तर-पश्चिम राजस्थान के विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र को नई पहचान दी. लाखों एकड़ बंजर भूमि खेती योग्य बनी, कृषि उत्पादन बढ़ा और हजारों परिवारों के जीवन में खुशहाली आई.
1927 में गंगनहर का उद्घाटन हुआ और इस अवसर पर पंडित मदन मोहन मालवीय ने वैदिक मंत्रोच्चार किया था
इस परियोजना ने रेगिस्तान की किस्मत बदल दी
गंगनहर बनने के बाद उत्तर-पश्चिम राजस्थान की तस्वीर बदल गई. श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर के विशाल रेगिस्तानी इलाके खेती योग्य बने, नई बस्तियां बसाईं गईं और किसानों को भूमि आवंटित की गई. आज जिस श्रीगंगानगर को राजस्थान का अन्न भंडार कहा जाता है, उसकी नींव भी इसी परियोजना ने रखी. गंगनहर का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि दूरदृष्टि रखने वाला नेतृत्व, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और कुशल इंजीनियरिंग मिल जाए तो रेगिस्तान में भी हरियाली उगाई जा सकती है. 1984 में गंग नहर का नाम बदलकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर कर दिया गया.
इनपुट सहयोग- निखिल स्वामी/बीकानेर



