सालभर रहता है इंतजार…मानसून आते ही बाजारों में छा जाती हैं ये पहाड़ी सब्जियां, शरीर को देती है गजब फायदे

Last Updated:August 06, 2026, 11:39 IST
Seasonal Pahadi Vegetable: मानसून की पहली बारिश के साथ ही उत्तराखंड के जंगलों और खेतों में कई पारंपरिक पहाड़ी सब्जियां निकलने लगती हैं, जिनका लोग पूरे साल इंतजार करते हैं. लिंगुड़ा, कंडाली, गेठी, पहाड़ी ककड़ी, चौलाई, सेम, तोरई और लौकी जैसी ये मौसमी सब्जियां अपने अनोखे स्वाद और भरपूर पोषण के लिए जानी जाती हैं. स्थानीय बाजारों में इनकी अच्छी मांग रहती है और इन्हें बेचकर किसानों को अतिरिक्त आमदनी भी होती है. यही वजह है कि ये सब्जियां सिर्फ पहाड़ की थाली का स्वाद नहीं बढ़ातीं, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका और उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का भी अहम हिस्सा हैं.
मानसून शुरू होते ही उत्तराखंड के जंगलों में लिंगुड़ा (Fiddlehead Fern) निकलना शुरू हो जाता है. यह पहाड़ की सबसे लोकप्रिय मौसमी सब्जियों में से एक है, जिसका लोग पूरे साल इंतजार करते हैं. इसकी कोमल डंडियों से बनने वाली सब्जी का स्वाद बेहद अलग और लाजवाब होता है. स्थानीय लोग इसे सरसों के तेल, जाखिया और पहाड़ी मसालों के साथ पकाते हैं. लिंगुड़ा में फाइबर, आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं, जो पाचन तंत्र को मजबूत बनाने, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और ऊर्जा देने में मदद करते हैं. आज यह खास जंगली सब्जी सिर्फ पहाड़ों सीमित नहीं है, बल्कि कई पर्यटक भी उत्तराखंड आकर इसका स्वाद लेना पसंद करते हैं. स्थानीय पहाड़ी बाजारों में इसकी अच्छी कीमत मिलती है, जिससे ग्रामीणों को अतिरिक्त आय भी होती है. स्वाद और पोषण से भरपूर लिंगुड़ा को पहाड़ का सुपरफूड माना जाता है.
कंडाली, जिसे बिच्छू घास भी कहा जाता है, छूने पर त्वचा में तेज जलन पैदा करती है. लेकिन पकने के बाद यही पौधा उत्तराखंड के सबसे स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजनों में बदल जाता है. मानसून के मौसम में इसकी कोमल पत्तियों से साग तैयार किया जाता है, जिसे मंडुवे या मक्के की रोटी के साथ खाया जाता है. इसमें आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और कई जरूरी विटामिन पाए जाते हैं. यह शरीर में खून की कमी दूर करने, हड्डियों को मजबूत बनाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मददगार माना जाता है. पहाड़ों के लोग इसे पारंपरिक औषधीय भोजन भी मानते हैं. पर्यटक भी अब स्थानीय होमस्टे और रेस्तरां में कंडाली का साग चखने पहुंचते हैं. यही वजह है कि इसे उत्तराखंड की सबसे अनोखी और पौष्टिक मौसमी सब्जियों में गिना जाता है.
बारिश के मौसम में मिलने वाली गेठी उत्तराखंड की पारंपरिक सब्जियों में खास स्थान रखती है. हालांकि यह मुख्य रूप से सर्दी के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाती है और सीमित समय के लिए ही उपलब्ध रहती है. लेकिन इसके हेल्थ बेनेफिट्स की वजह से ये बरसात में भी मार्केट में लोगों को लुभाती है. इसका स्वाद हल्का और प्राकृतिक होता है, इसलिए इसे कम मसालों के साथ पकाया जाता है ताकि इसका असली स्वाद बना रहे. गेठी में फाइबर और कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करते हैं. स्थानीय लोग इसे दाल या अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर भी बनाते हैं. बाजार में इसकी मांग अच्छी रहती है और किसान इसे बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करते हैं. आज भी यह सब्जी पहाड़ की पारंपरिक रसोई की पहचान बनी हुई है.
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उत्तराखंड की पहाड़ी ककड़ी सामान्य ककड़ी से स्वाद और गुणवत्ता में अलग होती है. मानसून के दौरान इसकी अच्छी पैदावार होती है और यह स्थानीय बाजारों में आसानी से मिल जाती है. इसमें पानी की मात्रा अधिक होने के कारण यह शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करती है. विटामिन-सी, फाइबर और मिनरल्स से भरपूर यह ककड़ी पाचन और त्वचा के लिए भी लाभदायक मानी जाती है. इसे सलाद, रायता और पारंपरिक व्यंजनों में खूब इस्तेमाल किया जाता है. गर्म और उमस भरे मौसम में यह शरीर को ठंडक देने का भी काम करती है.
बारिश के मौसम में पहाड़ी तोरई की खेती पहाड़ों में बड़े पैमाने पर होती है. यह कम कैलोरी वाली सब्जी है, जिसे स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है. स्थानीय लोग इसे टमाटर, लहसुन और पहाड़ी मसालों के साथ बनाते हैं. इसमें फाइबर, विटामिन-ए और विटामिन-सी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यह पाचन को बेहतर बनाने, वजन नियंत्रित रखने और शरीर को पोषण देने में मदद करती है. मानसून के दौरान यह लगभग हर पहाड़ी घर की रसोई में बनती है.
पहाड़ी लौकी मानसून में आसानी से मिलने वाली पौष्टिक सब्जी है. उत्तराखंड के गांवों में इसकी सब्जी, रायता और मिठाइयां भी बनाई जाती हैं. इसमें पानी, पोटैशियम और फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो शरीर को ठंडक देने और पाचन सुधारने में मदद करती है. डॉक्टर भी इसे नियमित भोजन में शामिल करने की सलाह देते हैं. पहाड़ी किसान इसकी खेती से अच्छी आमदनी भी प्राप्त करते हैं.
चौलाई का साग उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन का अहम हिस्सा है. इसमें आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन-ए भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इसे दाल या साग के रूप में पकाया जाता है. यह शरीर में खून की कमी दूर करने और हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है. मानसून में इसकी ताजी पत्तियां स्थानीय बाजारों में खूब बिकती हैं और लोगों की पहली पसंद रहती हैं.
मानसून के दौरान सेम की फलियां खेतों में खूब लहलहाती हैं. पहाड़ों में इसे आलू, टमाटर और स्थानीय मसालों के साथ बनाया जाता है. इसमें प्रोटीन, फाइबर और कई जरूरी खनिज पाए जाते हैं. यह दिल की सेहत, पाचन और शरीर की ऊर्जा बनाए रखने में मदद करती है. इसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है और किसान इससे अच्छी कमाई करते हैं.
उत्तराखंड में बारिश के मौसम में मिलने वाली पारंपरिक सब्जियां सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देती हैं. नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चमोली जैसे जिलों के किसान इनकी खेती और बिक्री से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं. स्थानीय बाजारों के अलावा कई पर्यटक भी इन सब्जियों को खरीदकर ले जाते हैं, जिससे इनकी मांग लगातार बढ़ रही है.
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August 06, 2026, 11:39 IST



