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नहीं पड़ेगी ब्रह्मोस-अग्नि की कोई जरूरत, ‘आकाश तरंग’ ही कर देगी दुश्‍मन का काम तमाम | akash-tarang-anti-drone-system-defense-deals-indian-army-mrsam

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नहीं पड़ेगी ब्रह्मोस की कोई जरूरत, ‘आकाश तरंग’ ही कर देगी दुश्‍मन का काम तमाम

Last Updated:July 10, 2026, 05:01 IST

Akash Tarang: भारतीय सेना भविष्य के युद्ध की तैयारियों में जुट गया है. इस तैयारी में सबसे खास ‘आकाश तरंग’ भी शामिल है. यह सिस्‍टम दुश्मन के मंसूबों को बिना मिसाइल दागे ही नेस्‍तनाबूद कर सकता है. इसके अलावा, भारतीय सेना के तरकश में कई नए हथियार शामिल होने जा रहे हैं. आइए अब जाने, ‘आकाश तरंग’ कैसे दुश्मन का खेल खत्म करेगा.नहीं पड़ेगी ब्रह्मोस की कोई जरूरत, 'आकाश तरंग' ही कर देगी दुश्‍मन का काम तमामZoomभारतीय सेना के तरकश में कई खास हथियार आने वाले दिनों में शामिल होने जा रहे हैं. Akash Tarang: अब दुश्‍मन को सबक सिखाने के लिए भारतीय सेना को ब्रह्मोस-अग्नि जैसे ब्रह्मास्‍त्रों की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि ‘आकाश तरंग’ ही उसका काम तमाम कर देगी. जी हां, भारतीय सेना को जल्द ऐसी हाईटेक ताकत मिलने जा रही है, जो बिना मिसाइल दागे ही दुश्मन का खेल खत्म कर सकती है. बीते दिनों, रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने करीब 52 हजार करोड़ रुपये के रक्षा सौदों को मंजूरी दी है. इस सौदे में ‘आकाश तरंग’ की खरीद भी शामिल है.

डिफेंस एक्‍सपर्ट के अनुसार, आज के दौर में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है. पहले युद्ध टैंक, फाइटर जेट और बड़ी मिसाइलों के दम पर लड़ी जाती थी. लेकिन, अब यही युद्ध छोटे-छोटे ड्रोन से लड़े जा रहे हैं. ये ड्रोन बड़े से बड़े देशों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन का इस्‍तेमाल हम सभी देख चुके हैं. यही वजह है कि भारत अब सिर्फ हमला करने वाले हथियारों पर नहीं, बल्कि दुश्मन के हमले को शुरुआत में ही रोकने वाली तकनीकों पर भी तेजी से काम कर रहा है.

आखिर क्या है ‘आकाश तरंग’?
‘आकाश तरंग’ एक एडवांस एंटी-यूएवी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम है. आसान भाषा में कहें तो यह दुश्मन के ड्रोन को गोली या मिसाइल से नहीं गिराता, बल्कि उसका पूरा कंट्रोल छीन लेता है. हर ड्रोन अपने ऑपरेटर से रेडियो सिग्नल के जरिए जुड़ा होता है. इसी सिग्नल के जरिए उसे दिशा, ऊंचाई और टारगेट की जानकारी मिलती है. ‘आकाश तरंग’ इसी कनेक्शन पर हमला करता है.
जैसे ही कोई दुश्मन ड्रोन भारतीय सेना की पोस्ट, बॉर्डर, एयरबेस या किसी संवेदनशील इलाके की तरफ बढ़ेगा, यह सिस्टम उसके कम्युनिकेशन लिंक को जाम कर देगा. इसके बाद ड्रोन अपने ऑपरेटर से संपर्क खो देगा. आकाश तरंग इन ड्रोंस के जीपीएस को भी कंफ्यूज करने की ताकत रखता है. आकाश तरंग के कंफ्यूज करते हुए वह गलत दिशा में जाकर गिर सकता है.

अब हर ड्रोन के लिए नहीं खर्च करनी होंगी मिसाइलड्रोन का खतरा बढ़ने के साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है. अगर दुश्मन एक साथ दर्जनों या सैकड़ों छोटे ड्रोन भेज दे तो हर ड्रोन पर महंगी मिसाइल दागना समझारी नहीं होगी. ऐसी स्थिति में यहीं आकाश तरंग सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा. यह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से एक साथ कई ड्रोन के सिग्नल को ब्‍लॉक कर देगा. इससे सेना के रिसोर्सेज भी बचेंगे और दुश्‍मन के मंसूबे भी धरे के धरे रह जाएंगे. यही वजह है कि भारतीय सेना अब इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को भविष्य के युद्ध की सबसे बड़ी ताकत मान रही है.

