क्या आप जानते हैं? पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा बनी गंगनहर, निर्माण में ऊंटों की भूमिका कर देगी हैरान

Last Updated:August 06, 2026, 13:22 IST
Bikaner Hindi News: बीकानेर और पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली गंगनहर के निर्माण में ऊंटों ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी. वर्ष 1920 से 1927 के बीच जब आधुनिक मशीनें और भारी उपकरण उपलब्ध नहीं थे, तब हजारों मजदूरों के साथ ऊंट और ऊंटगाड़ियां निर्माण कार्य की सबसे बड़ी ताकत बने. नहर की खुदाई से निकली मिट्टी और अन्य सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का अधिकांश काम ऊंटों के जरिए किया गया. आज भी इस ऐतिहासिक परियोजना से जुड़े दुर्लभ फोटो और दस्तावेज उस दौर में ऊंटों के अमूल्य योगदान की गवाही देते हैं, जिसने पश्चिमी राजस्थान के विकास की मजबूत नींव रखी.
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बीकानेर. रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंट सदियों से राजस्थान की पहचान रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली गंगनहर के निर्माण में भी ऊंटों की अहम भूमिका रही थी. वर्ष 1920 से 1927 के बीच जब गंगनहर का निर्माण हुआ, तब आधुनिक मशीनें और भारी उपकरण उपलब्ध नहीं थे. ऐसे में हजारों मजदूरों के साथ ऊंट और ऊंटगाड़ियां इस ऐतिहासिक परियोजना की सबसे बड़ी ताकत बने. नहर की खुदाई से निकली मिट्टी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का अधिकांश काम ऊंटों के माध्यम से किया गया. आज भी इस निर्माण कार्य से जुड़े कुछ दुर्लभ फोटो और ऐतिहासिक प्रमाण ऊंटों के योगदान की कहानी बयां करते हैं.
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ नितिन गोयल ने बताया कि गंगनहर का निर्माण केवल एक सिंचाई परियोजना नहीं था, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान को बार-बार पड़ने वाले भीषण अकालों से स्थायी राहत दिलाने का प्रयास था. वर्ष 1899-1900 में पड़ा छप्पनिया अकाल राजस्थान के इतिहास के सबसे भयावह अकालों में गिना जाता है. विक्रम संवत 1956 के इस अकाल को अंग्रेजी शासन ने अपने अभिलेखों में ‘ग्रेट इंडियन फेमिन’ के नाम से दर्ज किया था. बारिश नहीं होने से फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं, हजारों लोग भूख और प्यास से दम तोड़ बैठे तथा बड़ी संख्या में पशुओं की मौत हो गई. इस त्रासदी ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया.
गंगनहर परियोजना को मंजूरी मिलीइन हालात को देखते हुए तत्कालीन बीकानेर रियासत के शासक महाराजा गंगा सिंह ने पश्चिमी राजस्थान के लिए स्थायी जल व्यवस्था की योजना बनाई. उनका मानना था कि अकाल की समस्या का समाधान केवल राहत कार्यों से नहीं, बल्कि सिंचाई की स्थायी व्यवस्था से ही संभव है. इसी सोच के साथ उन्होंने पंजाब की सतलुज नदी का पानी राजस्थान तक लाने का प्रयास शुरू किया. अंग्रेजी हुकूमत ने भी उनकी दूरदर्शी सोच का समर्थन किया और गंगनहर परियोजना को मंजूरी मिली.
मिट्टी को ऊंटगाड़ियों में भरकर दूर तक पहुंचाया जातानिर्माण कार्य वर्ष 1920 में शुरू हुआ. उस समय रेगिस्तानी इलाके में जेसीबी, डंपर या अन्य आधुनिक मशीनें नहीं थीं. मजदूर कसियों और फावड़ों से नहर की खुदाई करते थे, जबकि खुदाई से निकली मिट्टी को ऊंटगाड़ियों में भरकर दूर तक पहुंचाया जाता था. रेतीले क्षेत्र में ऊंट सबसे भरोसेमंद और सक्षम परिवहन साधन थे. यही कारण था कि हजारों ऊंट इस महत्वाकांक्षी परियोजना का अभिन्न हिस्सा बने और वर्षों तक लगातार निर्माण कार्य में जुटे रहे.
मेहनत और ऊंटों के अतुलनीय योगदान का जीवंत स्मारक करीब सात वर्षों की मेहनत के बाद गंगनहर का निर्माण पूरा हुआ और सतलुज का पानी पश्चिमी राजस्थान तक पहुंचा. इसके बाद श्रीगंगानगर सहित आसपास के विशाल क्षेत्र की तस्वीर बदलने लगी. जहां कभी सूखा और बंजर भूमि थी, वहां खेत लहलहाने लगे. गेहूं, कपास, सरसों और अन्य फसलों का उत्पादन बढ़ा, किसानों की आय में सुधार हुआ और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई गति मिली. बाद के वर्षों में नहर प्रणाली का विस्तार होने से राजस्थान के अन्य हिस्सों को भी इसका लाभ मिलने लगा. इतिहासकारों का मानना है कि गंगनहर महाराजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता, हजारों श्रमिकों की मेहनत और ऊंटों के अतुलनीय योगदान का जीवंत स्मारक है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Bikaner,Rajasthan
First Published :
August 06, 2026, 13:22 IST