क्यों बढ़ गई है इसकी जरूरत?पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने देखा कि ड्रोन अब सिर्फ निगरानी का साधन नहीं रहे. ऑपरेशन सिंदूर हो, रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संघर्ष हो या सीमा पर छोटे हमले हों. हर जगह ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है. छोटे ड्रोन दुश्मन की लोकेशन की जानकारी जुटा सकते हैं, हथियार गिरा सकते हैं, एक्‍सप्‍लोसिव से हमला भी कर सकते हैं. साथ ही इनका इस्‍तेमाल सैन्य ठिकानों का भेद जानने के लिए भी हो सकता है. भारत की सीमाओं पर भी कई बार संदिग्ध ड्रोन गतिविधियां सामने आ चुकी हैं. ऐसे में सेना को ऐसी तकनीक की जरूरत थी, जो खतरे को शुरू में ही खत्म कर सके.

आकाश तरंग संग सेना को मिलेंगी कई नई ताकतेंडीएसी ने सिर्फ ‘आकाश तरंग’ को ही मंजूरी नहीं दी है. इसके साथ कई ऐसे हथियार और सिस्टम भी शामिल हैं, जो भारतीय सेना की ताकत को कई गुना बढ़ा देंगे. इन ताकतों में मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल, वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम, एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम और कामिकेज ड्रोन भी शामिल हैं. ये सभी हथियार मिलकर भारतीय सेनाओं की ताकत को मौजूदा ताकत से कई गुना अधिक बढ़ा देंगी. इनके आने के बाद दुश्‍मन की किसी भी चाल को न केवल माकूल जवाब दिया जा सकेगा, बल्कि उसके हर मंसूबे पर नेस्‍तनाबूद किया जा सकेगा.

भारतीस सेना के तरकश में शामिल होने जा रहे ये अस्‍त्र

MPATGM से टैंकों का होगा शिकार: मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल यानी MPATGM ऐसा हथियार है जिसे एक सैनिक अकेले लेकर चल सकता है. जरूरत पड़ने पर वह इसे कंधे से लॉन्च कर सकता है. इसमें ‘फायर एंड फॉरगेट’ टेक्नोलॉजी है. यानी मिसाइल छोड़ने के बाद सैनिक को उसे कंट्रोल नहीं करना पड़ता. मिसाइल खुद अपने टारगेट का पीछा करती है और दुश्मन के टैंक या बख्तरबंद वाहन को निशाना बनाकर बर्बाद कर देती है.
MRSAM देगा मजबूत एयर डिफेंस: मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल यानी MRSAM भारतीय एयर डिफेंस नेटवर्क को पुख्‍ता करेगी. यह लगभग 70 से 100 किलोमीटर की दूरी तक आने वाले फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को रोकने की क्षमता रखती है. एडवांस रडार सिस्टम की मदद से यह एक साथ कई टारगेट ट्रैक कर सकता है.
V-SHORADS करेगा नजदीकी सुरक्षा: वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम यानी V-SHORADS कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन, हेलीकॉप्टर और फाइटर एयरक्राफ्ट को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है. इसे भारतीय जांबाज आसानी से अपने साथ लेकर चल सकते हैं. पहाड़, जंगल, रेगिस्तान और शहरी इलाकों में इसकी तैनाती भी बेहद आसान है.
टैंकों को मिलेगा नया सुरक्षा कवच: एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम यानी APS भारतीय टैंकों के लिए नई सुरक्षा ढाल बनेगा. अगर दुश्मन एंटी-टैंक मिसाइल दागता है तो यह सिस्टम पहले ही खतरे को पहचान लेता है. एपीएस आने वाली मिसाइल को रास्ते में ही नष्ट करने या उसका रास्ता बदलने की क्षमता रखता है.
कामिकेज ड्रोन भी होंगे सेना के पास: जेट बेस्ड कामिकेज ड्रोन या लोइटरिंग म्यूनिशन भी इस रक्षा खरीद का अहम हिस्सा हैं. ये ड्रोन काफी देर तक हवा में मंडरा सकते हैं. जैसे ही टारगेट मिलता है, ये सीधे उससे टकराकर खुद भी नष्ट हो जाते हैं और दुश्मन के ठिकाने को भी खत्म कर देते हैं. महंगी मिसाइलों की तुलना में ये ज्यादा किफायती माने जाते हैं और भविष्य के युद्धों में इनका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है.
आत्मनिर्भर भारत को मिलेगी नई उड़ान: सरकार की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा रक्षा उपकरण भारत में ही विकसित और तैयार किए जाएं. इससे विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी. साथ ही, घरेलू डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और नई टेक्नोलॉजी का भी देश के भीतर ही विकसित किया जा सकेगा.

अभी तो सिर्फ शुरुआत है…

डिफेंस एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, डीएसी की मंजूरी को रक्षा खरीद प्रक्रिया का पहला कदम माना जाता है. इसे एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी कहा जाता है. अब इन सभी प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर जारी होंगे. फिर टेक्निकल इवैल्यूएशन, ट्रायल, कीमत पर बातचीत और जरूरी मंजूरियों के बाद कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किए जाएंगे. इसके बाद ही इन सिस्टम्स की डिलीवरी भारतीय सेना को शुरू होगी. डिफेंस एक्‍सपर्ट मानते हैं कि आने वाले समय में युद्ध सिर्फ बड़ी मिसाइलों से नहीं जीते जाएंगे. युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन और एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी निर्णायक भूमिका निभाएंगी.

About the AuthorAnoop Kumar MishraAssistant Editor

Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें

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